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बहस : प्रचलन और विचलन PDF Print E-mail
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Sunday, 13 July 2014 10:33

महेंद्र राजा जैन

जनसत्ता 13 जुलाई, 2014 : अभी कुछ ही दिन पहले इंटरनेट पर भाषाविज्ञानी प्रो. महावीर सरन जैन का एक लंबा लेख खूब प्रसारित हुआ, जिसमें महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा द्वारा तैयार कराए गए अंगरेजीपरस्त ‘वर्धा हिंदी शब्दकोश’ के बहाने हिंदी में प्रयोग किए जा रहे/ किए जा सकने वाले विदेशी, विशेषकर अंगरेजी शब्दों के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है। पता नहीं सरन का लेख ‘जनसत्ता’ में क्यों नहीं दिखाई दिया। (हमें भेजना लेखक ने शायद मुनासिब नहीं समझा। -सं।)

महावीर सरन ने लिखा है कि अमेरिका से भारत लौटते ही उनके ‘अनेक’ मित्रों ने टेलीफोन पर सूचित किया कि ‘वर्धा हिंदी शब्दकोश’ हिंदी की प्रकृति और गरिमा के विरुद्ध है और वे (महावीर सरन) इसके विरुद्ध लिखें। इसके साथ ही उनके एक मित्र ने उन्हें यह भी बताया कि उन्होंने इस कोश के खिलाफ लिखा है। 

‘वर्धा हिंदी शब्दकोश’ पिछले मार्च से यानी लगभग चार माह से चर्चा में है, जब पहली बार ओम थानवी ने इसकी चर्चा कर सुनियोजित अंगरेजी प्रचार की ओर पाठकों का ध्यान दिलाया था। तो क्या यह माना जाए कि महावीर सरन के ये ‘अनेक’ मित्र पिछले चार माह से उनके भारत लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे? कि भारत लौटते ही उन्हें ‘विभूतिनारायण राय ऐंड कंपनी’ के इस महान कार्य की सूचना देकर उनके खिलाफ धावा बोलने को कहेंगे। पर पांसा पलट गया। कोश के संपादक राम प्रकाश सक्सेना उनके परिचित निकले और महावीर सरन ने कोश न देखे जाने की तार्किक आड़ लेकर कुछ लिखने से मना कर मित्रों को निराश कर दिया। 

चूंकि सरन स्वयं भाषाविज्ञानी हैं और जबलपुर विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष रह चुके हैं, यह मानना गलत नहीं होगा कि उनके निर्देशन में कुछ छात्रों ने भाषाविज्ञान में शोध कार्य भी किया होगा और वे सभी इस समय देश के जाने-माने भाषाविज्ञानी होंगे। मैं अपना दुर्भाग्य ही मानता हूं कि ऐसे किसी विद्वान को नहीं जानता। 

इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि इस कोश के संपादक से महावीर सरन का अच्छा परिचय होने और कोश के संबंध में इतनी चर्चा सुनने के बावजूद उन्होंने अब तक कोश देखने की न तो जरूरत समझी, न उसे देखने में रुचि दिखाई, आनन-फानन में पांच पृष्ठ लंबा लेख जरूर लिख डाला (प्रवक्ता.कॉम पर उपलब्ध)। 

भले महावीर सरन ने अपने लेख में कहा है- और ठीक ही कहा है- कि बिना कोश देखे वे उसके बारे में कुछ नहीं कह सकते, पर उन्होंने विद्वानों से यह भी पूछा है कि हम अपने रोजाना के व्यवहार में अंगरेजी के जिन शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं, उनको कोश में क्यों नहीं शामिल किया जाना चाहिए? ‘‘अंग्रेजी के जिन शब्दों को हिंदी के अखबारों एवं टीवी चैनलों ने अपना लिया है तथा प्रचलन में आ गए हैं, उनको कोश में क्यों नहीं शामिल किया जाए।’’ इसके बाद पूरे लेख में येन-केन-प्रकारेण यही बात दुहराई है। 

महावीर सरन से मेरा विनम्र निवेदन है कि या तो उनके मित्रों ने उन्हें गलत सूचना दी है या मित्रों ने वर्धा कोश के संबंध में जो कुछ कहा, वह वे ठीक से समझ नहीं सके। ‘जनसत्ता’ में इस कोश के संबंध में एक दर्जन से ज्यादा लेख छपे हैं और अगर मैं गलत नहीं हूं तो किसी भी लेखक ने यह नहीं लिखा कि जो शब्द हिंदी में अच्छी तरह प्रचलित हो चुके हैं, उन्हें कोश में स्थान नहीं दिया जाना चाहिए। आपत्ति वस्तुत: उन शब्दों को लेकर है, जिनके लिए हिंदी में पहले से उपयुक्त शब्द उपलब्ध हैं, या जो हिंदी में एक प्रकार से अपरिचित-से हैं। 

