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आबादी की गति PDF Print E-mail
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Monday, 14 July 2014 11:43

सुमेर चंद

जनसत्ता 14 जुलाई, 2014 : आजादी के सड़सठ साल बाद भी देश में जिस पैमाने की गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, कुपोषण, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद है, लोग बेघर हैं, सबको पीने का साफ पानी नहीं मिलता, शौचालय और बिजली से लेकर सार्वजनिक परिवहन तक का अभाव है, उसमें भारत को किस तरह एक तेजी से विकास करता देश मानें। निश्चित रूप से यह हमारी व्यवस्था और शासन की विफलता है। लेकिन जरा-सा सोच कर देखें तो समझ आएगा कि इन सबके मूल में एक सबसे बड़ा कारण बढ़ती आबादी है।

मुझे याद है कि हमारे रेलवे स्टेशन पर 1952 में एक बोर्ड टंगा था, जिस पर लिखा था- ‘छोटा परिवार, सुखी परिवार।’ यानी हम देश की जनसंख्या वृद्धि के बारे में पिछले छह दशक से ज्यादा से चिंतित रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि इस दौरान बारह पंचवर्षीय योजनाएं बनाने और तमाम कवायदों के बावजूद ऊपर उल्लिखित समस्याओं का हल नहीं खोज पाए। हर पंचवर्षीय योजना के बाद आंकड़ों की जादूगरी के बावजूद हम अपने को वहीं खड़ा पाते हैं, जहां 1952 में थे। आज हालत यह है कि नौकरी के एक पद के लिए हजार या डेढ़ हजार से ज्यादा उम्मीदवार लाइन में हैं। तमाम भ्रष्टाचार के बावजूद आज भी सस्ते राशन की दुकानों पर लंबी कतारें दिख जाती हैं। हस्ताक्षर करने की जगह अंगूठा लगाने वालों की एक बड़ी तादाद हमारी शिक्षा व्यवस्था को मुंह चिढ़ाती है। नालों और रेलवे लाइनों के किनारे झोपड़ियों और शहरों में पुल, फ्लाईओवरों के नीचे या फुटपाथों पर रात गुजारने वालों की गिनती हम नहीं कर सकते। धार्मिक स्थलों से लेकर चौराहों पर हाथ फैलाने वाले लोग क्या केवल हमसे भीख मांगते हैं, या फिर हमारी समूची व्यवस्था को आईना भी दिखाते हैं? सड़क किनारे पत्थर तोड़ती महिला का बच्चा वहीं कहीं जमीन पर लेटा रोता रहता है, छोटे-छोटे बच्चे कंधे पर कूड़ा चुनने वाला बोरा लटकाए घूमते रहते हैं या कहीं र्इंट भट्ठे पर काम करके पेट भर पाते हैं। इन किशोरों के सूखे और पिचके गालों वाले चेहरे क्या बताते हैं? आजादी से पहले क्या इस देश में वृद्धाश्रम थे? या फिर बच्चे और युवा अपने माता-पिता या बुजुर्गों की सेवा करना अपना धर्म मानते थे?

लेकिन इन सबके बरक्स सरकार अपनी गति से चल रही है और उसके काम एक तरह की ‘भेंट’ और ‘पूजा’ के बिना नहीं हो पाते। सरकारी नौकरी करने वाले लोग कितना अपना कार्य-दायित्व निभाते हैं और बेईमानी की व्यवस्था को फलने-फूलने में अपना कितना योगदान देते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। हालत यह है कि स्कूलों में अच्छी पढ़ाई तो दूर, बच्चों को बैठने के लिए उचित जगह तक नहीं है। हम दूसरों के सेटेलाइट अपने देश के प्रक्षेपण केंद्रों से


छोड़ते हैं, लेकिन हमारे पास अपना सब कुछ हो, इस दिशा में हमने कुछ नहीं किया? एक तरफ बुलेट ट्रेन की घोषणा करके सरकार अपनी उपलब्धियों का डंका पीटती है और दूसरी ओर बाकी रेलगाड़ियों में सभी मुसाफिरों को बैठने की जगह तक नहीं मिल पाती। लोग बोरे में भरी रूई की तरह ठुंस कर सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करते हैं।

इस तरह की और भी न जाने कितनी समस्याओं ने हालात को जटिल बना दिया है। अगर खुद से पूछें तो हममें से ज्यादातर लोग बेईमान, झूठे, बहानेबाज, अनैतिक, अनुशासनहीन हो चुके हैं। हमने अपना आत्मसम्मान गंवा दिया है। बड़ी-बड़ी कामयाबियों के बावजूद कई बार मुझे लगता है कि हम भारतीय उसमें भी जरूर कुछ अपनी ‘दाल-दलिया’ पकाते होंगे। मैं कहना यह चाहता हूं कि जब अपना चरित्र ही चला जाता है, तब बाकी क्या बचता है!

कुछ समय पहले लोकसभा चुनाव हुए। हर राजनीतिक दल ने अपने घोषणा-पत्रों में जनता से बड़े-बड़े वादे किए। ‘अच्छे दिन’ लाने का भरोसा दिलाया गया। जनता इस भरोसे के बहकावे में आई भी। लेकिन कुछ ही दिन में उन ‘अच्छे दिनों’ के भरोसे की हकीकत दिखने लगी है। आगे पता नहीं, और क्या हो! इन सबके बीच किसी राजनीतिक दल की घोषणा में कहीं भी जनसंख्या वृद्धि पर कोई नीतिगत ब्योरा नहीं देखा गया। जबकि देश में बहुत सारी समस्याओं की जड़ में बेलगाम आबादी ही है। सीमित संसाधनों में लगातार बढ़ते लोगों के लिए सब कुछ पूरा कर पाना एक जटिल काम बना रहेगा। यह चिंता किसी राजनीतिक दल की चिंता में शुमार नहीं हो पा रही।

मेरा मानना है कि बिना इस समस्या पर काबू पाए विकास के लिए कितनी भी बड़ी और महत्त्वाकांक्षी योजना लागू कर दी जाए, उसका नतीजा अधूरा रहेगा। जब चीन दो दशकों में ‘अफीमची’ देश का धब्बा अपने ऊपर से मिटा कर दुनिया में अपनी एक ताकतवर जगह बना सकता है तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता!


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