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दक्षिणावर्त : जिद जैसी जिद PDF Print E-mail
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Sunday, 06 July 2014 10:15

altतरुण विजय

जनसत्ता 06 जुलाई, 2014 : हर उसके दुख में, जिसमें शामिल होने से कुछ राजनीतिक लाभ हो, कहीं खबर छपे, कहीं हवा बहे कि हम कितने संवेदनशील और सबके दुख में शामिल होने वाले इंसान हैं, हम जरूर हिस्सेदारी करते हैं, वहां जाते हैं, बयान देते हैं। राजनेताओं के इसी पाखंड से लोग नफरत करते हैं। उनकी बधाई बधाई नहीं, अगले मुकाम के लिए बंदोबस्त होता है, दुख में कहे गए उनके शब्द संवेदना के सुमन नहीं, बल्कि हिसाब-किताब का मामला होता है। 

सार्वजनिक जीवन में संवेदनाओं का समीकरण बहुत कटु और कठोर होता है। अंतत: अकेले ही जीना पड़ता है, जॉर्ज फर्नांडीज की तरह। 

राजनीति में मित्र नहीं होते। सार्वजनिक जीवन में काम इतना होता है कि काम के बिना कुछ बात करने का मौका ही कम मिलता है। अपनों के दुख अपनों के दामन में ही सिमटे रह जाते हैं। चंूकि अपने बहुत अपने और नजदीक होते हैं, इसलिए उनके अकेलेपन, उनके भीतर समाई विराट रिक्तता, उनकी वेदना और कसमसाहट टाली जा सकती है। हम कह देते हैं, आसानी से कह सकने की मुद्रा में, अभी पार्टी की बैठक है, अभी फलां जगह बड़े कार्यक्रम को संबोधित करने जाना है, आखिरकार इस आदमखोर राजनीति में जीने, सांस लेते रहने और शत्रुताओं से बचते हुए कुछ कदम आगे चलते रहने के लिए सेक्रीफाइस न करना पड़ता है। चलो डॉक्टर को बोल देते हैं, तुम दवा लो, अपना खयाल रखो, बहुत दौड़-धूप न करो, हम अगले हफ्ते आने का प्रयास करेंगे। 

हमें अपने बारे में बड़ी गलतफहमी होती है। हम जाएंगे तो तबीयत ठीक हो जाएगी। डॉक्टर से बढ़ कर हमारा जाना काम करेगा। ऐसा कुछ होता नहीं है। सुख-दुख में शामिल होना या दोस्त के साथ दो घड़ी बिना एजेंडे के बैठना जिंदगी के उन क्षणों की चादर बुनता है, जो ओढ़ कर वेदना की सुनामी से हम थोड़ा बच जाते हैं, थोड़ी राहत पा लेते हैं। हममें से अनेक यह भी बताते होंगे कि उनके बच्चे किस कक्षा में पढ़ रहे हैं, उनके क्या-क्या प्रतिभाशाली आयाम हैं और वे कितने बरस बाद जिंदगी के अच्छे मुकाम पर पहुंच जाएंगे। जहां तक दूसरों की सेवा करने का मामला है, वह निहायत अपने मन के सुख और संतोष तक ही सीमित मानना चाहिए। परार्थ अच्छे काम किए जाते हैं, किए जाने चाहिए और करने वालों की चरणवंदना भी करनी चाहिए। लेकिन जो ये काम करने में रुचि रखते हैं, उनको जो सुख मिलता है वही उनको सबसे बड़ा वरदान भी लगता है। बाकी सब पुरस्कार वगैरह तो तब तक ढकोसला ही माने जाने चाहिए, जब तक कि सेवा करने वाला उन पुरस्कारों को ही अपने काम का हेतु न मानता हो। 

क्या अपनों के दुख को नजरअंदाज करते हुए दूसरों की सेवा के लिए जिंदगी दांव पर लगाते रहना बड़ी बात है? शायद हां और शायद नहीं भी। अम्मा कहती थीं कि आदिशंकर अपनी मां के अंतिम समय संन्यासी के सब नियम-कायदे, कानून बाजू में रखते हुए कालड़ी गए, ब्राह्मणों का अपमान और बहिष्कार सहा, लेकिन मां का अंतिम संस्कार स्वयं ही किया।

क्या गलत किया? 

धन और राजसत्ता के ऐश्वर्य का अहंकार तो होता ही है, सर्वविदित है और आरती में हर रोज इसी को देखते हुए क्षमायाचना की दृष्टि से कहा भी जाता है- ‘मो सम कौन कुटिल, खल, कामी’। ये सब लोग तो प्रमाणित अहंकारी होते हैं। सर्टिफाईड एरोगेंट। अविवादित तथ्य। लेकिन जो फरिश्तों की भूमिका में सेवा करते हैं उनका अहंकार कभी देखा है? सेवा का अहंकार? ‘मैं बहुत विनम्र हूं’, इसका अहंकार? यानी विनम्रता का भी अहंकार! अगर साथ में दो दरबान नहीं हैं, बड़ी गाड़ी में नहीं हैं, तो इज्जत कम होने का अहंकार। कभी इन लोगों को बाजार में सब्जी खरीदते, खान मार्केट में कमीज या रूमाल लेते, करोलबाग के ढाबे में खाना खाते देखा है? जनसेवा कर रहे हैं, इसलिए साधारण लोगों की तरह कहीं घूमते दिखेंगे, तो इज्जत न खराब हो जाएगी? 

