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संवाद सेतु PDF Print E-mail
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Friday, 11 July 2014 01:59

प्रमोद द्विवेदी

जनसत्ता 11 जुलाई, 2014 : बीती जून में जिस दिन केंद्र सरकार के हिंदी हिमायती एक परवाने ने तमिलनाडु की धरती में द्रविड़ जुंबिश पैदा की, मैं चेन्नई में था। सुबह-सुबह ही स्थानीय अंगरेजी अखबारों ने प्रदेश का सियासी मिजाज बता दिया। एक स्टॉल से दुर्लभ हिंदी अखबार लिया तो कुछ मुख्यधारा का बोध हुआ। सड़क पर आया तो वहां न हिंदी थी, न अंगरेजी। केवल तमिल। छुटपन से मन में समाया एक मिथक टूट गया कि तमिलनाडु में आमजन भी अंगरेजी जानते हैं, बोलते हैं। असल में लगा कि इस शहर में इशारों की राष्ट्रभाषा ही ज्यादा काम की है। हिंदी में पूछो तो कड़क जवाब- ‘नो हिंदी!’ तो भइया इंगलिश? ‘कुंजम-कुंजम’ (थोड़ी-थोड़ी)।  इसी ‘कुंजम-कुंजम’ अंगरेजी के सहारे उस दिन शहर में हमारा काम चला। आॅटो की सैर से लेकर भोजनालयों और बाजार तक ‘कुंजम-कुंजम’ चला और जैसे एक नसीहत भी मिली कि हे, हिंदी के आर्यपुत्र! अगली बार इस धरती पर आना तो ‘कुंजम-कुंजम’ तमिल के साथ! हमने सयाने हिंदीवादी की तरह उन्हें टुटही अंग्रेजी में यह ज्ञान देने की कोशिश की कि भइया हिंदी सीखोगे तो कई सूबों में काम चल जाएगा। मलयालियों की तरह तरक्की की राह खुलेगी। पर घोर तमिलवादी हमारे इस भाषाई चुग्गे पर नहीं फंसे और कहा- ‘ओनली तमिल!’ हठीला भाव यह था कि सबसे भली हमारी भाषा की कुइयां। तुम मगन रहो हिंदी के महासागर में।

अपने मुल्क में शायद पहली बार हिंदी के इस निषिद्ध क्षेत्र से हमारा पाला पड़ा था। ‘मद्रास’ में हिंदी विरोध की कहानियां सुनी बहुत थीं। पर यह विरोध से ज्यादा तारीखी अस्वीकार्य था। यानी हमें मंजूर नहीं आपकी ब्राह्मणवादी, साम्राज्यवादी आर्यभाषा। उस दिन अंग्रेजी अखबारों में जो लेख छपे थे, उनका एक भाव यह भी था कि संघ के हिंदुत्व एजेंडे के तहत तमिलनाडु और अन्य अहिंदी राज्यों में हिंदी लादी जा रही है। 1930 के दशक से लेकर साठ के दशक तक के हिंदीद्रोही तमिल बलिदानियों को याद करते हुए, द्रविड़ नेताओं की धमकियां सुर्खियां बनी थीं कि हिंदी के मसले पर सड़क पर वैसा ही रक्तपात होगा जो अतीत में हुआ था। हिंदी विरोधी अखबार आजादी के पहले मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रमुख सी राजगोपालाचारी की साजिश और रामास्वामी नायकर (पेरियार), अन्नादुरै से लेकर द्रविड़ कझगम और आज की द्रमुक के बखान में लगे थे। एक लेख ने बाकायदा अन्नादुरै की उस हिंदी विरोधी नजीर का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि बोलने वालों की संख्या के आधार पर हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात है तो कौवे की जगह मोर को राष्ट्रीय पक्षी क्यों बनाया गया। करुणानिधि और वाइको जैसे द्रविड़-तमिल फरहराधारी आज भी ऐसी ही जहरीली मिसाल देते हैं।

हालांकि आज के तमिलनाडु में एक पीढ़ी ऐसी भी है, जो भाषा के इस दुराग्रह से मुक्त


होने के फेर में दिखती है। असल में आम लोग विरोध की इस राजनीति को थोड़ा-बहुत बूझने लगे है। तुरंता तरीके से कुछ जानकारी जुटाने पर पता चला कि हाल में स्थानीय अभिभावकों और स्कूलों ने अदालत से तमिल अनिवार्यता वाले फरमान को वापस लेने की मांग उठाई है, ताकि हिंदी में स्कूली पढ़ाई का रास्ता खुल सके। तकरीबन पनचानबे साल पहले स्थापित चेन्नई की दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा तो यहां तक दावा करती है कि एक वक्त जिन्होंने हिंदी विरोधी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था, वे खुद बच्चों को हिंदी पढ़ाने के लिए भेज रहे हैं। उनका यह दावा तसल्ली देता है कि हर साल छह लाख लोग यहां हिंदी की परीक्षा देते हैं।

इसके बावजूद सच्चाई यही है कि चेन्नई में हिंदी विरोध उस भावनात्मक ज्वर में बदल चुका है, जहां तर्क और तरफदारी की सारी खुराक नाकाम हो जाती है। मैं सोच में पड़ गया कि क्या वास्तव में देश ‘साम्राज्यवादी’ हिंदी के बिना संवाद कर सकता है! क्या अस्सी साल पहले सी राजगोपालाचारी वास्तव में सबसे नादान जिद कर बैठे थे कि पूरे मद्रास सूबे (तत्कालीन) को हिंदी पढ़ा कर मानेंगे?

इसका जवाब मुझे उस शाम शहर के मरीना सागर तट पर विचरते हुए मिल गया। सांझ की उफनाई लहरों के संग तस्वीर खिंचवाने के लिए मेरी पत्नी ने एक अजनबी से मदद मांगी। मदद हिंदीमें मांगी गई थी। जवाब मिला तो लग गया वह सैलानी भी कहीं दूर का है, पर हिंदी बोल सकता है। फोटो खिंचवाने के बाद हमने शुक्रिया अदा किया और खासतौर पर हिंदी में दीर्घ संवाद के लिए। ‘अपनी हिंदी’ की तारीफ पर उसने फूलते हुए कहा- ‘ओह! इंडिया में हिंदी जानना जरूरी है... हिंदी नहीं तो जिंदगी नहीं!’ असम के एजाज नामक इस युवा ने जैसे हिंदी के हक में राष्ट्रीय घोषणा कर दी थी। जाहिर है, इस घोषणा को तमिलनाडु और द्रविड़ सियासत तक पहुंचने में काफी वक्त लग सकता है।


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