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पुस्तकायन : भूमंडलीय समय में समीक्षा PDF Print E-mail
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Sunday, 13 July 2014 10:18

पुरुषोत्तम अग्रवाल

जनसत्ता 13 जुलाई, 2014 : पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखी गई समीक्षाओं की अपनी सीमाएं होती हैं। शब्द संख्या से लेकर लिखने के लिए उपलब्ध समय तक। तात्कालिकता ऐसी समीक्षाओं में अंतर्निहित है। इसी कारण, ऐसी समीक्षाओं को साहित्यिक आलोचना का दर्जा देने में लोगों को संकोच होता है। दूसरी ओर, तथाकथित एकेडमिक या शास्त्रीय आलोचना आत्मसजग रूप से ही सीमित बिरादरी के लिए लिखी जाती है। अध्यापकों द्वारा लिखी जाने वाली शास्त्रीय आलोचना के प्रसंग में जड़ता और समकालीन लेखन के प्रति संवादहीनता की शिकायत आम है। 

ऐसे माहौल में, कवि-कथाकार प्रियदर्शन के ग्लोबल समय में गद्य और ग्लोबल समय में कविता समीक्षा-संकलनों से गुजरना दोनों तरह की समस्याओं से मुक्ति की सुखद अनुभूति से गुजरना है। शीर्षकों में विराजमान शब्द, ‘ग्लोबल’ का औचित्य प्रियदर्शन कविता-केंद्रित समीक्षाओं की भूमिका में बताते हैं: ‘‘बीते दो दशकों से हम एक ग्लोबल समय में रह रहे हैं। इस समय में आधुनिक दौर की बहुत सारी पहचानें पीछे छूट चुकी हैं। राष्ट्रवाद एक बीता हुआ प्रत्यय लग रहा है। औद्योगिक क्रांति को अपदस्थ कर सूचना क्रांति चली आई है। केंद्रवाद की जगह स्थानिकता ने ले ली है। मध्यवर्ग की जगह उपभोक्ता वर्ग चला आया है। हाशिये अब ज्यादा मुखर हैं, और आसानी से पहचाने जा रहे हैं। यह समय जैसे एक नया आदमी बना रहा है, एक नया समाज गढ़ रहा है। यह नया समय नई अस्मिताओं, नई राजनीति, नई बर्बरताओं और नए प्रतिरोधों का है।’’ 

गद्य-समीक्षाओं की भूमिका में, प्रियदर्शन कहते हैं, ‘‘इस किताब में शामिल टिप्पिणयां चुनते समय मेरा ध्यान खासकर इसी बात पर रहा है कि आलोचना मूलत: अपने समकालीन कृतित्व से एक संवाद की स्थिति बनाए। ये टिप्पणियां शायद शास्त्रीय अर्थों में आलोचना से कुछ कम मालूम पड़ सकती हैं। लेकिन इनकी मार्फत अगर कई कृतियों को लेकर एक साफ समझ बनाने का रास्ता खुलता है और कृतियों के मूल्यांकन के कई नए सूत्र मिलते हैं तो यही इनकी सफलता है।’’

समीक्षक द्वारा अपने लिए निर्धारित कसौटी पर ये टिप्पणियां बहुत दूर तक खरी उतरती हैं, गद्य के प्रसंग में ज्यादा, कविता के प्रसंग में कम। आलोचना की सफलता की कसौटी यही है कि वह रचना को लेकर साफ समझ बनाने में, मूल्यांकन के सूत्र खोजने में मदद करे। ‘अध्यापकीय’ और ‘शास्त्रीय’ को पर्यायवाची मानने के सरलीकरण से अगर बचा जाए, तो समीक्षा चाहे ‘आम पाठकों के बीच’ पहुंचने के इरादे से लिखी गई हो, या ‘साहित्येतिहास में दिलचस्पी रखने वालों के लिए’; वह ‘शास्त्रीय आलोचना’ तभी बनती है, जब रचना-विशेष पर टिप्पणी करते हुए, कुछ बृहत्तर प्रश्नों से टकराए, उपलब्ध प्रतिमानों पर पुनर्विचार का प्रस्ताव करे और साहित्यिक-सांस्कृतिक मुद्दों और जिज्ञासाओं के संदर्भ में व्यापक निष्कर्षों को रेखांकित करने का साहस विश्वसनीय ढंग से करे। 

इस लिहाज से देखें, तो कहना होगा कि प्रियदर्शन की ये टिप्पिणयां ‘शास्त्रीय आलोचना से कम’ मालूम पड़ने के बजाय, उसी की दिशा में बढ़ने की आकांक्षा और सामर्थ्य के विश्वसनीय प्रमाण देती मालूम पड़ती हैं। 

