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निनाद : संगीत नाटक अकादेमी की नींद PDF Print E-mail
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Sunday, 13 July 2014 10:42

altकुलदीप कुमार

जनसत्ता 13 जुलाई, 2014 : पुणे से शास्त्रीय गायिका प्रियदर्शिनी कुलकर्णी का फोन आया कि उन्हें कहीं से आगरा घराने के प्रसिद्ध आचार्य उस्ताद विलायत हुसैन खां द्वारा लिखी पुस्तक ‘संगीतज्ञों के संस्मरण’ की एक प्रति मिली है और उन्होंने उसे स्कैन करा लिया है। अगर मैं उसे पढ़ना चाहूं तो वे मुझे भेज देंगी। उनके कहने से मुझे याद आया कि यह किताब तो मैंने 1980 में संगीत नाटक अकादेमी के दफ्तर जाकर खरीदी थी। मैंने उन्हें इस किताब के बारे में याद दिलाने के लिए धन्यवाद दिया और उसे खोजने में जुट गया। थोड़े प्रयास के बाद वह मिल भी गई। किताब संगीत नाटक अकादेमी ने ही प्रकाशित की थी। वर्ष 1959 में जब यह छपी थी तो इसकी कीमत तीन रुपए थी। मैंने इसे पांच रुपए के संशोधित मूल्य पर खरीदा था। लेकिन जहां तक इसके असली मूल्य का सवाल है, उसे आंकना संभव नहीं। यह पुस्तक सच्चे अर्थों में अमूल्य है। 

इसमें पिछली दो सदियों के संगीत के इतिहास और संगीतज्ञों के परिवारों के बारे में जैसी दुर्लभ सामग्री संग्रहीत है, और उस्ताद विलायत हुसैन खां ने इसे जिस ईमानदारी और लगन के साथ लिखा है, उसे देख कर दांतों तले अंगुली दबाने वाला पुराना मुहावरा याद आ जाता है। जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई थी, उस समय संगीत नाटक अकादेमी की सचिव निर्मला जोशी हुआ करती थीं, जिनकी संगीत और नृत्य के प्रति समर्पण भावना के अनेक किस्से मैंने पुराने लोगों से सुने हैं। विलायत हुसैन खां की किताब ढूंढ़ने के क्रम में मुझे दो लघु-पुस्तिकाएं भी मिलीं। एक है नयना रिपजीत सिंह (जिन्हें सारा संगीत-जगत नैना देवी के नाम से जानता है) द्वारा अंगरेजी में लिखित और 1964 में संगीत नाटक अकादेमी द्वारा प्रकाशित ‘मुश्ताक हुसैन खां’ और दूसरी विनयचंद्र मौदगल्य द्वारा हिंदी में लिखित और अकादेमी द्वारा 1966 में प्रकाशित ‘ओंकारनाथ ठाकुर’। 

दोनों लघु-पुस्तिकाओं में कई दुर्लभ फोटोग्राफ हैं और मूल्य है मात्र ढाई रुपए। नैना देवी वाली पुस्तिका के अंत में यह घोषणा भी की गई थी कि शीघ्र ही कुछ और पुस्तिकाएं प्रकाशित की जाएंगी- अंजनीबाई मालपेकर (नयना रिपजीत सिंह), ओंकारनाथ ठाकुर (वी. मौदगल्य), वाइएस मिराशीबुआ और अनंत मनोहर जोशी (जीएच रानाडे), अलताफ हुसैन खां (एसके सक्सेना) और अरियाकुडी रामानुज आयंगर (वीवी सदगोपन)। 

लेकिन ये सब अमूल्य पुस्तकें अब कहां हैं? संगीत नाटक अकादेमी की वेबसाइट पर जाइए तो इनमें से केवल एक पुस्तिका उपलब्ध है- ‘ओंकारनाथ ठाकुर’। मुझे पूरा यकीन है कि इस पुस्तकमाला में अन्य घोषित पुस्तिकाएं भी अवश्य प्रकाशित हुई होंगी। लेकिन एक को छोड़ कर शेष न जाने कब की अप्राप्य हो चुकी हैं और अकादेमी को उन्हें दुबारा प्रकाशित करने की कोई चिंता नहीं है, बावजूद इसके कि अब उसके पास अच्छा-खासा बजट है और एक विस्तृत प्रकाशन कार्यक्रम भी है। मुझे तो संदेह है कि अकादेमी के पदाधिकारियों को उस्ताद विलायत हुसैन खां द्वारा लिखित पुस्तक के बारे में पता भी होगा। अकादेमी के शुरुआती दशकों में इसके अलावा भी न जाने कितनी अमूल्य पुस्तकें प्रकाशित हुई होंगी, जिनके बारे में न हमें जानकारी है और न ही अकादेमी चलाने वालों को। 

अकादेमी के संग्रहालय में देश के चोटी के संगीतकारों और नृत्यकर्मियों की नितांत दुर्लभ आॅडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग्स हैं। इनमें से केवल चंद रिकॉर्डिंग्स को संगीत रसिकों के लिए उपलब्ध कराया गया है। कुछ वर्ष पहले इनके सीडी निकाले गए हैं। शेष रिकॉर्डिंग्स संग्रहालय में धूल खा रही हैं। इनमें रविशंकर और अली अकबर खां की 1950 के दशक के मध्य की रिकॉर्डिंग्स भी हैं, जब ये दोनों अप्रतिम कलाकार अपनी रचनात्मकता और तैयारी के शिखर पर थे और विदेशी बाजार की उन्हें हवा तक नहीं लगी थी। इनके अलावा उत्तरी और दक्षिणी संगीत के लगभग सभी शिखर व्यक्तित्वों की रिकॉर्डिंग्स भी संग्रहालय में हैं। ऐसे कलाकारों की रिकॉर्डिंग्स भी हैं, जो अपने समय में बहुत प्रतिष्ठित और सम्मानित थे, लेकिन अब लोग उन्हें भूल चले हैं। ऐसे ही एक श्रेष्ठ सितारवादक उस्ताद इलयास खां की सीडी अकादेमी ने निकाली है, लेकिन यह ऐसा अपवाद है, जो नियम के प्रमाण के रूप में सामने आता है। 

