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आजादी की सीमा PDF Print E-mail
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Saturday, 12 July 2014 09:16

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

जनसत्ता 12 जुलाई, 2014 : अधिकतर लोगों के लिए आजादी का मतलब है संपूर्ण और हर काम में पूरी तरह की आजादी। न कोई रोक-टोक, न पाबंदी और न नियम-कायदों का झंझट। ऐसे लोग कभी किसी की भी परवाह नहीं करते। उनके लिए कानून और नियम-कायदे बेमानी हैं। शायद यह ठीक भी हो! अगर यह न करो, वह न करो, इसकी आज्ञा लो, किसी से पूछ कर ही करना पड़े तो फिर काहे की आजादी! कितनी हैरानी की बात है कि अपना देश है, सभी कुछ अपना है, फिर भी सड़क पर चलो तो ट्रैफिक की बत्ती या पुलिस वालों के इशारे और आने-जाने वालों को भी देखो! दफ्तर में जाना हो तो अधिकारी से समय लो, उसकी अनुमति मिले तभी अंदर जाना! रेल, बस या हवाई जहाज में जाना हो तो इसके लिए भी निर्धारित प्रक्रिया अपनाना जरूरी है! इकतरफा मार्ग हो तो उसका ध्यान रखें! सड़क पार करें तो इधर-उधर देख कर और सावधानी से करें! हमारी मातृभाषा कैसे लिखी और बोली जाए, यह हम तय करेंगे, व्याकरण नहीं! वाह, क्या बात है!

जब हमारा यह देश है और यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था है तो फिर ‘यहां जाएं, वहां नहीं’ का क्या मतलब है! किसी भी तरह की रोकटोक क्या आजादी में दखल नहीं डालती? जहां चाहें वहां जा ही न सकें और जो करना चाहें वह कर न सकें और हर काम के लिए निर्धारित नियम-प्रक्रिया से गुजरना पड़े तो ऐसी आजादी भला किस काम की! यह तो सशर्त जीना हुआ। हमारे काम और इच्छा के बीच कोई व्यवधान नहीं आना चाहिए। वरना हमारी स्वतंत्रता आहत होगी! पर ऐसा सोचना क्या हर परिस्थिति में और हमेशा उचित है?

हम आजादी के नाम पर सार्वजनिक स्थानों को गंदा करते हैं, आसपास और जहां बैठते हैं, वहीं जूठन और अन्य चीजें फेंकते हैं, तब हम यह क्यों भूल जाते हैं कि अपने ही देश में गंदगी फैलाने का अधिकार हमें किसने दिया है? आपने समारोहों और बारातों के स्वागत-सत्कार के बाद सड़क पर गंदगी बिखरी देखी होगी। इतना तामझाम और खर्च करने वाले क्या अपने साथ कोई ड्रम या कोठी लेकर नहीं चल सकते, जिसे किसी ठेले पर रख दिया जाए और जूठन या ग्लास और कप उसमें डाल दिए जाएं? और जिस तरह छोटे बच्चे और भिखारी उस जूठन पर टूटते हैं, वह और भी भयावह है। बाजार में खाने-पीने की दुकानों पर भी यही दृश्य नजर आता है। सवाल संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का है। हमारा विवेक हमें कभी तो झकझोरे! दीवारो-दर पर नाम लिखना, पॉलीथीन की थैलियों का उपयोग और कचरा इधर-उधर ही डाल देना क्या शोभा देता है?

मैंने देखा है कि जरा-सी बात पर आसमान उठाने


वाले और शेर की तरह दहाड़ने वाले लोग विदेश में जाने पर कैसे चूहे बन जाते हैं। वहां उन्हें हर नियम-कायदे को मानते हुए देखा जा सकता है। वे जानते हैं कि अमेरिका में जो लोग कुत्तों को घुमाने ले जाते हैं, वे अपने साथ पॉलीथीन की थैली भी रखते हैं, ताकि गंदगी उसमें रख कर निर्धारित स्थान पर फेंक दें। वरना वहां सार्वजनिक स्थान को गंदा करने पर भारी जुर्माना होता है। लोग डरते भी हैं और नियमों का सम्मान भी करते हैं। जब हम वहां ऐसा कर सकते हैं तो यहां क्यों नहीं कर सकते!

नियम के प्रति सम्मान भी जरूरी है और नियम तोड़ने का डर भी उतना ही जरूरी है। जब डर और सम्मान दोनों होंगे तो व्यवस्था भी सुधरेगी। आपको हर जगह, हर समय शोर मचा कर या ऊंची आवाज में सुर में या बेसुरे अंदाज में गाकर दूसरों की आजादी में खलल डालने का अधिकार कैसे है? जो चाहे बोलने या करने का दुस्साहस तो अराजकता को ही जन्म देगा। आजादी का मतलब जो मर्जी हो, वही करने का अधिकार पाना नहीं है। आजादी सीमित होती है। सभी वहां तक आजाद हैं, जहां तक उनकी आजादी दूसरों की आजादी में व्यवधान न डाले।

समाज में रहने से हमें खान-पान ही नहीं, पहनावे और बोलचाल में भी दूसरों का ध्यान रखना होता है। फिर संपूर्ण आजादी का सिद्धांत तो खुद ही सिमट कर शर्तों में बंंध जाता है। आश्चर्य की बात है कि हम गंगा को प्रदूषण और गंदगी से बचाने के लिए साफ करने की बात करते हैं, जबकि गंगा ही नहीं, अन्य सार्वजनिक स्थानों को गंदा हम मनुष्य ही करते हैं। कितने नाले और अन्य स्रोतों का गंदा पानी गंगा में डाल कर हम खुद गंगा को कितना गंदा कर रहे हैं! बस अगर हम गंदा करना बंद कर दें तो गंगा खुद ही साफ और निर्मल हो जाएगी।


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