‘परती-परिकथा’ पर प्रियदर्शन कहते हैं, ‘‘कठोर वैचारिक औजारों से रचनाओं की चीरफाड़ करने वाले सख्त आलोचकों को शायद यह उपन्यास पसंद न आए, लेकिन मेरी तरह के प्राथमिक पाठकों के लिए परती परिकथा पढ़ना पाठ के एक रोमांचक अनुभव से गुजरने जैसा रहा है।’’ यह उपन्यास जब छपा था, तब ‘रचनाओं की चीरफाड़ करने वाले सख्त आलोचक’ आज की तुलना में ज्यादा ही सक्रिय थे। रचनाकार का वैचारिक गोत्र मूल्यांकन में तब भी भारी भूमिका अदा करता था। उन दिनों, शिवदानसिंह चौहान ने इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास की ओर से मोर्चा संभालते हुए रेखांकित किया था, ‘‘...आलोचक के पूर्वग्रह कितने संक्रमणकारी होते हैं, क्योंकि वह उन्हें पाठकों तक प्रेषित करता है, और उनकी रुचि को भी जड़ीभूत कर देता है- श्रेष्ठ साहित्य के प्रति असंवेदनशील।’’ 

 ‘श्रेष्ठ साहित्य के प्रति असंवेदनशीलता’ का उपचार करने के लिए अश्रेष्ठ या अल्पश्रेष्ठ साहित्य की पहचान भी जरूरी है। प्रियदर्शन की टिप्पणियां यह काम बखूबी करती हैं, हालांकि, दो-टूकपन पर कम और विनम्रता पर अधिक भरोसा करते हुए। प्रमाण के लिए दूधनाथ सिंह के उपन्यासों (या कहानियों?)- ‘नमो अंधकारं’ और ‘निष्कासन’ पर लिखा गया लेख याद किया जा सकता है। यहां ऐसे मार्मिक वाक्य हैं, जो याद दिलाते हैं कि प्रियदर्शन खुद कितने संवेदनशील कवि और कथाकार हैं; ‘लेखक का काम इस मायने में ज्यादा जटिल है कि जो दुनिया ईश्वर से छूट जाती है, वह लेखक रचता है’ और, ‘दिल्ली मूलत: कैफियतों की नगरी है, कहानियों की नहीं’। 

साथ ही, यहां समर्थ आलोचकीय दृष्टि है, जो ‘नमो अंधकारं’ के संदर्भ में नोट करती है, ‘अपनी शुरुआत से ही उपन्यास विकृतियों में रस लेता दिखाई पड़ता है’, और ‘कथा-दृष्टि की सर्वाधिक मार स्त्री चरित्रों पर पड़ी है, जिनका समूचा पक्ष अनकहा रह गया है।’ दोनों रचनाओं की भाषा के बारे में प्रियदर्शन की राय है कि वह, ‘चरित्रों और स्थितियों को दर्शनीय अधिक बनाती है, महसूस करने योग्य कम रहने देती है।’ समीक्षक का निष्कर्ष यह कि ‘व्यक्ति महत्त्वपूर्ण हो गए हैं, मुद्दे गौण, यह खयाल लेखक को होता तो हमें ज्यादा बड़े उपन्यास पढ़ने को मिलते।’ 

आलोचना की सामर्थ्य का एक प्रतिमान रचना का चुनाव भी है। प्रियदर्शन ने रेणु, राजेंद्र यादव, दूधनाथ सिंह, गीतांजलिश्री, ओम थानवी


और अलका सरावगी जैसे चर्चित गद्यकारों पर और नागार्जुन, ज्ञानेंद्रपति, अरुण कमल, पंकज सिंह, विष्णु नागर और अर्चना वर्मा सरीखे कवियों पर तो लिखा ही है, वीरेंद्र जैन के महत्त्वपूर्ण, पर उपेक्षित उपन्यासों और मनमोहन की कविताओं पर भी ध्यान दिया है। 

समीक्षाओं के इन संकलनों में दो टिप्पणियां ऐसी हैं, जहां प्रियदर्शन किसी रचना पर समीक्षा लिखने के बजाय गंभीर साहित्यिक-सांस्कृतिक विवादों में अपनी स्थिति स्पष्ट करने की बेचैनी से गुजरते हैं। एक है, गुंटर ग्रास की इजराइल विषयक कविता पर लिखी गई टिप्पणी और दूसरी मिलान कुंदेरा के उपन्यास, ‘लाइफ इज एल्सवेयर’ में कवि नायक के बहाने कविता पर की गर्इं प्रतिकूल टिप्पणियां। ब्योरा स्वयं प्रियदर्शन के शब्दों में, ‘‘कुंदेरा के मुताबिक कवि कल्पना के एक संसार में रहता है- वह शब्दाडंबरों को जैसे सच मान बैठता है। चेकोस्लोवाकिया में कम्युनिस्ट क्रांति के नाम पर जो ज्यादतियां हुर्इं, उसे भुला कर वह क्रांति के गान गाता रहा। 

