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न्याय का तंत्र PDF Print E-mail
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Saturday, 12 July 2014 09:12

altजनसत्ता 12 जुलाई, 2014 : भारत में अदालतों पर मुकदमों का जैसा बोझ है, वैसा दुनिया में कहीं और नहीं। देश भर में कुल लंबित मुकदमों की तादाद सवा तीन करोड़ तक पहुंच चुकी है। मुकदमे बरसों-बरस खिंचते रहते हैं और वादी-प्रतिवादी अदालतों के चक्कर काटते अपना पैसा और समय गंवाते रहते हैं। मुकदमों का खिंचते रहना भारतीय न्याय-व्यवस्था की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है। इस सूरत को बदलने के लिए विधि आयोग अपनी हर रिपोर्ट में कुछ सुझाव देता आया है। लेकिन उसकी सिफारिशों को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। आयोग ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने की फिर से वकालत की है। पिछले दिनों कानूनमंत्री रविशंकर प्रसाद को सौंपी गई इस रिपोर्ट में आयोग ने यह भी कहा है कि मुकदमों के निपटारे की समय-सीमा तय की जानी चाहिए। वर्तमान स्थिति में समयबद्ध फैसले की कल्पना करना भी मुश्किल लगता है। इसलिए पहला तकाजा यह है कि न्यायिक तंत्र की क्षमता बढ़ाई जाए। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए बुनियादी ढांचे के विस्तार पर काफी जोर दिया जाता रहा है, पर यह नीति न्यायिक ढांचे को लेकर अब तक नहीं अपनाई गई है। 

भारत में आबादी के अनुपात में जजों की संख्या काफी कम है, विकसित देशों की तुलना में कई गुना कम। अगर लंबित मामलों के बरक्स देखें तो यह स्थिति और भी शोचनीय नजर आएगी। यही नहीं, जजों के बहुत-से खाली पद समय से नहीं भरे जाते, जिससे अदालतें अपनी वर्तमान क्षमता से भी काम नहीं कर पाती हैं। कानूनमंत्री ने कहा है कि सरकार ने जजों की संख्या में बीस फीसद की बढ़ोतरी की बात सिद्धांत रूप से मान ली है। बीस फीसद वृद्धि जरूरत के हिसाब से बहुत कम होगी, पर अभी यह एक स्वीकृत प्रस्ताव भर है, देखना है इस पर अमल कब हो पाता है। मुकदमों के शीघ्र निपटारे के लिए अदालतों की कार्य-संस्कृति बदलना भी जरूरी है। वकील बिना किसी ठोस कारण के भी तारीख आगे बढ़ाने की अर्जी लगा देते हैं, और वह आसानी से मंजूर भी हो जाती है। वे जब-तब हड़ताल पर भी चले जाते हैं। बेजा स्थगन और अनावश्यक हड़ताल की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के लिए कुछ नियम-कायदे बनाने होंगे। सुनवाई की दो तारीखों का अधिकतम अंतराल तय करना


होगा। बहुत सारे विचाराधीन कैदी अपने खिलाफ लगे अभियोग की संभावित सजा से ज्यादा वक्त जेल में गुजार चुकने के बाद भी फैसले का इंतजार करते रहते हैं। ऐसे मामलों की समीक्षा कर उन्हें काफी तेजी से निपटाया जा सकता है। इससे जेलों को भी राहत मिलेगी, जिन पर उनकी क्षमता से बहुत ज्यादा कैदियों का बोझ है। 

जब भी मुकदमों के निपटारे की समय-सीमा तय करने की बात आती है, यह अंदेशा जताया जाता है कि ऐसा करने से जजों पर वक्त की पाबंदी का बेजा दबाव रहेगा, जिसका नतीजा न्यायिक प्रक्रिया के लिए ठीक नहीं होगा। यह दलील सिरे से खारिज नहीं की जा सकती, पर ऐसा प्रावधान जरूर किया जा सकता है कि निचली अदालत में दो साल और ऊपरी अदालत में साल भर के भीतर फैसला न आए तो संबंधित मामले की त्वरित सुनवाई की व्यवस्था हो। हमें इस पर भी सोचना होगा कि अनावश्यक मुकदमे न पैदा हों। बहुत-से लोगों को इसलिए अदालत की शरण लेनी पड़ती है कि प्रशासन के स्तर पर उनकी सुनवाई नहीं होती। सरकारें खुद बहुत-से गैर-जरूरी मुकदमों का सबब बनती हैं। यों वे आदर्श नियोक्ता कही जाती हैं, पर खासकर अस्थायी या अनुबंध आधार पर नियुक्त किए गए बहुत-से लोगों को अपना बकाया वेतन-भत्ता पाने के लिए अदालत की शरण लेनी पड़ती है। फिर ढेर सारे मुकदमे जमीन के झगड़े से संबंधित होते हैं। भूमि-रिकार्ड दुरुस्त कर इनकी गुंजाइश काफी कम की जा सकती है। जाहिर है, प्रशासन सुधार के बगैर न्यायिक सुधार का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। 


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