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समांतर संसार : तरक्की और तकलीफें PDF Print E-mail
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Sunday, 06 July 2014 10:14

सय्यद मुबीन ज़ेहरा

जनसत्ता 06 जुलाई, 2014 : दुनिया विकास कर रही है, तेज गति से। मानवाधिकारों को लेकर दुनिया भर में जागरूकता के बारे में हम पढ़ते-सुनते रहते हैं। तमाम सरकारें मानवता की भलाई के लिए काम कर रही हैं। बहुत सारे संगठन मनुष्य को शांति और संतुष्टि देने के लिए काम कर रहे हैं। सरकारें हों या राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक नेता या फिर किसी विशेष समुदाय या सोच के नेता; सभी का एक ही एजेंडा है- मानवता की रक्षा। दुनिया के बड़े देश से लेकर छोटे देश चीख-चीख कर कहते मिलेंगे कि हम मानवता की भलाई के लिए काम कर रहे हैं। 

पश्चिम के नेता हों या हमारे देश के; यूरोप, अरब, एशिया या अफ्रीका के नेता, कुल मिला कर कहें कि संयुक्त राष्ट्र के नेता तक दुनिया में मानवता को बचाने और इसे बढ़ावा देने के लिए हर समय दौड़-भाग करते नजर आते हैं। कुछ तो ऐसे बड़े नेता हैं, जिनको हम दुनिया भर में केवल मनुष्यों को बचाने के लिए घूमते-फिरते देखते हैं। पर सवाल है कि क्या इंसान या मानवता की रक्षा इस दौड़-भाग से हो पा रही है? 

तथ्य यह है कि दुनिया इस समय मानवाधिकारों की रक्षा के लिए की जा रही सभी दौड़-भाग और कोशिशों के दावों के बावजूद पहले से कहीं अधिक जोखिम से घिर चुकी है। यह इस बात का सबूत है कि दुनिया को सुरक्षित बनाने वाले या तो किसी और उद्देश्य से ऐसी बातें करते रहे हैं या फिर वे पूरी तरह विफल हो चुके हैं। इस विफलता का सबूत इस समय दुनिया भर के लोगों की तड़प के साथ-साथ मौसम में आ रहा भारी परिवर्तन भी है। आज हम विकास का दावा कर रहे हैं, लेकिन इसका सच यह है कि इंसान का इंसान पर भरोसा कम होकर धन और उससे जुड़ी बातों पर अधिक हो गया है। अगर इसी का नाम विकास है तो फिर हमें यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि यह मानवता की गिरावट का दौर है। दुनिया को यहां तक लाने में नेताओं ने जो ‘कर्तव्य पालन’ किया है उसे देखते हुए हम कह सकते हैं कि दुनिया एक होकर सोचने में नाकाम रही है, जिसकी वजह से इस पर खतरों के बादल पहले से अधिक छाए हुए हैं, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा दर्दनाक सत्य है। 

संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थियों पर आधारित 2013 की रिपोर्ट की समीक्षा से पता चलता है कि इस समय दुनिया में पांच करोड़ से अधिक लोग अपनी जमीन से उजड़ कर दूसरी जगहों पर शरण लेने को मजबूर कर दिए गए हैं। इनमें से आधे से अधिक ऐसे बच्चे हैं, जो या तो अकेले रह गए हैं या फिर किसी समूह के साथ तो हैं, मगर उन पर हर समय गलत हाथों में जाने का खतरा मंडरा रहा है, जो इन बच्चों को यौन अपराधों या तस्करी में शामिल कर सकते हैं। अगर आपको विकास का यह नमूना पसंद नहीं आया तो इसका मतलब है कि अब भी आपके मन में दुनिया का दर्द मौजूद है। नहीं तो दुनिया भर में घूम-घूम कर मानवता और दुनिया की सुरक्षा का दावा करने वालों को देखें तो आपको लगेगा कि उनका उद्देश्य अपनी राजनीति चमकाने के अलावा कुछ और नहीं है। मानव जीवन के मूल्य उनके लिए कुछ भी नहीं हैं। 