इलयास खां जैसे अनेक बेजोड़ कलाकारों की कला के रसास्वादन से संगीतप्रेमी अकादेमी की उदासीनता और लापरवाही के कारण वंचित हैं। सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और संभालने का अर्थ यह नहीं है कि उसे ताले में बंद करके सड़ने के लिए छोड़ दिया जाए। उसका सही


अर्थों में संरक्षण तभी होगा, जब उसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाएगा। लेकिन यह तभी संभव हो सकता है, जब अकादेमी जनता के प्रति जवाबदेही महसूस करे और सरकारी विभाग के बजाय सांस्कृतिक संस्थान के रूप में काम करे।  

अकादमियों और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं के कामकाज की समीक्षा के लिए गठित संसदीय समिति ने भी इसकी जरूरत रेखांकित की थी और कहा था कि अकादमियों की स्वायत्तता तो बरकरार रहनी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही उन्हें जवाबदेह भी बनाया जाए। अध्यक्ष और सचिव के अधिकारों और कर्तव्यों के बीच स्पष्ट विभाजन की जरूरत भी महसूस की गई है, ताकि अस्पष्टता दूर हो और अधिकारों का दुरुपयोग न हो सके। संसदीय समिति को यह कहने की जरूरत इसीलिए पड़ी, क्योंकि ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब अकादमियों में अधिकारों का दुरुपयोग किया गया। इस मामले में संगीत नाटक अकादेमी अकेली नहीं है। 

यह अच्छी बात है कि अकादेमी का अध्यक्ष कोई प्रतिष्ठित कलाकार हो। लेकिन अगर वह ऐसा कलाकार है, जो स्वयं अपनी प्रस्तुतियां देने में या अपनी संस्था चलाने में व्यस्त है, तब वह अकादेमी के काम के लिए न पर्याप्त समय दे सकेगा और न ही उसके भावी विकास के बारे में कोई दृष्टि विकसित कर सकेगा। इसलिए जरूरी है कि अकादेमी के अध्यक्ष के पद की जिम्मेदारी किसी ऐसे अनुभवी कलाकार को दी जाए, जो उसका मार्गदर्शन कर सके और इस प्रभावशाली पद का इस्तेमाल अपने या अपने गुट के संकीर्ण स्वार्थों की सिद्धि के लिए न करे। 

संसदीय समिति ने सांस्कृतिक काडर बनाए जाने की बात भी की है। इसका अर्थ यह है कि जिस तरह से भारतीय राजस्व सेवा या सूचना सेवा के अधिकारियों को प्रशिक्षण देकर तैयार किया जाता है, उसी तरह भारतीय सांस्कृतिक सेवा के अधिकारियों यानी सांस्कृतिक प्रशासकों को तैयार किया जाए, जो संस्कृति की विशिष्ट प्रकृति और आवश्यकताओं की समझदारी से लैस होकर सांस्कृतिक संस्थाओं का प्रशासन चलाएं। 

इस बात की कोई गारंटी नहीं कि संसदीय समिति की यह सिफारिश अमल में आने से मर्ज का इलाज हो ही जाएगा। यह भी हो सकता है कि इन अकादमियों और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं का चरित्र और कामकाज का ढंग नौकरशाही के रंग में और अधिक रंग जाए और ये ‘सांस्कृतिक प्रशासक’ भी उसी तरह से काम करें जैसे अन्य प्रशासक करते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण काम सांस्कृतिक नीति तैयार करने का है और अभी तक किसी सरकार ने इस दिशा में प्रयास नहीं किया है। प्रशासक से केवल यह उम्मीद की जा सकती है कि वह स्वीकृत नीति को कारगर ढंग से अमल में लाएगा। इसलिए उसके ऊपर किसी ऐसी सत्ता का होना जरूरी है, जो उसका मार्गदर्शन करती रहे। 

क्या वक्त आ गया है जब भारत में भी ब्रिटेन की तरह राष्ट्रीय कला परिषद की स्थापना की जाए, जो सभी अकादमियों और सांस्कृतिक संस्थाओं पर निगाह रखे और उनके लिए नीति निर्धारित करे, कुछ-कुछ उसी तरह जैसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग उच्च शिक्षा की संस्थाओं के साथ करता है। यह परिषद केंद्र सरकार के संस्कृति विभाग के प्रति नहीं, बल्कि जनता द्वारा चुनी हुई संसद के प्रति जवाबदेह हो और इसका आॅडिट सीएजी द्वारा कराया जा सके। पिछले दिनों हमने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की कारगुजारियां भी देखी हैं। सच्चाई यह है कि चाहे जितनी बढ़िया व्यवस्था बना ली जाए, जब तक सही व्यक्ति को सही जगह नहीं बिठाया जाएगा, तब तक कहीं कोई सुधार होने वाला नहीं। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी सच है कि सही व्यक्ति भी तभी कुछ कर पाएगा, जब उसे सही व्यवस्था और परिवेश मिले। 


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