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प्रतिक्रिया : सदिच्छा या अनिच्छा PDF Print E-mail
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Sunday, 13 July 2014 10:37

प्रताप दीक्षित

जनसत्ता 13 जुलाई, 2014 : गिरिराज किशोर अपनी टिप्पणी ‘हिंदी और सियासत’ (6 जुलाई) में इस प्रचलित अवधारणा का तार्किक ढंग से खंडन करते हैं कि राज्य आदेश पारित करे तो हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन किया जा सकता है। अगर यह कदम आजादी के तुरंत बाद उठाया जाता तो शायद ऐसा होना संभव था। जिस प्रकार तुर्की में मुस्तफा कमाल अतातुर्क या सोवियत संघ में क्रांति के बाद किया गया। हालांकि इसके पीछे भी राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक कारण थे। इंग्लैंड के कुलीन समाज मेंं फ्रेंच के आधिपत्य से मुक्ति शासन-व्यवस्था ने नहीं, अंगरेजी के साहित्यकारों ने दिलाई। हिंदी भी तुलसी, मीरां आदि की रचनाओं से लोकप्रिय हुई। 

स्वतंत्रता पूर्व हिंदी का ‘सहयोगी भाषाओं के साथ बहनापे का वातावरण’ था। उस समय के तीर्थयात्रियों के अनुभव इसके प्रमाण हैं। दक्षिण के यात्रियों का कुंभ मेले और उत्तर के लोगों का रामेश्वरम् या पुरी में जिस सहृदयता से स्वागत होता था, वह अब भी दुर्लभ नहीं हुआ है। 

भाषाओं की चिरजीविता के दो आधार होते हैं- रोजगार और साहित्य। जब भी इनका संचालन राजसत्ता द्वारा होता है, उनकी गति ह्रासोन्मुख होती है। सार्वजनिक संस्थानों में भ्रष्टाचार, उनका लगातार घाटे में चलना और सरकारी अकादमियों में रेवड़ियां बंटने की हकीकत अब सब जान चुके हैं। दरअसल, ‘स्थानापन्न राष्ट्रभाषा अंगरेजी’ को हटा कर राजसत्ता और नौकरशाही अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहती। सिविल सेवाओं की परीक्षा में किए गए बदलाव इसका ताजा प्रमाण हैं, जिसने हिंदी सहित प्रादेशिक भाषाओं के विद्यार्थियों की मंजिल और दूर कर दी है। ‘अंगरेजी के वरद पुत्रों की अमर बेल’ ने जान-बूझ कर भारतीय भाषाओं के बीच वैमनस्य पैदा किया है, जिससे उनकी गद्दी सुरक्षित-स्थायी बनी रहे, जैसे अंगरेज शासकों ने हिंदुस्तान में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भेदभाव पैदा किया था। 

एक ओर हिंदी को प्रमुखता देने की बात कही जाती है, पर कौन-सी हिंदी? दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता के नाम पर किन्हीं निहित स्वार्थों के तहत एक वर्ग की भावनाओं का दोहन और ध्रुवीकरण संदेह पैदा करता है। 

आजादी के सड़सठ वर्षों बाद भी तथाकथित अभिजात वर्ग अंगरेजी के वर्चस्व के लिए उन्हीं ‘स्थापनाओं’ की पुनर्स्थापना के लिए लगातार प्रयासरत है, जिसका प्रारंभ ब्रिटिश राज में हुआ था। गहराई से विचार करें तो यह यहीं तक सीमित नहीं है। इसके लिए भाषा नीति, सामाजिक-राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं, संभ्रांत वर्ग के प्रभुत्व, सत्ता प्राप्ति के लिए अपवित्र समीकरणों और कॉरपोरेट जगत-बाजार के अंतर्संबंधों


को समझने की जरूरत है। 

हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी किसी छद्म प्रतिबद्धता के तहत या पद-पुरस्कार के प्रलोभन या खुद को ‘आधुनिक सेक्युलर’ सिद्ध करने की प्रतिस्पर्धा मेंं इस ‘व्यवस्था’ के उपकरण बन गए। बाजार के लिए ये स्थितियां मुफीद थीं या कॉरपोरेट जगत की भूमिका परोक्ष रूप से इसके संचालन में मददगार थी। 

गिरिराज किशोर का यह मानना सही है कि ‘सरकारी विभागों, सार्वजनिक उद्यमों, बैंकों, सोशल मीडिया आदि में’ हिंदी को प्रमुखता (वरीयता नहीं!) देने के आदेश से पैदा होने वाले विवाद की सरकार को आशंका नहीं थी। पर ‘अच्छे दिनों’ की बाट जोह रहे लोगों के इंतजार को लंबा खींचने के लिए एक मुद्दे की जरूरत तो थी ही। लेखक का मत, ‘हिंदी को बार-बार असम्मान और विरोध की स्थिति में डाल देने’, ‘ठहरे जल में ढेला फेंक कर तमाशा देखने’ के पीछे क्या किसी ‘सप्रयास-प्रायोजित उपक्रम’ का संकेत नहीं देता? 

भारत बहु-सांस्कृतिक, बहुधर्मी और बहुभाषी देश है। हिंदी निश्चित रूप से सर्वसंपर्क, रोजगार, शिक्षा के माध्यम के रूप में सशक्त भाषा है, पर इसके लिए जिन प्रयासों की जरूरत है, वह सदिच्छा इन सड़सठ वर्षों में दिखाई नहीं दी है। इसके लिए किए गए प्रयासों के दिखावे से हिंदी की, लेखक के शब्दों में ‘बेहुर्मती’ अवश्य हुई है। दरअसल, राजाश्रय कभी भी साहित्य और भाषा की उन्नति के लिए मुफीद नहीं साबित हुआ। भाषा और साहित्य की स्वायत्तता वह प्राकृतिक अहसास है, जिसकी परावलंबी होने से गति अवरुद्ध होती है, लेकिन रुकती नहीं। लेखक का हिंदी के संबंध में उसकी ‘सामर्थ्य और जिजीविषा’ पर विश्वास हिंदी की सक्षमता को व्यक्त करता है।


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