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नए साजिंदे, पुरानी धुन PDF Print E-mail
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Friday, 11 July 2014 02:00

अरविंद कुमार सेन

 जनसत्ता 11 जुलाई, 2014 : कहा जाता है कि जब कोई साज नए साजिंदे के हाथ में जाता है तो उससे अलहदा धुन निकलती है। भारत निर्माण का नगाड़ा पीट कर कांग्रेसी विदा हो चुके हैं और उनकी जगह ‘भारत चमकाने’ का दावा करने वाली भाजपा ने नया बजट पेश किया है। मगर बजट को देख कर लगता नहीं है कि यह जुदा नीतियों वाली नई सरकार का बजट है। कांग्रेस की तरह भाजपा ने भी देश की आर्थिक सेहत सुधारने के नाम पर लोगों को जम कर कड़वी दवा की खुराक पिलाई है। अच्छे दिनों की आस में बल्लियों उछलने वालों का अब सच से सामना हुआ है। उम्मीदों पर पानी फिर गया है। मगर सवाल है कि इस बजट से किसके अच्छे दिन आएंगे। जवाब के लिए बजट पर नजर डालते हैं।

वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में राजकोषीय घाटा रोकने पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। मौजूदा वित्तवर्ष में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.1 फीसद तक रखने का एलान किया गया है। आने वाले सालों के लिए ‘राजकोषीय अनुशासन’ के नाम पर वित्तवर्ष 2015-16 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.6 फीसद और 2016-17 में जीडीपी के तीन फीसद के स्तर पर रखने की घोषणा की गई है। नरेंद्र मोदी सरकार का बजट पढ़ कर किसी को गलतफहमी हो सकती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या राजकोषीय घाटा है। अगर इसे सरकार जीडीपी के तीन फीसद तक ले आई, तो अर्थव्यवस्था को ऊंची विकास दर के साथ आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता है। 

राजकोषीय घाटे के लिए तय किए गए इन लक्ष्यों का मतलब है कि राजग सरकार आने वाले  तीन सालों तक लगातार सादगीपूर्ण उपायों के जरिए राजकोषीय घाटे में कटौती के नाम पर लोगों पर ज्यादा से ज्यादा बोझ डालेगी। सादगीपूर्ण या किफायतशारी का मतलब है कि सरकार सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के बजट में कटौती करेगी। बताने की जरूरत नहीं कि सरकारी खर्च में कमी की सबसे बड़ी कीमत कम आमदनी वाले लोगों, खासकर हाशिये पर रहने वालों को चुकानी होगी। 

चालू वित्तवर्ष में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.8 फीसद के आसपास रहने का अनुमान है। क्या भारत में राजकोषीय घाटा खतरे का निशान पार कर गया है? जवाब है नहीं। फिलवक्त भारत के आकार की अधिकतर अर्थव्यवस्थाओं में राजकोषीय घाटा जीडीपी के छह से आठ फीसद के आसपास है। दरअसल, ऊंचा राजकोषीय घाटा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की पहचान है। आज विकसित देशों की कतार में शामिल देश भी जब विकासशील दौर में थे, तो उनका राजकोषीय घाटा भारत के ही स्तर पर या उससे ज्यादा था। जाहिर है, राजकोषीय घाटे का भूत खड़ा करके कोई और मकसद साधा जा रहा है। 

दरअसल, राजकोषीय घाटा ऊंचा रहने के कारण कॉरपोरेट समूहों को निवेश पर मिलने वाले प्रतिफल में कमी आती है। दुनिया के विकसित पूंजीपति देशों के गिरोह आइएमएफ और विश्व बैंक से जब कोई देश कर्ज लेता है तो उसे इन संस्थानों का संरचनात्मक सुधार कार्यक्रम (स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स पैकेज) लागू करना होता है। सरकारी खर्च में कमी करके राजकोषीय घाटे को कम से कम स्तर पर रखना इस कार्यक्रम का अहम हिस्सा है। अचरज नहीं होना चाहिए कि वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण का बड़ा भाग राजकोषीय घाटे को काबू में करने के मुद्दे पर खर्च किया। 

