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भाषा : हिंदी की राजनीति PDF Print E-mail
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Sunday, 13 July 2014 10:22

अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

जनसत्ता 13 जुलाई, 2014 : कई बार जब किसी सरल विषय में भी चुनावी राजनीति का प्रवेश हो जाता है, तो वह अनायास जटिल हो जाता है। पक्ष-प्रतिपक्ष के तर्क-कुतर्क और दावों-प्रतिदावों के बीच वह और उलझता जाता है। गृह मंत्रालय की हिंदी से संबंधित पहल और तमिलनाडु के दोनों राजनीतिक ध्रुवों की तरफ से उसके विरोध की घटना के तीन-चार दिन पहले ही एक समाचार आया था कि अनेक अभिभावक वहां के विद्यालयों के प्रबंधन पर इस बात का दबाव बना रहे हैं कि उनके बच्चों को हिंदी भी पढ़ाई जाए, ताकि उनके लिए रोजगार की संभावना तमिलनाडु के बाहर भी बने। तब न तो करुणानिधि ने इस मांग का विरोध किया था और न जयललिता ने। मगर इससे सबक लेने की जरूरत है। भले आज ऐसे अभिभावकों की संख्या कम हो, लेकिन भविष्य में ऐसी मांगें बढ़ सकती हैं, क्योंकि भाषा की वास्तविक नियंता साधारण जनता होती है। बाजार का हिंदी के पक्ष में खड़ा होना, दरअसल इस सच्चाई को स्वीकार करना है। 

बहरहाल, हिंदी की अपनी चाल है और उस पर इस तरह के विरोधों का बहुत प्रभाव नहीं पड़ता। आज हिंदी की इस बेफिक्र चाल का आधार उसकी व्यापक स्वीकार्यता और बहुभाषिक जनसंपर्क की अपरिहार्यता और इसका तेजी से उभरता बाजार है। सात-आठ साल पहले बंगलुरु स्थित एक आधुनिक बहुमंजिली पुस्तकों की दुकान में मैं हिंदी का एक उपन्यास खरीदने गया था, शहर के मिजाज और मांग के अनुसार नीचे से छह मंजिल तक कंप्यूटर विज्ञान और अन्य विषयों की मोटी-मोटी अंगरेजी की पुस्तकें और दुकान के अंगरेजीभाषी कर्मी उपलब्ध थे। एक-एक मंजिल ऊपर चढ़ते, पूछते और कर्मियों से उपेक्षित होते हुए मैं आगे बढ़ा। अंतिम मंजिल पर स्थित हिंदी की किताबों में खोजने के बाद विक्रेता से बड़े साहस से पूछा कि प्रेमचंद का उपन्यास ‘निर्मला’ है? तो जवाब में ‘ना’ और भाव में उपेक्षा थी। मगर इन सबके बीच उसी दुकान में केंद्रीय ध्वनि के रूप में दुकान की व्यवस्था के अनुरूप बज रहे हिंदी गानों की थी। पता नहीं हमारा राजनीतिक समूह इससे सबक क्यों नहीं लेता। 

वैश्विक मंदी के चलते 2012 के दौरान देश में जब अनेक उद्योग बंद हो रहे थे, ‘अग्निपथ’, ‘हाउसफुल-2’, ‘राउडी राठौर’, ‘एक था टाइगर’, ‘बर्फी’, ‘बोल बच्चन’, ‘दबंग-2’, ‘सन आॅफ सरदार’ और ‘जब तक है जान’ जैसी नौ हिंदी फिल्मों ने सौ करोड़ रुपए से अधिक की कमाई की थी। क्या इसके पक्ष या विपक्ष को ये नेता प्रभावित कर सकते थे? स्पष्ट है कि हिंदी ने जिस तरह बाजार के माध्यम से निर्विवाद रूप से आगे का रास्ता अपनाया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। 

