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प्याज तो महज एक प्रतीक है PDF Print E-mail
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Monday, 07 July 2014 09:14

राजकिशोर

 जनसत्ता 07 जुलाई, 2014 : ऐसा लगता है कि भारत में प्याज अपने समय और शासन से स्वायत्त हो चुका है। जब भी उसके मन में आता है, वह नागरिकों को रुलाने लगता है। नागरिक कुछ हफ्तों तक चीखते-चिल्लाते हैं, फिर शांत हो जाते हैं, क्योंकि तब तक प्याज अपना घर भर कर मुस्करा रहा होता है। जिस तरह प्याज की कीमतों में वक्ती उफान आता है, उस तरह अन्य जिंसों की कीमत नहीं बढ़ती। लेकिन अंतिम प्रभाव एक जैसा ही होता है। प्याज उछल-कूद कर जहां पहुंचता है, दाल, अदरख, गोल मिर्च, जीरा, इलायची आदि धीरे-धीरे वहीं पहुंचते हैं। आलू अपेक्षाकृत एक शांत जीव है। वह अपनी सीमा से आगे जाने की कोशिश नहीं करता। पर इस बार वह भी प्याज के रास्ते पर है। उसने भी नागरिकों के खिलाफ विद्रोह कर दिया है। 

वे हजरात कहां हैं जिनकी पक्की धारणा है कि बाजार सर्वश्रेष्ठ नियामक है? वह सभी गुब्बारों की हवा निकाल लेता है और उन्हें पिचका कर एक सामान्य बिंदु पर ले आता है? बाजार जितना स्वतंत्र होगा, चीजों की कीमतें उतनी ही न्यायसंगत होंगी। बाजार को छेड़ना सांप को छेड़ने की तरह है, जिससे किसी को कोई फायदा नहीं हो सकता, क्योंकि सरकारें आती-जाती रहती हैं और बाजार बना रहता है। 

जाहिर है, ऐसे विचारक चाहते हैं कि बाजार और समाज के बीच शासन न आए। अगर इस सुनहले नियम को मान लिया जाए, तो होगा यह कि जो घटना बीच-बीच में घटती है, वह रोज का सिरदर्द हो जाएगी। बेचने वाले संगठित हैं। वे बंद कमरे में बैठ कर षड्यंत्र कर सकते हैं। पर एक तरफ किसान तो दूसरी तरफ उपभोक्ता पूरी तरह से बिखरे हुए हैं। संगठित हमेशा असंगठित को हरा देता है। कहने को तो सरकार नाम का एक और संगठन है, पर उसका काम कुंभकर्ण की तरह सोए रहना है। जब कोलाहल बहुत बढ़ जाता है, तब भी वह उठता तो नहीं, करवट जरूर बदल लेता है।  

नरेंद्र मोदी एक ऐसे दार्शनिक हैं जिसके पास भारत की हर समस्या का इलाज है। यह सिर्फ उनका अपना खयाल नहीं है, देश के इकतीस प्रतिशत लोग भी ऐसा ही सोचते हैं। लोकसभा के चुनाव प्रचार के दिनों में मोदी ने जवाहरलाल नेहरू के प्रति विशेष अनुराग दिखाया था। उन्होंने देश भर में घूम-घूम कर लोगों को बताया कि जवाहरलाल ने जिन आर्थिक नीतियों की नींव रखी थी, वह कांग्रेस का ‘ओरिजिनल सिन’ था, जिसकी सजा सड़सठ सालों से हम भुगत रहे हैं। अब मैं इन नीतियों को दरवाजा दिखा कर रहूंगा। कांग्रेस-मुक्त भारत ही भ्रष्टाचार-मुक्त भारत हो सकता है। मोदी की यह बात तो हम भी मानते हैं, लेकिन इसे सिर्फ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर, जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष उनका बेटा है, लागू नहीं करते- उन सभी राजनीतिक संगठनों पर लागू करते हैं जिनके झंडे का रंग कुछ और है, पर जिनकी आत्मा कांग्रेसियत में डूबी हुई है या उससे भी ज्यादा गिर गई है। 