जो साधारण तरीके से असाधारण काम करते हैं वे स्लीपर क्लास में गमछा बिछा कर सफर करते आज भी मिलेंगे। स्टेशन पर खराब-सी चाय पी लेंगे, कल के तले बासी ब्रेड पकौड़े और छोले के साथ भोजन भी कर लेंगे, फिर अगले मुकाम के लिए दस घंटे की बस यात्रा को चल देंगे। स्टेशन से बस अड््डे तक रिक्शा करें न करें, पंद्रह-बीस रुपया उसमें खर्च करें न करें, यह तय करने में ही तनाव सिर पर ओढ़ लेंगे। किसी के घर में रुकेंगे या अपने


कार्यालय में। बीमारी, बुखार जितना भी हो, कोशिश करेंगे कि जब तक न बताने से काम चलता रहे, तब तक चलाते रहें। बीमार पड़ेंगे तो जो जान-पहचान वाले डॉक्टर हों, जहां पैसा लगभग न देना पड़े, वहां जाएं या भर्ती हों। हमारे ज्योतिस्वरूपजी ऐसे ही थे, ओमप्रकाशजी ऐसे ही हैं। अनंतराम गोखले, दिल्ली वाले ज्योतिजी, शिवप्रसादजी इसी तरह चले गए कि सन्नाटा भी न टूटा। ये लोग ऐसे क्यों और कैसे गढ़ जाते हैं, गढ़े जाते हैं? इन सबके भी माता-पिता, भाई-बहन होते हैं। 

राधेश्यामजी ऐसे ही थे। बहुत, बहुत, बहुत समझाया अब प्रवास कम करिए, परहेज अधिक और दवा तरीके से लीजिए। बिना रिजर्वेशन स्लीपर क्लास में धक्के खाते हुए पुणे पहुंच गए। रज्जू भैया की जयंती का कार्यक्रम करना तय हुआ था। बैठक थी। जान जाए तो जाए, पर कार्यक्रम तय हुआ है तो करना ही है। उनकी वापसी का थर्ड एसी का टिकट कराया, तो संकोच में पड़ गए। रास्ते भर भयानक खांसी। पुणे में ही एक डॉक्टर से दवा ली। उससे आराम हुआ तो प्रयाग पहुंच कर फोन करते रहे कि वही दवाई अब खरीदी है। पांव में सूजन। मधुमेह। वापस प्रयाग चले गए। 

चार-पांच दिन पहले शांतनु महाराज का फोन आया। राधेश्यामजी बीमार हैं और अस्पताल में भर्ती हैं, पेसमेकर लगेगा। हम मंगलौर से दिल्ली लौट रहे थे। एक हरिमंगल ही हैं, जिनको हम कुछ कह सकते हैं। वे गए, हाल बताया। भाई छोटी-मोटी खेती करते हैं, बहनोई कहीं से कर्जा लेकर डेढ़ लाख रुपए लाए। पेसमेकर लगा। कल हरिमंगल ने बात करवाई। राधेश्यामजी, दिल्ली कुछ समय के लिए आराम कीजिए- पेसमेकर के बाद परहेज वाली देखभाल बड़ी जरूरी है। बात ठीक हुई। हरिमंगल कुछ व्यवस्था करते कि आज सुबह शांतनु महाराज का फोन आ गया- राधेश्यामजी की सूचना मिल गई आपको? यह सवाल ही अपने आप में सूचना था। राधेश्यामजी हमें अकेला करके चले गए। उनके भाई राजेंद्र उनका शरीर अब महोबा ले जा रहे थे। क्यों गए? 

उनको अभी जाना नहीं था। पचास के आसपास की आयु थी। महोबा के रहने वाले थे। एमए किया था। धुन थी कि कुछ करना है, अलग करना है, इसलिए गांव छोड़ कर सामाजिक संगठन करने लगे। उनकी बहुत इच्छा थी कि रज्जू भैया के नाम पर एक एंबुलेंस ले दी जाए। गांव में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए सचल विज्ञान प्रयोगशाला और रज्जू भैया का दिल्ली और देश के अन्य बड़े नगरों में स्मरण। पिछले साल दिल्ली में तो हुआ। 

वंदना कहती थी कि राधेश्यामजी ऐसा कब तक करोगे? जिंदगी बड़ी कठोर है। वे हंस पड़ते और झोला उठाए झंडेवालां चल देते। 

कुछ लोग ऐसे ही होते हैं। धुर वामपंथियों से हमारा कठोर मतभेद होगा, लेकिन अनेक गांवों में वे भी ऐसे ही कहीं-कहीं काम करते दिखते हैं, तो लगता है ऐसे मनुष्य अभी बाकी हैं, जो अपने मन की सुन कर जगत में रमने की लालसा छोड़ सकते हैं। ईसाई मिशनरियों में कहीं-कहीं वे जो सिर्फ अपनी धुन के लिए अफ्रीका के जंगल, डेढ़ सौ साल पहले नगालैंड और शिलांग गए, वे ऐसे ही थे। मतभेद होंगे, हम उनके उद्देश्यों से सहमत न भी हों तो भी उनकी जिजीविषा प्रणम्य है। स्वामिनारायण संप्रदाय के युवा संन्यासी, अमेरिका, इंग्लैंड, नौरोबी में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील रहे। मां की अकेली संतान फिर भी काषाय वस्त्र पहना कर सेवा धर्म के लिए भेजा। एक-दो दिन का काम नहीं, जिंदगी भर समाज के प्राण बचाने के लिए अपने प्राण तिल-तिल कर गलाना। 

उनकी सेवा की उद्दामता, उनकी जिद, स्वयं के प्रति निर्मम और कठोर होते हुए अपने विचार और उद्देश्य के लिए मर मिटना साधारण काम नहीं है। जिद हो तो ऐसी हो, वरना बहते हुए जिंदगी तो सभी जी लेते हैं।


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