किसी भी भाषा के प्रभाव को जबरन न बढ़ाया जा सकता है और न घटाया, बल्कि हर भाषाई बदलाव स्वाभाविक रूप से समय के साथ समाज द्वारा स्वीकृत होता जाता है। आज हिंदी का बाजार इसी प्रक्रिया को समृद्ध कर रहा है। बाजार द्वारा तैयार अनेक शब्द जितनी आसानी से हिंदी में स्वीकृत हो जाते हैं, उतनी आसानी से ये सरकारें नहीं कर पाती हैं। ‘जादू की झप्पी’, ‘राबचिक’, ‘दबंग’, ‘खोखा’ और ‘बाबाजी का ठुल्लू’ जैसे अनेक प्रयोग अपनी नई अर्थवत्ता के साथ आसानी से स्वीकार्य हो रहे हैं। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ जैसी फिल्म ने न सिर्फ भरपूर कमाई की, बल्कि हिंदी-तमिल के राजनीतिक खटास को कम किया है। इन सबके बावजूद हमारा राजनीतिक नेतृत्व इसको स्वीकार करने को तैयार नहीं है, क्योंकि अगर करुणानिधि इसको स्वीकार कर लेंगे तो उनकी राजनीतिक जमीन खतरे में पड़ जाएगी। जिस भाषाई अस्मिता को उन जैसे लोगों ने अपनी राजनीतिक अस्मिता बना रखी है, उसमें सब कुछ अतिरेक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। करुणानिधि ने कभी शंकराचार्य के संस्कृत को देवताओं की भाषा बताने पर कहा था कि ‘तमिलनाडु के जो देवता तमिल नहीं जानते, वे तमिलनाडु छोड़ कर चले जाएं।’ ठीक उसी के बाद करुणानिधि ने दिल्ली में जगह बनाने के लिए जिस दल से हाथ मिलाया, उसका उत्थान ही ‘हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान’ के नारे के साथ हुआ था। 

सच तो यह है कि हिंदी ने अपना रास्ता खुद बनाया है और इस रास्ते की जिस किसी ने सवारी की, उसको लाभ ही हुआ है। नरेंद्र मोदी को गांधीनगर से दिल्ली आने में भी इस रास्ते का कम योगदान नहीं है। एनटी रामाराव, एचडी देवगौड़ा और सोनिया गांधी जैसे अनेक नेताओं ने इस सवारी के लिए ही हिंदी सीखी थी। इस प्रकार अखिल भारतीय पहुंच के लिए हिंदी एक मजबूरी है। महात्मा गांधी से लेकर आज तक जिस किसी नेता ने अपनी अखिल भारतीय पहुंच बनाई है, उसने हिंदी को अपनाया, लेकिन इस क्रम में पीछे छूटी तो खुद हिंदी ही। नहीं तो क्या


कारण है कि जिस भाषा के माध्यम से देश स्वतंत्र हुआ, उसमें इतने वर्षों बाद भी उसका प्रशासन नहीं चल पाता? जाहिर है कि इस बाबत निष्ठा और नेतृत्व-क्षमता की कमी रही है। आखिर ऐसा क्यों है कि जिस धारदार हिंदी के बल पर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, उनकी प्राथमिकता वाले क्षेत्र- सोशल मीडिया में उनके संदेश अंगरेजी में आते हैं? 

हालांकि भारत जैसे बहुभाषी समाज में कोई भाषा थोपी नहीं जानी चाहिए और किसी लोकतांत्रिक समाज में तो लोकांक्षा के विपरीत कोई भाषा थोपी भी नहीं जा सकती। जहां तक हिंदी का सवाल है, इसे कभी थोपा नहीं गया, बल्कि देश की संपर्क-भाषा के रूप में अपने लचीले स्वभाव के कारण हमेशा इसे सहज स्वीकार किया गया है। वैसे बहस का विषय तो यह भी होना चाहिए कि 2001 की जनगणना तक देश की आबादी के जिस इकतालीस प्रतिशत लोगों को हिंदी मातृभाषी के रूप में दिखाया गया है, क्या वाकई उनकी मातृभाषा हिंदी है? संभवत: नहीं। क्योंकि ऐसा होता तो भोजपुरी, अवधी, मगधी, राजस्थानी, बुंदेली आदि की अलग पहचान की मांग नहीं होती। 

