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दांव पर भरोसा PDF Print E-mail
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Thursday, 10 July 2014 02:09

अनीता मिश्रा

जनसत्ता 10 जुलाई, 2014 : कई दिनों से लगातार मैं अर्पिता को फोन लगा रही थी, लेकिन स्विच आॅफ जा रहा था। मुझे फिक्र हुई तो घर जाकर उससे मिली। उसके तनाव की जो वजह थी, वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को परेशान कर दे सकती है। वह अपने एक दोस्त नीतीश से बेहद नाराज थी। हालांकि मुझे यही पता था कि वह अर्पिता का सबसे अच्छा दोस्त था। वह लगभग सारी बातें उससे साझा करती थी। लेकिन उसी नीतीश ने उसकी निहायत निजी बातें अपने कुछ और दोस्तों को बता दी थीं, जिन्होंने उन बातों पर चटखारे लेने शुरू कर दिए थे। अब दूसरे दोस्त उन बातों को लेकर अर्पिता का मजाक बना रहे थे। इसी बात पर अर्पिता ने रोते हुए मुझे बताया- ‘मैं नीतीश पर अपने परिवार वालों से भी ज्यादा भरोसा करती थी। मैंने सोचा तक नहीं था कि वह ऐसा करेगा। दूसरों के सामने मेरा मजाक बना दिया है उसने। लेकिन उसने ऐसा क्यों किया, मैं नहीं समझ पा रही हूं?’

अपने अनुभव से कह सकती हूं कि यह समस्या लड़कियों के सामने अक्सर आती है कि वे किसी पुरुष साथी पर किस हद तक और कैसे भरोसा करें। कई दफा ऐसा होता है कि लड़कियां अपने किसी दोस्त पर भरोसा करके कोई बात उससे साझा करती हैं। लेकिन वह इस भरोसे का सम्मान करने के बजाय उस लड़की से संबंधित निहायत निजी बातें भी अपने दोस्तों को बता देता है। अर्पिता के साथ यही हुआ है। बदले हुए नामों वाले पात्रों की यह अकेली सच्ची घटना नहीं है। बल्कि शायद यह बहुत सारी युवा हो रही लड़कियों का अनुभव हो सकता है। लंबे समय से नजदीकी की वजह से अर्पिता को लगा कि वह नीतीश पर विश्वास कर सकती है। लेकिन नीतीश ने जो किया, क्या वह एक ऐसे पुरुष की आम आदत का आईना नहीं है जो अपने दोस्तों के बीच खुद को तीसमार खां साबित करने के लिए अपने सबसे करीब रही स्त्री साथी को भी दांव पर लगाने से नहीं चूकता? नीतीश ने अर्पिता से की गई बिल्कुल निजी बातें अपने दोस्तों को बताने में कोई अपराध-भाव महसूस नहीं किया। कुछ ऐसे मामले भी मेरी जानकारी में आए कि कोई लड़की अपने सबसे करीबी मित्र या प्रेमी पर भरोसा करके उससे फोन पर बात कर रही थी और उधर उसका वह दोस्त या प्रेमी फोन का स्पीकर आॅन कर या रिकार्ड कर इस बातचीत को अपने दोस्तों को सुना कर उन पर अपना रोब गांठ रहा था।

फिक्र जताने के लिए किए गए बेहद निजी सवालों का जवाब एक स्त्री सिर्फ भरोसे के चलते दे देती है। लेकिन हो सकता है कि किसी पुरुष के लिए उस भरोसे के पीछे छिपी संवेदना का कोई महत्त्व नहीं हो। निश्चित रूप से यह मानसिकता सामाजिक प्रशिक्षण का नतीजा है। लेकिन क्या यह एक आम पुरुष की मानसिकता नहीं है और क्या यही उन्हें भरोसा करने के लिहाज से अयोग्य नहीं ठहराता है?

अगर कोई लड़की आत्मनिर्भर, बुद्धिमान


और साहसी है तो उसका पुरुष साथी उसकी निजता में ज्यादा दिलचस्पी लेता है। उनकी प्राथमिकता में ये सवाल शामिल रहते हैं कि वह कहां जाती है, कब क्या करती है, किससे मिलती है, बात करती है आदि। दरअसल, साधारण मानी जाने वाली लड़कियों को मीठी और बनावटी बातें करके अपने प्रभाव में लेना ज्यादा आसान होता है। लेकिन अपने बलबूते खड़ी हिम्मती और समझदार लड़कियों को अपने हिसाब से संचालित करना मुश्किल होता है। समाज में हैसियत के जो पैमाने बन गए हैं, उनमें विरोधाभास यह है कि एक सक्षम लड़की से दोस्ती या प्रेम करके लड़के अपने आपको एक विजेता की तरह देखते हैं और उसकी निजी जिंदगी को लेकर एक आशंका से भी घिरे रहते हैं।

हमारे यहां यह सामाजिक द्वंद्व कुछ ज्यादा ही गहरा दिखता है। यहां एक पुरुष के लिए स्त्री किसी प्रतियोगिता में जीते जाने वाले तमगे की तरह है, जिसमें ज्यादातर पुरुष खुद को विजेता के तौर पर ही देखना चाहते हैं। यहां स्त्री एक व्यक्ति नहीं है। वह बाजी में जीती जाने वाली कोई वस्तु की तरह है, जिसके बारे में यह मान लिया जाता है कि व्यक्तित्व के तत्त्व वहां अनुपस्थित हैं। इस बाजी में ‘हार’ होने पर आमतौर पर कोई पुरुष अपने घातक रूप में तब सामने आता है, जब वह बदला लेने के लिए स्त्री को किसी भी हद तक जाकर नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है। कभी अपने सबसे नजदीक रही महिला मित्र का चरित्रहनन करने से लेकर उस पर तेजाब फेंकने या उसकी हत्या कर डालने की खबरें आज आम हैं। ऐसे काम केवल अनपढ़ या पिछड़े कहे जाने वाले नहीं, बल्कि काफी पढ़े-लिखे लोग भी करते पाए जा सकते हैं। हालांकि यह भी सच है कि पढ़े-लिखे और आधुनिक दिखने वाले लोगों पर आज की स्त्री यह सोच कर आसानी से भरोसा कर लेती है कि विचार के स्तर पर यह उदार होगा। लेकिन हकीकत यह है कि आधुनिक दिखने वाले ऐसे पुरुषों के दिमाग में भी मध्ययुगीन कुंठाएं भरी हो सकती हैं।


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