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वक़्त की नब्ज़ : परिवर्तन पर पहरा PDF Print E-mail
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Sunday, 13 July 2014 10:10

altतवलीन सिंह

जनसत्ता 13 जुलाई, 2014 : यह लेख बजट के बारे में नहीं है। लेकिन शुरुआत इस बात से करना चाहूंगी कि जिस तरह वित्त मंत्री ने फूंक-फूंक कर कदम रखे हैं वैसे ही फूंक-फूंक कर कदम रख रही है मोदी सरकार। प्रधानमंत्री जी क्या आप भूल गए हैं कि जिस लहर ने आपको गुजरात से दिल्ली पहुंचाया है उस लहर का इंजन था एक शब्द-परिवर्तन?

उस परिवर्तन को आप कैसे लाएंगे अगर आप पिछली सरकार के नक्शे-कदम पर चलते रहेंगे? आपको देश में परिवर्तन लाना है तो पहले आप उन तमाम गलत कानूनों को कूड़ेदान में फेंकिए जो सोनिया-मनमोहन सरकार आपके लिए छोड़ गई है विरासत में। मिसाल के तौर पर वह भूमि अधिग्रहण कानून जिसके होते हुए आप कभी नहीं बना पाएंगे वे सौ नए शहर जिनके निर्माण का सपना आप देख रहे हैं।

इसलिए कि इस कानून के तहत भूमि अधिग्रहण तकरीबन असंभव कर दिया गया है। कोई सरकार अगर अधिग्रहण करना चाहे किसी शहर, सड़क या हवाई अड्डे के निर्माण के लिए तो किसानों को इतना मुआवजा देना होगा कि ये चीजें बन ही नहीं सकेंगी। उदाहरण चाहिए अगर तो मुंबई के नए हवाई अड्डे की तरफ नजर कीजिए जो रुक गया है इसलिए कि किसानों ने अपनी जमीन की वे कीमतें लगार्इं इस कानून से हौसला लेकर कि महाराष्ट्र सरकार दे नहीं पाई।

गलत कानून और भी बने पिछले दशक में जिनमें अहम है सोनिया गांधी का खाद्य सुरक्षा कानून। अनुमान लगाया जाता है कि इस पर 125 हजार करोड़ का खर्च होगा अगले साल तक। इस खर्च से अगर इस देश के गरीब बच्चों का कुपोषण दूर हो जाता तो खर्च बेकार न होता। लेकिन ऐसा नहीं होगा। इसलिए कि बच्चों तक इस सस्ते अनाज को पहुंचाने का जरिया ही टूटा पड़ा है। ज्यादातर पैसा पहुंचेगा भ्रष्ट अधिकारियों की जेबों में और अनाज पहुंचेगा काले बाजार में। 

कहने का मतलब यह है कि इस योजना का वही हाल होगा जो मनरेगा का हुआ है। इस ग्रामीण रोजगार योजना पर 2006 से लेकर आज तक कोई दो लाख करोड़ खर्चा गया है। लेकिन ग्रामीण भारत में आज भी सबसे बड़ी समस्या है बेरोजगारी। चुनावों के दौरान मैं जब भी किसी गांव में पहुंचती थी मनरेगा के बारे में जानकारी लेती थी। मालूम यह हुआ कि जिन लोगों को जरूरत थी सौ दिन सालाना रोजगार की उन्हें मनरेगा के बारे में पता तक नहीं था। बिहार के एक गांव में भूमिहारों से खूब शिकायतें सुनने को मिली मनरेगा में भ्रष्टाचार की। उसी गांव में मुझे मिले मुसहर जो जानते तक नहीं थे इस योजना के बारे में। इतने बेहाल थे ये लोग कि उनकी बस्ती तक सड़क भी नहीं जाती थी। कच्चे मकानों की इस बस्ती में जब घूमी तो वही हाल पाया जो कभी बंधुआ मजदूरों का होता था। क्या ऐसा होता अगर मनरेगा से परिवर्तन आया होता?

पिछले दशक के बारे में आजकल कहा जाता है कि भारत के इतिहास में इसे सबसे बेकार दशक माना जाएगा क्योंकि ऐसी नीतियां, ऐसे कानून बनाए गए जिनसे न देश में विकास आया न परिवर्तन। इन नीतियों को अगर पिछली सरकार ने बनाया होता तो भी बात समझ में आती। लेकिन यह


काम सोनिया गांधी ने सौंपा सलाहकार समिति को जिसमें आसीन थे कई किस्म के गैर-सरकारी संस्थाओं के सदस्य। इनके इरादे बेशक नेक रहे होंगे। लेकिन क्योंकि प्रशासन के बारे में इनकी समझ कम थी इसलिए इन्होंने ऐसी योजनाएं बनार्इं जो सिर्फ कागजी तौर पर कामयाब होती हैं। समझ में नहीं आता कि नई सरकार क्यों मनरेगा जैसी योजनाओं को अपना रही है।

क्या अभी से नए मंत्रियों पर शिकंजा कसा गया है आला अधिकारियों का? लटियंस दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में ये सबसे पुराने खिलाड़ी हैं और हमेशा इनका ही बस चलता है क्योंकि सरकारें आती हैं, जाती हैं लेकिन ये लोग वहीं के वहीं रहते हैं। इन आला अधिकारियों को सख्त नफरत है परिवर्तन से। सो जब भी कोई हिम्मतवाला प्रधानमंत्री या मंत्री इनके सामने प्रशासन के नए अंदाज पेश करता है ये छटे हुए खिलाड़ी अच्छी तरह जानते हैं उसे ठिकाने लगाने के तरीके। वह इसलिए कि लालफीताशाही का जो चक्रव्यूह इन्होंने तैयार किया है उसमें से निकलने का रास्ता वही जानते हैं। 

ऊपर से ये लोग माहिर हैं जनता को राजनेताओं से दूर रखने में और राजनेताओं के पीठ के पीछे उनकी छवि बिगाड़ने में। जहां वे मंत्रीजी को सुझाव देते हैं पत्रकारों से दूर रहने की वहीं वे खुद मिलते रहते हैं पत्रकारों से और उन्हें सुनाते हैं मंत्रीजी की गलतियों के किस्से। अगर कोई योजना सफल होती है तो उसका श्रेय ये बाबू लोग खुद लेते हैं और अगर असफल होती है तो उसका दोष डाल देते हैं नेताजी पर।

माना कि प्रधानमंत्री गुजरात से लंबा अनुभव लेकर आए हैं। लेकिन शायद जानते नहीं हैं कि दिल्ली के आला अधिकारी कितने चतुर हैं। पहला काम यही करेंगे कि प्रधानमंत्री और जनता के बीच में दूरियां बढ़ती रहें। सो विनम्रता से मेरा सुझाव प्रधानमंत्री को यह है कि वे हर महीने या हर दूसरे महीने टीवी के जरिए जनता को संबोधित करते रहें। जो सुधार वे लाना चाहते हैं प्रशासन में जनता को खुद समझाएं जैसे चुनाव अभियान में उन्होंने किया था। प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे इस देश के आम आदमी के साथ बात कर सकते हैं ऐसी भाषा में जो जनता समझती है अच्छी तरह। इस ताकत को कमजोर करने की खूब कोशिश करेंगे दिल्ली के आला अधिकारी। सो अपनी भलाई के लिए प्रधानमंत्री जी जनता से रिश्ता कामय रखें।


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