ओम थानवी ने शुरुआती लेख में ही यह मान लिया था कि किसी भी भाषा के शब्द हिंदी के अनिवार्य अंग बन गए हों, जिनके बेहतर विकल्प हिंदी में मौजूद न हों, जो शब्द हिंदी की शब्द-संपदा का संख्या में नहीं, गुणवत्ता में इजाफा करते हों, उन शब्दों को हिंदी का अंग स्वीकार करने में गुरेज नहीं होना चाहिए। ‘‘भारतीय भाषाओं से लेकर अरबी, फारसी, तुर्की, पश्तो आदि अनेक दूरस्थ भाषाओं के हजारों शब्द हिंदी में आए हैं। ऐसे शब्दों से हिंदी समृद्ध ही हुई है। इसी धारा में स्टेशन, बस, आलपीन, अलमारी, रेडियो, टेलिविजन, टेलिफोन, कंप्यूटर, फुटबॉल, हॉकी, स्टेडियम, होटल जैसे अंगरेजी के ढेर शब्द जरूरत के मुताबिक हिंदी में रच-बस गए हैं। सही है कि जीवंत भाषाओं में शब्दों की आवाजाही चलती रहती है।’’ (जनसत्ता, 2 मार्च)   

महावीर सरन ने अपने लेख में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जवाब में आए कुछ अंगरेजी शब्द दिए हैं। पर यह पता नहीं चलता कि इस संदर्भ में प्रधानमंत्री के भाषण का उल्लेख करने का मंतव्य क्या है? क्या वे कहना चाहते हैं कि चूंकि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इन शब्दों का प्रयोग किया है (कुछ शब्द हैं- स्कैन इंडिया, स्किल इंडिया, स्किल डेवलपमेंट, एंटरप्रेन्योरशिप) इसलिए हम भी अपनी भाषा में ऐसा ही करें? अगर हां, तब तो यह स्वयं उनके ही लिखे की विसंगति है; उन्होंने लिखा है कि प्रशासनिक शब्द गढ़ते समय यह ध्यान नहीं रखा गया कि वे सामान्य आदमी की समझ में आ सकें। तब फिर ‘एंटरप्रेन्योरशिप’ जैसे शब्द क्या सामान्य आदमी की समझ के शब्द हैं? ‘सामान्य आदमी’ की उनकी परिभाषा क्या होगी- ‘मध्यवर्गीय शिक्षित’ या ‘गांव-देहात का अपढ़ व्यक्ति’? 

महावीर सरनजी ने भाषा की रचना के एक रोचक उदाहरण के रूप में लिखा है: 

‘‘हम कोई पत्र मंत्रालय को भेजते हैं तो उसकी पावती की भाषा की रचना निम्न होती है-

पत्र दिनांक--, क्रमांक-- प्राप्त हुआ।’’

इसे गलत बताते हुए उन्होंने सवाल किया है कि क्या प्राप्त हुआ? क्रमांक प्राप्त हुआ, दिनांक प्राप्त हुआ या पत्र प्राप्त हुआ?   

मेरी तुच्छ बुद्धि में तो यह उदाहरण देकर उन्होंने अकारण एक नया विवाद शुरू किया है। इस वाक्य का अर्थ आठवीं कक्षा के विद्यार्थी की समझ में भी आ जाएगा, क्योंकि वाक्य के शुरू में ही उन्होंने स्वयं ‘पत्र’ लिख कर किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश नहीं छोड़ी है। हिंदी वाक्य रचना की दृष्टि से भी, वाक्य-विन्यास की दृष्टि से भी इसमें कोई दोष नहीं है। क्रमांक प्राप्त हुआ या दिनांक प्राप्त हुआ जैसी बात उन्होंने भले सोच ली, पर कोई भी सामान्य व्यक्ति शायद इतनी दूर की नहीं सोच पाएगा। 

कोश के संपादक राम प्रकाश सक्सेना ने अपने बचाव में लिखे गए लेख (जनसत्ता, 30 मार्च) का प्रारंभ ही यह लिख कर किया था कि पाणिनि के इतने बड़े देश में भाषाविदों का अकाल कैसे पड़ गया? उनकी चिंता वाजिब है। देश में वास्तव में भाषाविदों का अकाल


