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स्वप्न का अंत PDF Print E-mail
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Wednesday, 09 July 2014 01:31

सर्वदमन मिश्र

जनसत्ता 09 जुलाई, 2014 : ‘किसी भी समाज में अध्यापकों का स्तर उस समाज के सामाजिक मूल्यों को व्यक्त करता है।’ अध्यापक प्रशिक्षण के लिए एनसीटीइ द्वारा जारी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की प्रस्तावना में यह घोषित किया गया है। आगे यह दस्तावेज स्थापना देता है कि ‘कोई भी समाज अपने अध्यापकों के स्तर से आगे नहीं बढ़ सकता।’ इस स्थापना को प्रतिमान मान लें, जो कि यह है भी, तो भारतीय समाज के स्तर को लेकर मायूसी ही हाथ लगेगी। 

हाल ही में अजमेर के निकट एक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में एनसीटीइ द्वारा प्रायोजित शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम में व्याख्यान देने के दौरान मुझे लगा कि इक्कीसवीं सदी का भारत शैक्षणिक पिछड़ेपन, सांस्कृतिक विपन्नता और सामाजिक जड़ता की ओर अग्रसित है, न कि विकास की ओर। प्रशिक्षण कार्यक्रम उन द्वितीय श्रेणी अध्यापकों के लिए था, जो विद्यालयों में सामाजिक विज्ञान पढ़ाते हैं। पहले दिन अजमेर और निकटवर्ती जिलों से आए लगभग पच्चीस प्राध्यापक शामिल थे, जिनमें अधिकतर महिलाएं थीं। मैं यह सोच कर प्रसन्न था कि प्रतिभागियों से अच्छा संवाद हो सकेगा। लेकिन प्रतिभागी अध्यापकों की भाव-शून्यता ने संवाद और विमर्श की हसरत को ध्वस्त कर दिया। पहले ही दिन मुझे लगा कि विमर्श और संवाद के जिस विराट उद्देश्य के साथ इस प्रकार के आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई जाती है, उसको प्राप्त करना यहां संभव नहीं है। प्रतिभागियों की अनिच्छा को भांपते हुए मैंने अपना पूर्व निर्धारित व्याख्यान स्थगित करके अध्यापन में आने वाली पाठ्य और पाठ्येतर चुनौतियों पर बात छेड़ी। तत्काल ही अन्यथा बेजार नजर आ रहे प्रतिभागी अपनी-अपनी बात कहने को व्यग्र हो उठे। बकौल ग़ालिब- ‘पुर हूं शिकवे से जैसे राग से बाजा, एक जरा छेड़िये फिर देखिए होता है क्या!’

सबके सब शिकवों से भरे हुए थे। एक स्तर पर उठी शिकायतें एनसीएफ-2005 के बाद एनसीइआरटी द्वारा रचित पाठ्य पुस्तकें थीं, जो अन्योन्यात्मकता और समावेशात्मकता के महान उद्देश्य से लिखी जाने के बावजूद अध्यापकों और बच्चों दोनों में घोर अलोकप्रिय हैं। विडंबना यह है कि जिन पुस्तकों को अन्योन्यात्मक और समावेशी कहा गया, उनके लिए ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में यह धारणा है कि ये किताबें दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों को ध्यान में रख कर तैयार की गई हैं, क्योंकि बहुत सारी अच्छाइयों के बावजूद पाठ्य सामग्री के चयन में कक्षानुरूप स्तर को ध्यान में नहीं रखा गया है। इसलिए पाठ्य सामग्री का उपयोगकर्ताओं से कोई सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाता है।

दूसरे, एक बड़ा बदलाव जो स्कूल शिक्षकों के लिए बड़ी चुनौती बन कर आया है, वह है शिक्षक-शिक्षार्थियों के परस्पर संबंध में आया परिवर्तन। शिक्षक अब एक सेवा प्रदाता बन कर रह गया है। उदारवादी दृष्टिकोण और शिक्षा अधिकार, बाल अधिकार आदि का मिला-जुला प्रयास कुछ यों है कि शिक्षार्थी जो अब कुछ-कुछ उपभोक्ता सरीखा है, उसके शिक्षक से व्यवहार के प्रतिमान बदल गए हैं। शिक्षा का अधिकार कानून ने इस


व्यवस्था को ‘बॉयर्स मार्केट’ बना दिया है। अब शिक्षक को आठवीं तक बच्चों का ठहराव ही सुनिश्चित नहीं करना है, उन्हें अनिवार्य रूप से हरेक कक्षा में उत्तीर्ण भी करना है और परीक्षा के ढकोसले को भी निभाना है। उनकी बातों से ऐसा ध्वनित हुआ कि अब तो विद्यार्थियों की मनुहार करनी पड़ती है कि वे नियमित स्कूल आएं और परीक्षा रूपी औपचारिकता का भी निर्वाह हो। 

अच्छी बात यह है कि अध्यापक के प्रति भय नहीं रह गया है। लेकिन दुख इस बात का है कि वे प्रीति और आदर के पात्र भी नहीं रह गए हैं। सरकारी स्कूलों में स्थानीय नेताओं का अनवरत हस्तक्षेप और अध्यापकों के गैर-शैक्षणिक कार्यों में नियोजन ने उन्हें और भी दयनीय बना दिया है। मुझे लगा कि प्रतिभागियों के अन्यमनस्कता का वास्तविक कारण यह है कि अब वेतन के अतिरिक्त उन्हें अपने पेशे से जुड़ाव का कोई अन्य कारण नहीं बचा है। कोठारी आयोग ने 1966 की अपनी रिपोर्ट में जोर देकर लिखा था कि ‘शिक्षा की गुणवत्ता और उसके राष्ट्रीय विकास में योगदान को कोई तत्त्व सबसे अधिक प्रभावित करता है तो वह है अध्यापक का स्तर। सरकार उसकी सेवा शर्तों और वेतन भत्तों से यह सुनिश्चित करे कि अध्यापक एक गरिमापूर्ण जीवन का निर्वाह कर सके।’

लगभग आधी शताब्दी बाद यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि अध्यापक का पेशा गरिमा और गौरव दोनों से वंचित हो गया है। इस स्थिति में वह बालकों और किशोरों के लिए प्रेरक और पथ-प्रदर्शक की भूमिका नहीं निभा सकता जो शिक्षा का सूक्ष्म, लेकिन सबसे सार्थक लक्ष्य है। हमने कितने ही महापुरुषों के संस्मरणों और आत्मकथनों को पढ़ा है, जिनमें वे बड़े राग और आवेग से अपने स्कूल अध्यापकों को याद करते हैं। मेधारूपी शुरुआती चिंगारी को स्कूल अध्यापक ही लक्षित कर सकता है, पर आत्महीनता के इस दौर में उससे यह उम्मीद बेमानी है। सरकारी क्षेत्र में पढ़ रहे अधिसंख्य बालकों की क्षमताओं और सुप्त आकांक्षाओं को जगाने वाला भी कोई नहीं दिखता। सच कहूं, तो यह भविष्य के स्वप्न का अंत है।


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