अपनी जड़ों से कोई अपनी इच्छा से नहीं उखड़ता, बल्कि उन्हें इसके लिए मजबूर किया जाता है। दुनिया भर में हो रही हिंसा ने करोड़ों निर्दोष लोगों को अपना सब कुछ लुटा कर केवल जान बचाने के लिए बदहाल और बेहाल जीवन जीने पर मजबूर कर दिया है। अफगानिस्तान से लेकर सीरिया, इराक, मिस्र, सूडान, कांगो, सोमालिया जैसे देशों में वहां के हालात ने लोगों को अपनी जमीन छोड़ कर कहीं और शरण लेने पर मजबूर कर दिया है। यह रिपोर्ट बताती है कि


दुनिया भर में अपनी श्रेष्ठता का दावा करने वाले देश तक इस मामले में बेअसर हैं या फिर उन देशों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि करोड़ों लोग बर्बादहाल दर-दर भटक रहे हैं। 

यह भी संभव है कि इस तरह बेहाल लोगों के होने से विश्व में राजनीति करने वाले देशों का कोई बड़ा फायदा होता होगा। तभी तो संयुक्त राष्ट्र जैसे बड़े संस्थान भी इस मामले में केवल उन पुलिस थानों जैसी भूमिका निभाते दिखाई देते हैं, जिनका काम अपराध होने के बाद रिपोर्ट दर्ज करना रह गया है। 

विश्व भर में शरणार्थियों की बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि हम पहले से अधिक खतरनाक और हिंसक दुनिया में जी रहे हैं, जहां एक-दूसरे के खिलाफ नफरत इस तेजी से बढ़ रही है कि लोगों की जान पर बन आई है। यही नहीं, इस समय हालात ऐसे हैं कि कई देशों में दूसरे देशों के शरणार्थियों की  वजह से समस्याएं पैदा हो रही हैं। लेबनान में एक चौथाई से अधिक सीरिया से आए शरणार्थी हैं। उनकी मौजूदगी लेबनान के, जो खुद अच्छी स्थिति में नहीं है, संसाधनों को कमजोर कर रहा है। वहां तनाव बढ़ रहा है। 

सवाल है कि दुनिया भर के देश क्यों नहीं मिल कर सच्चाई का साथ देते हैं। संयुक्त राष्ट्र की जो बड़ी भूमिका इसके गठन के समय सोची गई थी वह क्यों नहीं चल पा रही है। जब तक इस कमी को पहचान कर दूर नहीं किया जाता, तब तक दुनिया भर में विकास के दावे बेमानी रहेंगे। धीरे-धीरे दुनिया और अधिक तबाही के करीब पहुंचती जाएगी। 

दुनिया के कुछ देशों ने न केवल मानवाधिकार, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर जो कुछ भी दिखावे का काम किया था, उसके ऊपर से तेजी से परदा सरक रहा है। दुनिया में मौसम बदल रहे हैं। कहीं अचानक अधिक गरमी पड़ रही है, तो कहीं बारिश का सिलसिला नहीं रुक रहा। कहीं पहाड़ों की बर्फ पिघल कर समंदरों का दायरा बढ़ा रही है। लाखों-करोड़ों लोग दुनिया के नेताओं के गलत मार्गदर्शन की वजह से आज दर-दर भटक रहे हैं। न तो पर्यावरण संरक्षण हो पाया है और न मानवता पर से खतरा हट पाया है। यह स्थिति तब है, जब दुनिया के पास ऐसे हथियारों की कमी नहीं है, जो अगर किसी आइएसआइएस के अल बगदादी जैसे गलत हाथों में चला गया तो दुनिया को तबाही से कोई नहीं बचा पाएगा। 

सवाल फिर भी वही है कि आज दुनिया पहले से अधिक हिंसा का शिकार क्यों हो रही है। ऐसे में दुनिया भर के नेताओं की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे एक होकर सत्य की ओर झुक जाएं, ताकि आपदा की ढलान पर तेजी से फिसलने वाली हमारी दुनिया को किसी तरह नष्ट होने से बचाया जा सके! अगर दुनिया के सभी नेता सच्चाई का साथ दें, अपने छोटे फायदों को किनारे रख दें और दिल लगा कर दुनिया में शांति और सौहार्द के लिए काम करें, तो तय है कि दुनिया में एक बार फिर शांति और सुरक्षा होगी।  


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