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चिराग तले PDF Print E-mail
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Saturday, 12 July 2014 09:18

निवेदिता

जनसत्ता 12 जुलाई, 2014 : बाजार केंद्रित मीडिया के लिए युवा महिला एंकर तनु शर्मा की आत्महत्या की कोशिश कोई मायने नहीं रखती। यह वह मीडिया है, जो दूसरों के जख्मों पर हाथ रखता है, पर अपने भीतर के मवाद को छिपाए फिरता है। मेरे जैसे पत्रकार के लिए ये अवसाद के क्षण हैं। हम कैसी पत्रकारिता करना चाहते हैं, हम कैसी दुनिया बनाना चाहते हैं! मैं खुद लगभग दो सालों तक एक मीडिया संस्थान के खिलाफ लड़ती रही। यह लड़ाई सम्मान और बराबरी के अधिकार की लड़ाई थी। यह जरूरी नहीं कि महिलाओं पर होने वाली हर हिंसा यौन हिंसा ही हो। उसके हंसने-बोलने, कपड़े पहनने, चरित्र जैसे तमाम प्रसंगों को लेकर उसे हर रोज कई तरह की अशोभनीय स्थितियों का सामना करना पड़ता है।

बिहार से निकलने वाले एक अखबार में काम करने वाली महिला पत्रकार को नौकरी इसलिए गंवानी पड़ी कि उसने ऐसी बातों का सख्त विरोध किया। एक समाचार एजेंसी में काम करने वाली महिला पत्रकार ने ऐसे अशोभनीय दृश्यों का वर्षों सामना किया, जिसमें उनके कुछ सहकर्मी सिर्फ अंडरवियर पहन कर काम करते थे। रात के साथ दिन में भी शराब के दौर चलते थे। एक अंग्रेजी अखबार में काम करने वाली महिला पत्रकार को रोज किसी सेक्सी और कम कपड़े पहनी महिला अदाकारा की तस्वीर निकाल कर अखबार में लगानी होती थी। जब उसने इस तरह के काम नहीं देने का अनुरोध किया तो इसे उसके काम का हिस्सा बता कर करने को कहा गया। ऐसे हजारों मामले हैं, जिन पर खुल कर बातें नहीं होतीं, क्योंकि हम अपने ही घर में फैले अंधेरे का सामना नहीं करना चाहते।

ऐसी घटनाओं ने देश के मीडिया को कठघरे में खड़ा किया है। ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या महिला पत्रकार यहां भी सुरक्षित नहीं है। दरअसल, इन तमाम घटनाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और लैंगिक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। बॉलीवुड की तरह मीडिया में भी मटमैली पूंजी का वर्चस्व बढ़ा है। सत्ता, ताकत और पूंजी के इस खेल में मीडिया नाक तक डूबा है। बाजार केंद्रित मीडिया भी स्त्री की देह को ही भुनाता है। टीवी चैनलों पर दिखाए जाने वाले लगभग सभी हिंदी धारावाहिकों की कथा-वस्तु के मुख्य स्वर विघटन, अविश्वास, परिवार-विभाजन, विवाहेतर संबंध के इर्द-गिर्द ही घूमते रहते हैं। मीडिया में जनपक्षीय खबरों को उतनी तरजीह नहीं मिलती, जितनी बाजार की बनाई हुई


खबरों को। जो लोग समझौता नहीं कर पाते, संस्थान में उन पर ऐसा मानसिक दबाव बनाया जाता है कि उन्हें इस्तीफे या फिर आत्महत्या तक का रास्ता अपनाना पड़ता है। इस मुश्किल दौर में आखिर आदमी किस पर भरोसा करे! यह कैसा दंभ है कि एक स्त्री के शरीर और मन पर हमला करने वाला व्यक्ति अपनी अकड़ के साथ वहीं बना रहता है और एक प्रताड़ित पत्रकार को खुदकुशी तक के लिए मजबूर होना पड़ता है।

तनु का मामला अकेला नहीं है। ऐसी कई लड़कियां न्याय के अभाव में या तो दम तोड़ देती हैं या हथियार डाल देती हैं। क्या हुआ तरुण तेजपाल के मामले में! इस बात की चिंता किसे है कि इन संस्थानों से लड़ने वाली लड़कियां कितनी अकेली पड़ गई हैं! ऐसा लगता है कि पत्रकारिता में शायद और बुरे दिन आने वाले हैं। वक्त से लड़ रही महिलाओं के लिए अब काम के दरवाजे बंद होने वाले हैं। दरअसल, यह उन लोगों के लिए सुनहरा मौका है, जो स्त्री को घर की दीवारों के भीतर ही दफन करना चाहते हैं। दुनिया के आंकड़े बताते हैं कि कामकाजी महिलाओं के लिए काम के अवसर लगातार कम हो रहे हैं। ऐसे बुरे समय से लड़ने के लिए उन लोगों को सामने आना होगा जो चाहते हैं कि पत्रकारिता बची रहे और जो इस दागदार दुनिया में भी मूल्यों के साथ जीना चाहते हैं। उन तमाम यौन अपराधियों के खिलाफ कानून को और धारदार बनाना होगा। वह मामला चाहे किसी न्यायाधीश से जुड़ा हो या किसी राजनेता से या किसी बड़े पत्रकार से!


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