कड़वी दवा के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए वित्तमंत्री ने बेहद नपे-तुले शब्दों में गरीबी निवारण के लिए चलाई जा रही योजनाओं को तार्किक बनाने की घोषणा की है। नव-उदारवाद में सबसिडी योजनाओं को तार्किक बनाए जाने का मतलब सरकार इनके बिल में कटौती करेगी। पेट्रोलियम पदार्थों (पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और घरेलू गैस) पर सबसिडी घटाने का काम बजट से ठीक पहले जोर-शोर से शुरू किया जा चुका है। 

उर्वरक सबसिडी पर कैंची चलाने के लिए बजट में सरकार ने नई उवर्रक नीति की घोषणा की है। चूंकि बजट में वित्तमंत्री कह चुके हैं कि राजकोषीय घाटा कम करना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है, इसलिए लोगों को सबसिडी बिल में कटौती की मार सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

1990 से बड़ी पूंजी के सामने समर्पण की जो प्रक्रिया चल रही है, नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले ही बजट में उसे चरम सीमा पर पहुंचा दिया है। मसलन देश में हर दिन चौबीसों घंटे बिजली मुहैया कराने के वादे पर गौर करिए। हर पल बिजली का वादा सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन यह बिजली बाजार दरों पर मिलेगी। सरकार इसकी कीमत में कोई रियायत नहीं देगी। जिसके पास बाजार भाव पर बिजली खरीदने का पैसा है, वह भुगतान करे और हरदम बिजली की सुविधा हासिल करे। गुजरात में यही हो रहा है। अचंभा होता है कि यह उस सरकार का बजट है, जिसने गद्दी संभालते ही संसद की पहली बैठक में राष्ट्रपति के अभिभाषण की मार्फत दावा किया था कि इस सरकार पर पहला हक गरीबों का है। 

यूपीए सरकार का सूपड़ा साफ होने की एक वजह बढ़ती महंगाई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही महंगाई कम करने का वादा किया था। यह बजट देख कर कहना मुश्किल है कि आने वाले दिनों में महंगाई कम होगी। बल्कि इसमें महंगाई की आग को और भड़काने का इंतजाम किया गया है। पेट्रोलियम पदार्थों समेत हर तरह की सबसिडी में कमी, राजकोषीय घाटा काबू में करने के लिए सरकारी खर्च में कमी और महंगाई के संरचनात्मक कारणों की अनदेखी करना, कुछ ऐसी वजहें हैं, जो महंगाई की आग में घी का काम करेंगी।

महंगाई कम करने के नाम पर बजट में किए गए टोटकों पर गौर फरमाएं। सरकार का कहना है कि शहरों और कस्बों में किसान बाजार खोले जाएंगे।


इन बाजारों की मार्फत किसान अपने कृषि उत्पाद सीधे ग्राहकों को बेच पाएंगे। किसानों की ओर से की जाने वाली सीधी बिक्री महंगाई से लड़ने में कारगर साबित हो सकती है, लेकिन असल मुद्दा संरचनात्मक ढांचे का है। हमारे देश में पैदा होने वाले फल-सब्जियों का चालीस फीसद हिस्सा शीत भंडारण सुविधाओं के अभाव में बर्बाद हो जाता है। किसानों के खेत से लेकर उपभोक्ता की मेज तक फल-सब्जी आपूर्ति की प्रणाली नहीं होने के कारण मांग और आपूर्ति के बीच का संतुलन गड़बड़ा जाता है। 

बजट में शीत भंडारण सुविधाओं और आपूर्ति तंत्र विकसित करने की व्यापक योजना कहां है। बजट में पांच हजार करोड़ रुपए से गांवों में शीत भंडारण सुविधाओं का विकास करने की बात कही गई है। जरूरत के सामने नाकाफी इस रकम से शीत भंडारण सुविधाओं के विकास की बात पर अगर विश्वास कर भी लें तो अगला सवाल बिजली का है। बिजली के बिना गांवों में शीत भंडारण सुविधाओं का संचालन कैसे किया जाएगा। हमारे देश की मुद्रास्फीति, खासकर खाद्य वस्तुओं की ऊंची मुद्रास्फीति की एक वजह प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग और कम घरेलू आपूर्ति है। विडंबना देखिए, सरकार पांच सौ करोड़ रुपए से पूरे देश में दूसरी हरित क्रांति भी लाना चाहती है, साथ ही प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ा कर इनकी कीमतों में भी स्थिरता लाने का सपना देख रही है। 