है, क्योंकि अभी तक इस चर्चा में एक दर्जन से अधिक जिन लोगों ने भाग लिया है वे अपने-अपने विषय के विद्वान भले हों, कोई भी (मेरी जानकारी में) भाषाविज्ञानी नहीं है। मैं जानना चाहूंगा कि सक्सेनाजी की छत्रछाया में पल-बढ़ या पढ़ कर जितने भाषाविज्ञानी निकले हैं या महावीर सरनजी के भाषाविज्ञान विभाग से निकले विद्वान देश में कहां छिपे हुए हैं? महावीर सरनजी के मित्रों की दृष्टि में एकमात्र ‘जाने-माने’ भाषाविज्ञानी महावीर सरन के लेख से कुछ आशा बंधी थी कि वे भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से इस कोश के विषय में नीर-क्षीर विवेक का उदाहरण पेश करेंगे। उन्होंने अपने संपादक मित्र की प्रशंसा में भले दो शब्द लिख दिए, पर उन्हें भी शब्दकोश देखना गवारा नहीं हुआ। अगर उन्होंने कोश देखा नहीं है (था) तो लेख लिखने की जल्दी क्या थी? 

किसी भाषा में कोई नया शब्द अपनाया जाए या नहीं? इसके उदाहरणस्वरूप प्रशासनिक शब्दावली में अब सर्वमान्य ‘अवर’ शब्द पेश करते हुए महावीर सरन ने बड़ी मासूमियत से लिखा है: 

‘‘प्रत्येक मंत्रालय में सेके्रटरी तथा एडिशनल सेक्रेटरी के बाद मंत्रालय के प्रत्येक विभाग में ऊपर से नीचे के क्रम में अंडर सेक्रेटरी होता है। इसके लिए निचला सचिव शब्द बना कर मंत्रालय के अधिकारियों के पास अनुमोदन के लिए भेजा गया। अर्थ संगति की दृष्टि से शब्द संगत था। मंत्रालयों के अधिकारियों को आयोग द्वारा निर्मित शब्द पसंद नहीं आया। आदेश दिए गए कि नया शब्द बनाया जाए। आयोग के चेयरमेन ने विशेषज्ञों से अनेक वैकल्पिक शब्द बनाने का अनुरोध किया। अंडर सेक्रेटरी के लिए नए शब्द गढ़ने में विशेषज्ञों ने व्यायाम किया। जो अनेक शब्द बना कर मंत्रालय के पास भेजे गए उनमें से मंत्रालय के अधिकारियों को ‘अवर’ पसंद आया और वह स्वीकृत हो गया। अंडर सेक्रेटरी के लिए हिंदी पर्याय अवर सचिव चलने लगा। मंत्रालयों में सैकड़ों अंडर सेक्रेटरी काम करते हैं और सब अवर सचिव सुन कर गर्व का अनुभव करते हैं। शायद ही किसी अंडर सेक्रेटरी को अवर के मूल अर्थ का पता हो। स्वयंवर में अनेक वर विवाह में अपनी किस्मत आजमाने आते थे। जिस वर को वधू माला पहना देती थी वह चुन लिया जाता था। जो वर वधू द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाते थे उन्हें अवर कहते थे। चूंकि शब्द गढ़ते समय यह ध्यान नहीं रखा गया कि वे सामान्य आदमी को समझ में आ सकें, इस कारण आयोग द्वारा निर्मित कराए गए लगभग अस्सी प्रतिशत शब्द प्रचलित नहीं हो पाए।’’ 

महावीर सरन की राय में शायद ही किसी को अवर के मूल अर्थ का पता हो। उनके अनुसार ‘अवर’ का मूल अर्थ स्वयंवर में वधू द्वारा अस्वीकृत व्यक्ति है। मैं नहीं जानता कि हिंदी के किस कोश से उन्होंने यह मूल अर्थ लिया है। ग्यारह खंडों वाले हिंदी शब्दसागर में यह अर्थ नहीं है। उसमें प्रथम अर्थ है: ‘‘अन्य/ दूसरा/ और। उदाहरण- गम दुर्गम गढ़ देहु छुड़ाई/ अवरो बात सुनो कुछ भाई।- कबीर’’। इसके अलावा कोश अश्रेष्ठ, अधम, नीच; पिछला (भाग); अंतिम (को.); पश्चिमी (को.); निकटतम; दूसरा (को.); अत्यंत श्रेष्ठ (को.) अर्थ भी ‘अवर’ की पहली प्रविष्टि में बताता है। शब्द की कुल तीन प्रविष्टियां हैं, पर वधू या खारिज वर किसी अर्थ में निर्दिष्ट नहीं हैं।

इसी तरह मानक हिंदी कोश, बृहत् प्रामाणिक हिंदी कोश, बृहत् हिंदी कोश, आदि भी ‘‘वधू’’ को बीच में नहीं लाते। और तो और, वर्धा हिंदी शब्दकोश (वर: ‘‘जो श्रेष्ठ न हो; कनिष्ठ; छोटा; कम; न्यून; निचला; बाद का; अनुवर्ती’’) भी इसमें सरन का साथ न देगा।  

