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कभी-कभार : अर्थ की हानि और अड़ियलपन PDF Print E-mail
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Sunday, 13 July 2014 10:23

altअशोक वाजपेयी

जनसत्ता 13 जुलाई, 2014 : एक ऐसे समाज में जिसमें राजनीति को दिन-ब-दिन नए-नए हिस्से और क्षेत्र हथियाने का अवसर मिलता रहता है और हम अपनी निजी और सार्वजनिक जिंदगी के कई हिस्से उसके हवाले करते जाते हैं, सब कुछ को अंतत: राजनीति या उससे निर्धारित मानने का प्रलोभन होना बहुत स्वाभाविक है। पर ऐसा समाज पूरी तरह से मानवीय, सभ्य और लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता, जिसमें राजनीति के अलावा अन्य कई मानवीय, सर्जनात्मक और वैचारिक वृत्तियां सक्रिय न हों और उनके लिए पर्याप्त जगह न हो। राजनीति की तानाशाही को थामने, उसे कुछ सीमाओं का अतिक्रमण न करने देने का दबाव लगातार बनाए रखने और उसे मनुष्य और समाज की अन्य अपेक्षाओं के प्रति संवेदनशील बनाए रखने का काम भी यही वृत्तियां करती या कर सकती हैं। इनकी यह जिम्मेदारी सिर्फ राजनीति को लेकर नहीं होती: धर्म, बाजार, मीडिया, अर्थतंत्र आदि भी इसी जिम्मेदारी के भूगोल के अंतर्गत आते हैं। यह भूमिका और जिम्मेदारी कठिन और जटिल होती हैं और किसी सरलदिमागीपन या अबोधता से काम नहीं चल सकता। सच्चा और सजीव लोकतंत्र वही है, जिसमें किसी भी तरह की तानाशाही या सर्वग्रासिता के निरंतर प्रश्नांकन और प्रतिरोध के अवसर और मंच सक्रिय रहें।

ऐसे प्रतिरोधक लोग अल्पसंख्यक होते हैं: कम ही लोगों में हिम्मत होती है और ज्यादातर हिकमत से काम निकालना, जिंदगी को अक्सर दूसरों की शर्तों पर बिताना पसंद करते हैं। यह आकस्मिक नहीं है कि तानाशाही वृत्तियों को व्यापक जनसमर्थन मिल ही जाता है। फिर यह जनसमर्थन उन वृत्तियों को हाशिये पर ढकेलने के लिए आधार बनता है, जो स्वभाव से ही प्रतिरोधक होती हैं। साहित्य, कलाएं, विचार आदि ऐसी ही वृत्तियां हैं। हमारे समाज में उनकी अल्पसंख्यकता, हाशियापन आदि आसानी से देखे-पहचाने जा सकते हैं। 

लेकिन एक दूसरा पक्ष भी नजर में रखना जरूरी है। यह अल्पसंख्यकता एक तरह की अर्थ की हानि भी करती है। अपने आप में बेहद लोकतांत्रिक और व्यावहारिक होते हुए भी, उदाहरण के लिए, धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत बहुसंख्यक उपेक्षा ही पाता रहा है। सही है कि कई उसके पाखंडी-बेईमान राजनीतिक अमल ने उसके बारे में व्यापक गलतफहमियां उपजाई हैं। लेकिन उसके हाशिये पर चले जाने का एक कारण उसके अर्थ की हानि है: ज्यादातर लोग उसमें कोई कारगर अर्थ खोज नहीं पाते। यह सिर्फ ठीक अर्थ न समझ पाने की भूल भर नहीं है: यह हानि उससे कहीं आगे जाती है। यह उसके अर्थ को एक गलतफहमी से अपदस्थ करना है।

साहित्य और कलाएं अपने अड़ियलपन के लिए, उचित ही, कुख्यात हैं। वे हर हालत में अपने सच पर अड़े रहने के लिए बदनाम हैं। सभी सत्ताएं, जिनमें लोकतांत्रिक सत्ताएं भी शामिल हैं, उन्हें शक की नजर से देखती हैं। यह अड़ियलपन एक बुरी लत भर नहीं है: यह लगभग स्थायी प्रतिपक्षता उनकी लोकतांत्रिक और नैतिक विवशता है। थोड़ा अर्थ खोकर ही वे अपना पूरा अर्थ पाते हैं! 


