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दमन का पाठ PDF Print E-mail
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Monday, 14 July 2014 11:45

नीलिमा चौहान

जनसत्ता 14 जुलाई, 2014 : यह सारा मामला ‘ग्रैंड-डिजाइन’ का है! चाहे हमारे विश्वविद्यालयों पर चार साला शिक्षा नीति को थोपने की साजिश हो या उच्च शिक्षा में सतही ज्ञान परोसने वाले पाठ्यक्रमों के निर्माण की घटना या सिविल सर्विसेज में भारतीय भाषाओं को अंगरेजी के आगे हीन बना देने का दुश्चक्र, सब एक ही मास्टर प्लान का हिस्सा हैं! ये उत्तर औपनिवेशिक युग के अपने चरम रूप की झांकियां ही तो हैं जब हमारी भाषा, संस्कृति और ज्ञान पर ‘उनका’ नियंत्रण बनता जा रहा है! धीरे-धीरे हमें भाषिक पंगुता की ओर ले जाकर ‘वे’ हमें अपनी भाषा की बैसाखियां पकड़ाना चाहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि अगर मन को गुलाम बनाना है, सोच को अगवा करना है तो पहले अभिव्यक्ति के तरीकों और आवाज को छीनना होगा! दासता के महान डिजाइन की संकल्पना करने वाले जानते हैं कि तोपों और बाहरी बल से गुलाम बनाने के बजाय लक्ष्य को मन और सोच से गुलाम बनने के लिए प्रेरित करना कारगर और चिरस्थायी तरीका होता है!

हमारे विश्वविद्यालयों में भी ज्ञान को ‘अपग्रेडेड’ और आधुनिक रूप में पेश करने के नाम पर जो पाठ्यक्रम और उसके प्रारूप लागू किए गए, वे इसी साजिश का नतीजा थे! ज्ञान का सतही और स्तरहीन, ढांचाविहीन, परिकल्पनाहीन डिजाइन! इस डिजाइन को सैन्य शासन के रूप में लागू किया गया, असंसदीय तरीके से थोपा गया और उसके लिए सभी लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया गया! साफ था, यह पाठ्यक्रम सुनिश्चित करता था कि विद्यार्थी सतही ज्ञान ही हासिल कर पाए और इस व्यवस्था में केवल कल-पुर्जा बन कर रहे! वह सोचने-समझने और सवाल करने के काबिल न बचे और आखिर ‘संपूर्ण गुलाम’ पैदा किए जा सकें!

अपनी भाषा और ज्ञान की संप्रभुता की लड़ाइयां हमारे अस्तित्व के लिए किए जाने वाले संघर्ष हैं, पर इन्हें एक करके देखने और मिल कर जूझने की कुव्वत अभी हम पैदा नहीं कर पाए हैं। सिविल सर्विसेज के अभ्यर्थियों द्वारा किया जाने वाला आंदोलन बहुत छोटे तबके का ही ध्यान खींच पा रहा है! हमारे यहां दूसरे की लड़ाई में अपनी टांग न फंसाने की जो नीति है, उसका खमियाजा हर आंदोलन को उठाना पड़ता है। इसका पूरा फायदा सत्ताधारियों को मिल जाता है! प्रसिद्ध अफ्रीकी साहित्यकार चेख हामिदू अपने उपन्यास ‘एम्बिगुअस एड्वेंचर’ में लिखते हैं- ‘काले उपमहाद्वीप को


देखें तो यह बात समझ में आने लगती है कि ‘उनकी’ तोपों की असली ताकत उस दिन महसूस नहीं होती, जिस दिन वे पहली बार गोले उगलती हैं। इन तोपों के पीछे नए स्कूलों की नींव होती है। नए स्कूलों की प्रकृति में दो चीजें हैं- तोपों के गुण और चुंबक के भी। तोपों के जोर से इसने फतह हासिल की, लेकिन अपनी इस फतह को टिकाऊ रूप देने के लिए इसने शिक्षा का सहारा लिया।’

जब देश की शिक्षा नीति बाहरी ताकतों के अनुसार बनाई जा रही हो और मातृभाषाओं की हत्या की योजनाएं बनाई जा रही हों, ऐसे में बुद्धिजीवी तबके का दायित्व और बढ़ जाता है, क्योंकि देश का एक बड़ा तबका इतनी दूरंदेशी से देखने योग्य नहीं बनने दिया गया होता है और दूसरा छोटा, पर शक्तिशाली तबका ‘उनके’ साथ मिलीभगत कर लेता है! आश्चर्य कि भाषाओं के दमन की नीति और अंगरेजी के प्रभुत्व को आरोपित करने के खिलाफ चल रही लड़ाई अपने ही घर में अपने लोगों से है! अंगरेजी की अनिवार्यता का फर्जी नियम लागू करके, देश की सर्वोच्च सेवा करने वाले तंत्र में अंगरेजी भाषा और उसी के हितों की पूर्ति करने वाले तबके को काबिज करके हम दासता के परम शिकंजों में फंसने जा रहे हैं! जाहिर है, जिसकी भाषा होगी उसी के हित और अधिकार होंगे। बेजुबान और शब्दहीन की क्या बिसात होगी। इसी प्रक्रिया में भारतीयता, राष्ट्रीयता, संस्कृति, अस्मिता और विकास जैसे शब्द हाशिये पर पहुंच कर अपना अर्थ खो देंगे और केवल शब्दकोश में पाए जाएंगे। 


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