स्पष्ट ही ‘निचला’ की अपेक्षा ‘अवर’ पद अधिक शिष्ट और कर्णप्रिय है। क्या महावीर सरन इससे इनकार करेंगे कि ‘अवर’ का विलोम ‘प्रवर’ होता है, यानी उच्च, ऊंचा, ऊपर या प्राथमिक स्तर का। इसलिए मंत्रालय के विशेषज्ञों ने ‘निचला’ की जगह यदि ‘अवर’ को स्वीकृति दी तो मेरी समझ में यह सही निर्णय था। 

सरनजी के मित्रों ने उन्हें शायद यह नहीं बताया कि स्वयं कोश के संपादक राम प्रकाश सक्सेना के अनुसार यह शब्दकोश मुख्यत: हिंदी सीखने वाले विदेशी विद्यार्थियों के लिए तैयार किया गया है। इसलिए स्वयं महावीर सरन के लेख से उदाहरण लूं तो अपील, अस्पताल, आॅफिसर, इंस्पैक्टर, एक्टर, एजेंट, एडवोकेट, कलर, कमिश्नर, कम्पनी, कॉलिज, कांस्टेबिल, कैम्प, कौंसिल, गजट, गवर्नर, गैलन, गैस, चेयरमेन, चैक, जेल, जेलर, टिकट, डाक्टर, डायरी, डिप्टी, डिपो, डेस्क, ड्राइवर, थिएटर, नोट, पार्क, पिस्तौल, पुलिस, फंड, फिल्म, फैक्टरी, बस, बिस्कुट, बूट, बैंक, बैंच, बैरंग, बोतल, बोर्ड, ब्लाउज, मास्टर, मिनिट, मिल, मेम, मैनेजर, मोटर, रेल, लेडी, सरकस, सिगरेट, सिनेमा, सिमेंट, सुपरिन्टेंडैंट, स्टेशन जैसे हजारों शब्द तो हिंदी शामिल किए ही जाने चाहिए। 

लेकिन, जैसा कि ओम थानवी ने बताया है, अंडरस्टैंडिंग, अटैच्ड, अपीलिंग, अरेस्ट, अर्बन, असेसर, आइसबर्ग, इंजील, इनसालवेंट, इंटरप्रेटर, इंटलेक्चुअल, इंट्रोडक्शन, इंडिकेशन, इंडेफ्थ, डबलटन, हेल्थ, हेमीस्फियर, हीलियम, हारवेस्टर, स्पैनर, स्पेड, स्प्रेयर, स्क्रैप, स्किपर, क्रॉइल, कॉड, लिबरेशन, लिबिडो, लाइवल, रुटीन, रिव्यू, रिलीफ़, रिफ़ॉर्म, रिफ़ार्मर, रिफ़ार्मेटरी, मैन, मैटर्न, बैकयार्ड, बैटलशिप, फ़ीलिंग, फ़ील्डवर्क, फ़ीवर, फ़िक्शन, प्रोटोप्लाज़्म, प्रोटेक्शन, ड्रामेटाइज़ेशन, ड्रीमगर्ल, ड्रेन, ड्रिंक, डेमोक्रेसी, डेफ़िनिशन, डिस्क्रिप्शन, डिजॉल्व, डि-रेगुलेशन, ट्रीटमेंट, क्रॉनिक, क्लासिफ़िकेशन, क्लाइमेट, कामर्सियालाइज़ेशन, कैजुअल्टी जैसे शब्द नहीं, जो कि वास्तव में वर्धा कोश में शामिल किए गए हैं। 

वर्धा हिंदी शब्दकोश के संपादक ने कोश का उपयोग करने वालों के लिए यह भी जरूरी बताया है कि कोश का उपयोग करने से पहले इसकी भूमिका पढ़ लेना आवश्यक है। क्या हिंदी सीखने के लिए भारत आने वाले विदेशी विद्यार्थियों को हिंदी का इतना अच्छा ज्ञान होता है कि भूमिका में लिखी बातें समझ सकें? क्या वे भूमिका में प्रयुक्त प्रेरणार्थक, नासिक्य, आक्षरिक, सकर्मक, व्युत्पादक, व्युत्पत्ति जैसे शब्दों का अर्थ समझ पाएंगे? (जनसत्ता, 18 मई) अगर हां, तब फिर उन्हें हिंदी सीखने के लिए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा या देश के किसी भी विश्वविद्यालय में आने की आवश्यकता ही क्यों होगी? विचार करें।


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