आलोचना की व्यर्थता

अरसा पहले मैंने पोएट्री सोसायटी आॅफ इंडिया का वार्षिक व्याख्यान ‘कविता की व्यर्थता’ शीर्षक से दिया था। उसे थोड़ा अटपटा जरूर लगा था कि कविता के संवर्द्धन के लिए सक्रिय एक संगठन में उसका एक प्रतिष्ठित व्याख्यान एक कवि कविता की व्यर्थता पर दे! लेकिन वह व्याख्यान उन्होंने आयोजित किया और उसे अपनी पत्रिका में अविकल प्रकाशित भी किया है। अपने देहावसान के कुछ दिनों पहले कवि-कलाविद केशव मलिक से भेंट हो गई थी और उन्होंने अपने लंबे व्यसन की व्यर्थता प्रतिपादित करने वाला वह व्याख्यान रुचि से पढ़ा था। 

मैं सोचने लगा कि अगर आलोचना का याकि आलोचकों का ऐसा मंच होता, तो क्या वहां आसानी से ‘आलोचना की व्यर्थता’ पर बोलने के लिए किसी आलोचक को न्योता दिया जा सकता है? दूसरे शब्दों में, जिस तरह से कभी-कभार कवियों को अपनी विधा की व्यर्थता का बोध सताता-सालता है, क्या उसी तरह से आलोचकों को भी अपनी विधा की व्यर्थता को लेकर बेचैनी होती है? कवियों ने तो कई बार कविता की काया में और उससे अलग भी अपनी या कविता की व्यर्थता का इजहार किया है। मुक्तिबोध ने साहित्य से बहुत अधिक उम्मीद लगाने को मूर्खता करार दिया था और अज्ञेय ने कहा था कि ‘शब्द माना कि सब व्यर्थ हैं’ या कि ‘लिख कर सब झूठा करता जाता हूं’। पर क्या किसी आलोचक ने हिम्मत कर ऐसा कुछ कहने की कोशिश की है? कम से कम मुझे याद नहीं आता। बल्कि रचना के मुकाबले आलोचना को दोयम दर्जे का काम मानने की वृत्ति का आलोचना कई बार तरह-तरह के तर्कों-कुतर्कों से प्रत्याख्यान करती रही है। अपवाद है हाल ही में हमारे एक वरिष्ठ आलोचक का सार्वजनिक बातचीत में यह मानना कि उनकी आलोचना ज्यादातर फरमाइशी रही है। कथक जैसे नृत्य में फरमाइशी परन आदि का चलन है, सिवाय इसके कि उसे पेश करते समय अक्सर नृत्यकार उसे फरमाइशी बता कर पेश करते रहे हैं। यह याद करना कठिन है


कि किसी आलोचक ने करते समय अपनी आलोचना को फरमाइशी कहा हो।

क्या इस सबका कारण यह है कि रचनाकारों की तुलना में आलोचक अपनी विधा को कुछ अधिक गंभीरता से लेते हैं? यह दावा तो शायद ही किया जा सके कि वे अपनी विधा के प्रति रचनाकारों से अधिक जिम्मेदारी महसूस करते हैं। गैर-जिम्मेदार, अवसरवादी, प्रतिबद्धता से बोझिल और विचारों से विपन्न, अक्सर अपठनीय और निंदा-प्रशंसा से अलग या ऊपर उठ कर कुछ नया उत्तेजक और विचारप्रवण कहने में प्राय: अक्षम आलोचना है हमारी। उसे इस सबको लेकर कोई बेचैनी या असंतोष होता हो ऐसा नजर नहीं आता। युवा आलोचकों में से अधिकांश के पास तो अपनी भाषा तक नहीं है- वे पंद्रह-बीस अनर्जित अवधारणाओं और रूढ़ हो गए पदों का सहारा लेकर चलते हैं। उन्हें अपनी नहीं तो अपने से पहले के आलोचकों की कुल मिला कर व्यर्थता का कोई तीखा अहसास हो, इसका कोई साक्ष्य नहीं है। रचनात्मक साहित्य आत्मालोचना प्राय: एक आदत के रूप में करता आया है: आलोचना में हमारे यहां आत्मालोचना का ऐसा अभाव क्यों है? कुल मिला कर पिष्टपेषण से आत्मतुष्ट हमारे ज्यादातर आलोचक ‘संपन्न कायर’ भर हैं, जैसा कि अमेरिकी कवि-आलोचक विलियम लोगन ने कहा है, जिन्हें साहित्य से तो असंतोष रहता है, पर अपने किए-धरे से नहीं!