उपन्यास में एक दृश्य है- पुलिस मुख्यालय में कविता पाठ का आयोजन किया गया है। कवि हैं, और उनके साथ चर्चा है। बाद में उपन्यासकार लिखता है, यह ऐसा समय था, जिसमें कवि और जल्लाद साथ-साथ थे। कुंदेरा का कहना है कि उपन्यासकारों ने भी क्रांति के समर्थन में उपन्यास लिखे। लेकिन वे बेजान उपन्यास थे, क्योंकि उनमें नकली यथार्थ था, जो बड़ी आसानी से पकड़ में आता रहा। लेकिन कवियों ने इस दौर में बहुत ही अच्छी कविताएं लिखीं। क्योंकि उनकी कविता जमीन के यथार्थ से नहीं, अपनी कल्पना से पैदा होती रही। कहीं यह तर्क दिखता है कि कई क्रांतिकारी और क्रांतिकामी कवि अपनी कल्पना से एक हिंसक क्रांति के लिए समर्थन का संसार बनाते रहे।’’

प्रियदर्शन को, ‘‘कुंदेरा में कवि के प्रति एक द्वेष-भाव दिखाई पड़ता है।’’ व्यक्तिगत कारणों से राग-द्वेष रहा भी हो सकता है, लेकिन उस उपन्यास में, अपने खास अंदाज में कुंदेरा जो सवाल उठा रहे हैं, उन्हें ‘द्वेष-भाव’ के खाते डाल दाखिल-दफ्तर नहीं किया जा सकता। प्रियदर्शन जब खुद अपने समाज के क्रांतिकामी कवियों का काव्य-कर्म याद करते हैं, तो उन्हें मानना पड़ता है, ‘‘स्वत:स्फूर्तता कविता को एक तरह की संवेदनसंकुलता भले दे, विचारसंपन्नता नहीं देती। उसके लिए ठहरना पड़ता है, पलट कर अपनी कविता को नए सिरे से देखना पड़ता है, अपनी ही भावनाओं पर संदेह करना होता है। जब ईमां रोकने की कोशिश करे और कुफ्र खींचने की, तब काबे और कलीसे को ठीक से पहचानने का जतन ही किसी को मिर्जा गालिब बनाता है।’’

लेकिन टिप्पणी के अंत में कुंदेरा की ‘सारी औपन्यासिक दलीलों के बावजूद’; ‘गद्य के सयानेपन और समाज को ज्यादा खरे ढंग से देखने की तमीज’ के बावजूद, प्रियदर्शन आग्रहपूर्वक ‘‘कवि के साथ खड़ा होना पसंद’’ करते हैं, क्योंकि, गद्य में, ‘‘वह कल्पनाशीलता कहां से आ सकती है, जिसमें शमशेर का एक आदमी दो पहाड़ों को कोहनियों से ठेलता पूरब से पश्चिम को एक कदम से नापता बढ़ता चला जाए और सारी तकलीफों के बीच किसी मुक्तिबोध को हजारों रास्ते बांहें फैलाए मिला करें।’’

कुंदेरा में कवि के प्रति द्वेष-भाव अगर हो भी तो उसका प्रतिवाद कोरे भावुक प्रेम-भाव से नहीं किया जा सकता। कुंदेरा का वह उपन्यास कविता में, उपन्यास से कहीं बहुत अधिक कल्पना और शब्दाडंबर की भूमिका, अमूर्तन की संभावना और उसके कुप्रभावों की ओर सही ध्यानाकर्षण करता है। उपन्यास में अमूर्तन की वह छूट नहीं होती, संवेदन-संकुलता और भाषिक चमत्कार के प्रभाव उत्पन्न करने की उतनी गुंजाइश नहीं होती। इसीलिए उपन्यास पर पाठकीय प्रतिक्रिया, तुरंता सराहना- ‘वाह क्या बात है, एक बार और’- किस्म की नहीं हो पाती। राजनीतिक उपक्रमों के समर्थन में ‘जानदार’ कविता लिखना ‘जानदार’ उपन्यास लिखने की तुलना में कहीं अधिक संभव है- कुंदेरा की यह चिंता गंभीर पड़ताल की मांग करती है। 

ति-उत्साह के ऐसे इक्के-दुक्के उदाहरणों को अगर छोड़ दें तो इन संकलनों के बारे में खुद प्रियदर्शन का वह वाक्य दोहराया जा सकता है, जो उन्होंने कृष्ण कुमार की किताब की समीक्षा करते हुए लिखा है, वे ‘‘एक विचारोत्तेजक लेखक हैं- किन्हीं क्रांतिकारी स्थापनाओं की वजह से नहीं, बल्कि अपनी उस सूक्ष्म दृष्टि के कारण जो किसी विषय के कई संवेदनशील और अलक्षित पहलू हमारे सामने लाकर हमें लगभग चौंका देती है।’’ 

ग्लोबल समय में गद्य, ग्लोबल समय में कविता: प्रियदर्शन; वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; क्रमश: 450 और 300 रुपए। 


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