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि वैकल्पिक नेहरू बनने की तबीयत वाले नरेंद्र मोदी खुद नेहरू की नीतियों पर चल रहे हैं। दो जुलाई की मंत्रिमंडलीय बैठक में जो दो अहम फैसले लिए गए, वे शुद्ध रूप से अनिवार्य कांग्रेसवाद का नमूना हैं। पहला फैसला यह हुआ कि जमाखोरों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए। सरकार प्याज और आलू को तो पकड़ नहीं पा रही है, सो प्याज और आलूदारों को पकड़ कर जेल में बंद करना चाहती है। प्याज हाथ से फिसलती हुई चीज है, पर जमाखोरों की दुकानें और गोदाम तो दूर से ही दिखाई पड़ते हैं। सरकार सोच रही है कि प्याजदारों पर दबाव पड़ेगा तो प्याज खिसक कर मंडी में पहुंच जाएगा। 

क्या  कोई जाकर मोदी को बता  सकता है कि आजादी के तुरंत बाद जब जिंसों की कीमत बढ़ने लगी थीं, तब नेहरू ने दहाड़ कर कहा था कि जमाखोरों को सबसे नजदीक के बिजली के खंबे पर लटका देना चाहिए? बाद में पता चला कि यह वीरता नहीं थी, वीर रस की कविता थी। उन दिनों भी बिजली के खंबे कम नहीं थे, मगर किसी एक पर भी जमाखोर की लाश लटकती हुई नहीं दिखाई दी। तब से बिजली के खंबे और जमाखोर, दोनों की संख्या में लगातार बढ़ती हुई है। लेकिन दोनों के बीच कोई राष्ट्रीयतापरक रिश्ता नहीं बना है। 

दरअसल, नेहरू से लेकर मोदी तक, यही सोच कायम है कि प्याज या आलू या चीनी देश में है तो सही, वरना बाजार में कैसे दिखाई देता, जरूर जमाखोर उन्हें कैद किए हुए हैं, ताकि चार पैसे की चीज चार आने में बेची जा सके। जमाखोरों को पकड़ लो, तो वे प्याज या आलू या चीनी उगलने लगेंगे।

इस कार्रवाई से किसी चीज का दाम गिरता तो नहीं है, पर सर्वसाधारण को मनोवैज्ञानिक राहत मिलती है कि सरकार सख्त कदम उठा रही है। जिसे सख्त कदम उठाना होता है, वह पहले ही उठाता है, घोड़े के नदी में डूब जाने के बाद नहीं। बलात्कार रोकने के लिए समाज निर्माण के प्रयास पहले किए जाने चाहिए, बलात्कार के बाद तो सिर्फ थाना-पुलिस रह जाता है। लगता है, केंद्र सरकार के ईमानदार अफसरों ने भी प्रधानमंत्री को यह बात नहीं बताई। 

दूसरा महत्त्वपूर्ण निर्णय था आलू और प्याज को आवश्यक वस्तुएं कानून के दायरे में ले आना। यह भी कोई नया तीर नहीं है। बाद के प्रधानमंत्रियों की तरह, नेहरू का सोच भी यही था कि हर समस्या का समाधान एक नया कानून है। जैसे अनेक स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में रोज पट्टी पर लिखा रहता है: आज का विचार। 1952 के लोकसभा चुनाव के बाद जवाहरलाल नेहरू ने बाकायदा प्रधानमंत्री पद


की शपथ ली। कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं। जमाखोरों को पकड़ने और जेल में रखने के लिए कोई नया कानून होना था। सो 1955 में आवश्यक वस्तुएं कानून सामने आया। तब से सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बेहूदा ढंग से बढ़ती गई हैं। कागज पर लिखा हुआ कानून किसी का हाथ नहीं पकड़ता, यह ड्यूटी कानून के पहरेदारों की है।

दो जुलाई की बैठक में एक और निर्णय हुआ। प्याज का न्यूनतम निर्यात मूल्य बढ़ा दिया गया। न्यूनतम निर्यात मूल्य का मतलब है वह रकम, जिससे कम दर पर किसी चीज का निर्यात नहीं किया जा सकता। यह रकम तीन सौ अमेरिकी डॉलर थी। अब इसे बढ़ा कर पांच सौ डॉलर कर दिया गया है। यानी भारत का प्याज अंतरराष्ट्रीय बाजार में पांच सौ डॉलर टन से कम कीमत पर नहीं बेचा जाएगा। सरकार को उम्मीद है कि इससे हमारे घरेलू बाजार में ज्यादा प्याज दिखाई देगा। क्या सचमुच ऐसा होगा? एक समाचार के मुताबिक, भारतीय प्याज पहले ही 480 डॉलर की दर से बिक रहा था। जो 480 डॉलर दे सकता है, वह 500 डॉलर भी दे सकता है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाकिस्तान का प्याज 410 डॉलर और चीन का प्याज 300 से 350 डॉलर प्रति टन बिक रहा है। 