विचित्र पिकाबिया

वे कवि, चित्रकार, विचित्र प्राणी, विदूषक, विफल, जेबकतरे और प्रतिकलाकार सब कुछ एक साथ थे: वे फ्रांसिस पिकाबिया थे, जिन्हें आन्द्रे ब्रेतां ने ‘दादाओं का दादा’ कहा था और जो बीसवीं सदी के आरंभ में यूरोप में सक्रिय दादा आंदोलन के एक उन्नायक थे। उन्होंने कविता, गद्य, उकसाऊ वक्तव्य, नाराज पत्र, निर्भीक घोषणाएं, सूक्तियां-कटूक्तियां, आदि सब लिखे। लेकिन अब जाकर यानी 2007 में उनका एक बृहत संचयन अंगरेजी अनुवाद में, लगभग बड़े आकार की पांच सौ पृष्ठों की एक पुस्तक ‘आई एम ए ब्यूटीफुल मॉन्स्टर’ एमआइटी प्रेस ने प्रकाशित किया है।

दादा आंदोलन के एक प्रमुख ट्रिस्टान ज़ारा ने कहा था कि ‘पिकाबिया ने सौंदर्य को नष्ट कर दिया है और बचे-खुचे से अपनी कृतियां बनाई हैं।’ पिकाबिया अपनी कटूक्तियों के लिए कुख्यात थे। 1917 में उन्होंने लिखा: ‘ईर्ष्या मुझे लगता है कि फ्रेंच लोगों के सुख में सबसे बड़ी बाधा है।’ उनका मत था कि ‘मेरे लिए सुख है न किसी को आदेश देना, न किसी से आदेश लेना।’ वे मानते थे कि ‘ये विद्वान इतने ठंडे होते हैं, उनके भोजन पर गाज गिरे ताकि उनके मुंह सीख सकें, आग खाना!’ उनकी एक आरंभिक कविता का अंश यों है:

‘यह युग कुछ और नहीं एक बीमार स्त्री है

उसे चीखने-चिल्लाने-बहस करने दो

उसे सारी रकाबियां तोड़ डालने दो।’

क्या तुम नाजुक हो?

बच्चे के हाथों से सावधान रहो!

बच्चा रह नहीं सकता

अगर वह कुछ चीज तोड़ न रहा हो...’

पिकाबिया न अपने को बख्शते थे, न किसी और को। दादा के ही अपने कलाकार-मित्रों के बारे में, जिनमें ज़ारा शामिल थे, उन्होंने लिखा कि ‘तुम लोगों की शालीनता इतनी महान है कि तुम्हारे काम और आविष्कार सिर्फ मक्खियों को आकर्षित करते हैं।’ उनकी जिज्ञासाएं अपार थीं: ‘तुम खुश हो! कल्पना करो कि कोई कल नहीं आने वाला, जिंदगी आज है और आज का कोई अस्तित्व नहीं।’ पिकाबिया ने अपने आसपास जो देखा-जाना दर्ज किया और कई बार उसकी सच्चाई पर संदेह भी किया। उन्होंने पहले कहा: ‘जो लोग बहुत बात करते हैं उनके पास कहने को कुछ नहीं होता।’ फिर एक और सूक्ति जोड़ी: ‘सबसे आश्वस्तिकारी मुखरता मौन की होती है।’

‘जब कला आती है तो जीवन ओझल हो जाता है’ कहने वाले पिकाबिया की मृत्यु 1953 में हुई। उनके जीवित रहते उनकी अंतिम प्रकाशित कविता थी:

चंद्रमा चिमनी के नीचे अंदर चला जाता है/ सड़क पर ठंड है/ मैं सुनता हूं बारिश/ मैं बैठा हूं न किसी का इंतजार करते हुए/ मुझे एक मिली/ मैं दो खोज रहा हूं/ दो पत्तियां/ हार के लिए/ बपौती के/ अकेले भूत के/ जो घसीटता है अपने को प्यार के बाद/ ताकि मेरा हृदय खाली हो सके। 


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