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पुस्तकायन : सिनेमा का रंजक संसार PDF Print E-mail
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Sunday, 13 July 2014 10:20

राजेंद्र बोड़ा

जनसत्ता 13 जुलाई, 2014 : भारतीय सिनेमा के सौ साल पूरे होने पर हिंदुस्तानी फिल्मों के विभिन्न पहलुओं पर अनेक पुस्तकें आर्इं। अब जब सौ साल का खुमार उतार पर है, प्रहलाद अग्रवाल का एक विशाल ग्रंथ हिंदी सिनेमा आदि से अनंत... हमारे सामने है। इसे हिंदी फिल्मों का लोकप्रिय सार भी कह सकते हैं। चार खंडों में विभक्त यह ग्रंथ हिंदी फिल्मों की सौ साल की कहानी कहता है। हालांकि इसके मूल सूत्रधार ‘संगीत, साहित्य और सिनेमा से गहरी आशिकी’ रखने वाले प्रहलाद अग्रवाल हैं, मगर यह कहानी अनेक लेखकों ने मिल कर लिखी है, जो सभी फिल्मों के उन जैसे ही आशिक हैं। 

पश्चिम में ‘टॉप टेन’ या ‘टॉप हंड्रेड’ फिल्मों का चयन करने का चलन है। कभी यह चयन आम दर्शकों के मतों से किया जाता है, तो कभी सिने जानकारों और प्रबुद्धजनों का यह चयन होता है। वे चयनित दस या सौ फिल्मों को उनकी लोकप्रियता के हिसाब से क्रमबद्ध करते हैं। हरेक चयन यह भी बताता है कि चयनित फिल्मों की विशेषताएं क्या हैं और वे अमुक सूची में क्यों हैं। 

प्रहलाद अग्रवाल अपने ग्रंथ में दस या सौ फिल्मों की सूची लेकर पाठकों के सामने नहीं आए हैं। उनकी सूची लगभग हजार फिल्मों की है। इस बहाने वे भारतीय सिनेमा का समूचा इतिहास कहने का प्रयास करते हैं। मगर यह भारतीय सिनेमा का या भारतीय फिल्मों के सौ साल का समग्र इतिहास भी नहीं है। यह ग्रंथ सौ सालों में बनी फिल्मों का मोटा-मोटा लेखा-जोखा है, जो किसी खास नजरिए से नहीं किया गया है। इसे हम हिंदी फिल्मों की एन्साइक्लोपीडिया की श्रेणी में भी नहीं रख सकते। 

फिल्मों की लोकरंजकता और उस कालखंड, जिसे हम आज हिंदी फिल्मों का स्वर्णकाल कहते हैं, में आम जन का फिल्में देखने का दीवानापन इस ग्रंथ का आधार है। इसलिए इसमें शुरू से अब तक उन फिल्मों का वर्षवार विश्लेषण और जिक्र है, जिन्होंने किन्हीं न किन्हीं कारणों से लोगों को लुभाया। 

जैसा कि हमने कहा, सौ साल की फिल्मों की कहानी फिल्मों के आशिकों ने लिखी है। आशिक को अपनी महबूबा में कोई ऐब नजर नहीं आता। इसलिए जिन फिल्मों का जिक्र इस ग्रंथ में किया गया है, वह पूरे भक्तिभाव से किया गया है। उनके लिए हर फिल्म महान है। विश्लेषित फिल्मों में भी केवल खूबियां दिखी हैं। कोई फिल्म कला की ऊंचाइयां लेते हुए ‘सिनेमा’ कब बनती है, इस झमेले में ग्रंथ के रचयिता नहीं पड़े हैं। 

विश्लेषण के लिए इस ग्रंथ में भी एक सौ आठ फिल्में ली गई हैं। इनके अलावा करीब आठ सौ फिल्मों को टिप्पणियों के जरिए दर्ज किया गया है। कुल सोलह विश्लेषणात्मक आलेख और सभी टिप्पणियां प्रहलाद अग्रवाल की हैं। शेष आलेख अलग-अलग लेखकों के हैं, जिनमें कुछ के एक से अधिक आलेख भी हैं। 

ग्रंथ में कई लेखकों के आलेख होने से कुछ विरोधाभासी बातें भी दर्ज हो गई हैं, जिससे पाठक जरूर मुश्किल में पड़ जाता है। मसलन, प्रहलाद अग्रवाल पहले खंड के अपने आलेख में 1933 में बनी ‘यहूदी की लड़की’ के बारे में बताते


हुए कहते हैं कि ‘(कुंदन लाल) सहगल को नायक के रूप में पहली बार इसी फिल्म से प्रसिद्धि मिली।’ पर इसके अगले ही लेख में विनोद सोंथालिया कहते हैं ‘इसी (चंडीदास/1934) फिल्म ने सबसे पहले सहगल को एक अभिनेता के रूप में सफल और स्वीकार्य बनाया।’ पाठक किसे सही मानें? 

राज कपूर की फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ पर हरी मौर्य का आठ पेज का आलेख है। आलेख का अधिकतर हिस्सा फिल्म का कथानक ही बताता है। लेकिन वे पाठक को यह बताना भूल जाते हैं कि इसकी कहानी और पटकथा के लेखक थे अर्जुनदेव रश्क। इतने बड़े आलेख में लेखक यह भी बताना मुनासिब नहीं समझता कि इस फिल्म के निर्देशक राज कपूर नहीं, उनकी लगभग सभी फिल्मों के सिनेमेटोग्राफर रहे राधू करमाकर थे। इसलिए यह ग्रंथ एक समग्र इतिहास नहीं है। 

‘जय संतोषी मां’ (1975) को अग्रवाल ‘एक युगांतरकारी कल्ट फिल्म’ बताते हैं। अंगरेजी में ‘कल्ट’ शब्द का प्रयोग किसी धर्म या संप्रदाय के लिए होता है, वह भी बुरे अर्थ में। यह फिल्म वर्ष 1975 की सफलतम फिल्मों में गिनी जाती है। उसका महत्त्व सिर्फ इतना है कि वह पांच-साढ़े पांच लाख रुपए के मामूली बजट से बनी थी और रमेश सिप्पी की ‘शोले’ और गुलशन राय निर्मित और यश चोपड़ा निर्देशित ‘दीवार’ जैसी फिल्मों की आंधी के सामने टिकी ही नहीं रही, बल्कि अपने निवेश पर जबर्दस्त मुनाफा भी कमाया। मगर इससे वह फिल्म ‘युगांतरकारी’ कैसे हो जाती है? 

हम देखते हैं कि पचास से साठ वर्ष या उससे ऊपर के फिल्म दर्शकों के लिए समय लगभग 1970 के दशक तक आकर ठहर जाता है और तीस साल से नीचे के दर्शकों के लिए हिंदी फिल्मों का इतिहास 1970 के दशक से शुरू होता है। इस ग्रंथ की सफलता इसी में है कि वह दोनों पीढ़ियों को एक-दूसरे के जमाने की फिल्मों की रंजक जानकारी देता है। यह किताब उनजन साधारण की रुचियों वाली मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों, जिनमें लोकप्रिय नाच-गाने और मेलोड्रामा होता है, की जम कर वकालत करती है। 

 हिंदी सिनेमा आदि से अनंत... (चार खंड) : प्रहलाद अग्रवाल; साहित्य भंडार, 50 चाहचंद (जीरो रोड), इलाहाबाद; 1000 रुपए प्रति खंड।


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