बजट में सबसे गहरी चोट मनरेगा पर की गई है। भाजपा शासित राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे समेत सरकार के नुमाइंदों ने पहले ही इस बाबत संकेत दे दिए थे। वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा है कि मनरेगा में सुधार करके इस योजना को ठोस परिसंपत्ति निर्माण से जोड़ा जाएगा। ठोस परिसंपत्ति निर्माण का सीधा मतलब है कि अब सरकार इस योजना को निर्माण कार्यों में लगे ठेकेदारों के हाथों की कठपुतली बनाने जा रही है। 

याद रहे, पहले से ही मनरेगा के तहत किए जाने वाले काम का पैंसठ से सत्तर फीसद कृषि और इससे जुड़ी सहायक गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। मिसाल के तौर पर वित्तवर्ष 2013-14 की पहली छमाही में अठहत्तर फीसद से ज्यादा काम जल संरक्षण, भूमि विकास और ग्रामीण पहुंच के क्षेत्रों में किया गया है। कहना न होगा, मनरेगा योजना के बुनियादी मूल्यों के साथ गंभीर छेड़छाड़ करने की राजग  सरकार ने अपनी सामाजिक पक्षधरता खुले तौर पर जाहिर कर दी है।

बजट में घोषित छोटी-छोटी योजनाओं की गहराई में जाएं तो यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि बजट भाजपा के वित्तमंत्री ने पेश किया है या कांग्रेस के वित्तमंत्री ने। बजट में सारे शहरों की महिलाओं की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए डेढ़ सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, वहीं सरदार पटेल की मूर्ति के लिए दो सौ करोड़ रुपए का प्रावधान है। महज सौ करोड़ रुपए में देश के बड़े शहरों में मेट्रो रेल का जाल बिछाने का सब्जबाग दिखाया गया है, जबकि जानकारों का मानना है कि इस रकम से महज किसी शहर में मेट्रो रेल का विकास करने से पहले होने वाला सर्वेक्षण ही किया जा सकता है। कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार के पिछले दस बजटों में भी ऐसे छिटपुट प्रावधानों की भरमार थी। 

दरअसल, यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। एक तरफ बजट का व्यापक एजेंडा देशी-विदेशी पूंजी के पक्ष में रखा जाता है, वहीं दूसरी ओर पचास-सौ करोड़ रुपए के प्रावधान से जनता के उबलते आक्रोश पर राहत के छींटे मारे जाते हैं। अगर इस तरह देश का विकास होना होता तो भारत अब तक स्वर्ग बन गया होता। यूपीए सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के हर बजट में दो सौ से लेकर पांच सौ करोड़ रुपए तक का प्रावधान पूर्वी भारत में हरित क्रांति लाने के लिए किया था। हकीकत सबके सामने है। 

बीते ढाई दशकों, खासकर पिछले दस साल से विदेशी पूंजी की गहरी पकड़ में फंस चुकी भारतीय अर्थव्यवस्था को नई राह पर ले जाने का मौका नरेंद्र मोदी सरकार के पास था। मगर मोदी सरकार ने नई राह पर चलने के बजाय उसी पिटी-पिटाई नव-उदारवादी डगर पर चलने का फैसला किया है, जिसकी कीमत आज पूरा यूरोप और अमेरिका चुका रहे हैं। अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी के लिए खोल कर नंगा करने की सनक के चलते एक समय सभ्यता का गढ़ रहा यूनान आज बड़ी पूंजी की दलाल साख निर्धारण एजेंसियों के रहनुमाई में सांस ले रहा है। वित्तीय घाटा कम करने की जिद ने जनता का जीवन नरक कर दिया है और लोग सड़क पर उतर आए हैं। भारत के नीति निर्माताओं ने इससे सबक लेने के बजाय उसी बर्बादी की तरफ बढ़ने का फैसला किया है। अगर नई सरकार के बजट का किसी को एक पंक्ति में निचोड़ चाहिए तो कहा जा सकता है कि बुरे दिन शुरू हो गए हैं। 


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