अगर इस तथ्य में यह भी जोड़ दिया जाए कि भाषा और बोली का जो संबंध बताया जाता है, वह दरअसल भाषाओं के संबंधों को किसी अधिक्रमिकता के आधार पर देखने की आदत के कारण होता है, जबकि सच यह है कि बोली जैसी कोई संकल्पना नहीं है, जो है सब भाषा है। उसमें कोई छोटी हो सकती है, किसी में लिखित साहित्य का अभाव भी हो सकता है। एक भाषा-परिवार और समान व्याकरणिक व्यवस्था के कारण ही देश में हिंदी में भाषा-बोली वाला तर्क अपना स्थान भी बना पाता है। सत्य यही है कि भोजपुरी भी एक भाषा है और हिंदी भी। इसी क्रम में उन उनचास से अधिक भाषाओं को भी देखा जाना चाहिए, जिसे हिंदी की बोली के रूप में दर्ज किया जाता है। बहरहाल, इस आधार पर जो हिंदी पट््टी के नाम से चिह्नित प्रदेश हैं, वहां भी हिंदी स्वीकार की गई और अलग से सीखी गई भाषा है, मातृभाषा नहीं। 

किसी भाषा के स्थायी विकास और विस्तार उसमें निहित अंतर्वस्तु और उसकी संप्रेषणीयता पर निर्भर करता है, इसमें सत्ताई संरक्षण मिल जाए, तो विस्तार में गति मिल जाती है। ध्यान रहे कि टेलीफोन के आविष्कारकर्ता ग्राहम बेल ने पहली बार इसका प्रयोग किया था, तो ‘सुनिए’ के भाव के लिए फें्रच के ‘हलाउ’ शब्द का प्रयोग किया था, बाद में आंशिक परिवर्तन के बाद अंगरेजी में यह ‘हैलो’ हो गया और आज तक यह फोन के प्रयोग की परोक्ष शर्त के रूप में सर्वत्र व्याप्त है। 

इसी प्रकार कंप्यूटर के विकास ने अनेक अंगरेजी शब्द दिए, जो उसी रूप में सभी समाजों में स्वीकृत हो गए। आज जो लोग खुद को हिंदी का पक्षधर दिखाना चाहते हैं, उन्हें इस क्षेत्र पर काम करना चाहिए, ताकि हिंदी में उस परिदृश्य का विकास हो सके, जहां हिंदी को इसकी फिल्मों की तरह ही स्वीकार करने के लिए किसी सरकारी आदेश या दंड के प्रावधान की आवश्यकता न हो, बल्कि वह सहज और निर्विवाद हो। इस तरह जिस भाषा का विकास होगा वह स्थायी होगा और भाषा अपने समाज की अभिव्यक्ति का सही मायनों में माध्यम होगी, वरना मात्र बाजार के भरोसे किसी भाषा का विकास तो होगा, लेकिन अभिव्यक्ति की क्षमता में कमी आएगी। बाजार का हित तो अपने लाभ में है और प्रत्युत्पाद के रूप में हिंदी का विकास हो रहा है, लेकिन सरकार जब निष्ठा से इस संदर्भ में काम करेगी, तो उसका लाभ भाषा को मिल सकता है। 

कुछ जिम्मेदारी हिंदी समाज की भी बनती है कि कुछ तो ऐसा करें कि बंगलुरु की उस पुस्तक की दुकान की पहली मंजिल पर भी हिंदी की पुस्तक मिल जाए और विक्रेता ग्राहक को हेय दृष्टि से न देखे। 


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