प्याज का एक दर्दनाक पहलू यह है कि हम प्याज का निर्यात भी करते हैं और आयात भी। एक आंकड़े के अनुसार 30 मई से 30 जून 2014 के बीच हमने दो करोड़ इक्यावन हजार आठ सौ सोलह डॉलर के मूल्य के प्याज का निर्यात और चार लाख पचास हजार पांच सौ तैंतीस डॉलर मूल्य के प्याज का आयात किया। यह एक ऐसे आदमी की कथा है जो अभाव के मारे घर का सोना बेच रहा है और दूसरी ओर घर भरने के लिए सोना खरीद भी रहा है। 

ऐसा पागल कश्मीर से कन्याकुमारी तक नहीं मिलेगा, लेकिन जिस सरकार के शासन का दायरा कन्याकुमारी से कश्मीर तक विस्तृत है, उसके तत्त्वावधान में यही उलटबांसी घटित हो रही है। यानी देश का एक हाथ विदेश में प्याज बेच रहा है और दूसरा हाथ विदेश से प्याज खरीद रहा है। और, दोनों के बीच संबंध बहुत अच्छे हैं। किसे नहीं पता कि यह रिश्ता क्या कहलाता है। एक वाक्य में उत्तर देना हो, तो मैं कहूंगा, यह प्यार का रिश्ता है: दोनों को मुनाफे से गहरा प्यार है। और, इन दोनों से भारत सरकार को प्यार है। नहीं तो दोनों में से एक ही रह सकता था। 

भारत में उसके लोगों की जरूरत से ज्यादा प्याज पैदा हो रहा है, तो भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्याज बेचेगा। अगर पैदावार जरूरत से कम है, तो खरीदेगा। लेकिन एक ही ट्रेन उत्तर से दक्षिण और दक्षिण से उत्तर कैसे चल सकती है? ऐसी स्थिति में तो ट्रेन न आगे जाएगी न पीछे लौटेगी। यह वह ड्रिल है जिसमें पैर अप-डाउन होते रहते हैं, पर आदमी, बुरी आदत की तरह, अचल रहता है।

तमाशे पे तमाशा यह है कि जब भी बाजार में प्याज या चीनी या आलू की कीमत बढ़ने लगती है, सरकार और कुछ राजनीतिक दल विशेष काउंटर लगा कर सस्ते में उन्हें बेचने लगते हैं। क्या वे कहीं से सस्ते में माल लाते हैं और उपभोक्ताओं को सस्ते में बेच कर पुण्य कमाते हैं? अगर ऐसा है, तो व्यापारी भी यह प्रेम लीला क्यों नहीं दिखा सकते? अर्थशास्त्र के नियमों के अनुसार एक ही बाजार में दो तरह की कीमतें नहीं चल सकतीं। एक दूसरे को उठा कर पटक देगी। जरूर सामयिक लोकप्रियता पाने के वास्ते सरकार या राजनीतिक संगठन कई दिनों तक घाटा सहते हैं। तभी तो ये विशेष काउंटर साल भर नहीं खुले रहते। इतना फालतू पैसा किसके पास है?

जाहिर है, सरकार आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को बागी रफ्तार से बढ़ने से रोकना नहीं चाहती। सच में चाहती, तो वह कीमत वृद्धि को रोकने के लिए साल भर वरदी पहने सावधान की मुद्रा में खड़ी रहती। सबसे मुख्य बात यह है कि सरकार को सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमत, उनकी लागत को वाजिब मुनाफे से जोड़ कर, खुद तय करनी होगी। सरकार खेती की लागत का सारा हिसाब लगा कर यह तो तय कर लेती है कि चावल और गेहूं का न्यूनतम खरीद मूल्य क्या हो, पर उसके पास ऐसे अर्थशास्त्री नहीं हैं जो यह गणना कर सकें कि उस गेहूं और चावल का अधिकतम बिक्री मूल्य क्या हो। सरकार चाहे तो एक मामूली कांस्टेबल भी उसे यह बता सकता है कि जो चीज सौ-सवा सौ किलोमीटर दूर स्थित मंडियों में दस रुपए किलो पर मिल रही है, वही मुहल्ले या सोसायटी के पास बीस-पचीस रुपए किलो पर कैसे बेची जा रही है। लेकिन देखने के लिए सिर्फ आंखें होना पर्याप्त नहीं है, आंखों से काम लेने की इच्छा भी होनी चाहिए।


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