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वक़्त की नब्ज़: लाइसेंस राज में फंसी शिक्षा PDF Print E-mail
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Sunday, 06 July 2014 10:07

altतवलीन सिंह

जनसत्ता 06 जुलाई, 2014 : भारतीय शिक्षा की बीमार अव्यवस्था का प्रतीक हैं, छात्रों की वे लंबी लाइनें जो लग जाती हैं विश्वविद्यालयों में हर साल इस महीने। जिंदगी की तमाम उम्मीदों को लेकर आते हैं ये बच्चे, जो जानते हैं कि वे काबिल हैं, जो जानते हैं कि उनके नतीजे अच्छे हैं लेकिन यह भी जानते हैं कि उनको शायद दाखिला नहीं मिलेगा क्योंकि उनके 92 फीसद नंबर थोड़े पड़ सकते हैं 97 फीसद वालों के सामने। ‘कट-आफ’ की दौड़ में वह पीछे रह सकते हैं। बाकी दुनिया के विश्वविद्यालयों में न यह ‘कट-आफ’ होता है न ही कतरें लगती हैं दाखिलों के लिए। अपने देश में यह चीजें इतनी नार्मल मानी जाती हैं कि पिछले दिनों ज्यादा अहमियत दी मीडिया ने उस झगड़े को जो हाल में यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन) और दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर के बीच हुआ था। 

यूजीसी का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए इस तरह शिक्षा की बारीकियों में जाने का। यह अधिकार वाइस चांसलर साहब का ही होना चाहिए लेकिन जो शिक्षक और बुद्धिजीवी उनके समर्थन में निकल कर आए थे क्यों नहीं उन्होंने यही अधिकार उन कालेजों के लिए मांगे जो दिल्ली यूनिवर्सिटी के तहत जबर्दस्ती लाए जाते हैं? क्यों नहीं उस लाइसेंस राज के खिलाफ आवाज उठाई जो भारतीय उच्च शिक्षा के लिए जानलेवा बन गया है? आज अगर भारत की आला शिक्षा संस्थान दुनिया की आला शिक्षा संस्थाओं में नहीं गिनी जाती है तो कारण है यह लाइसेंस राज।

मानव संसाधन विकास मंत्री से क्यों नहीं पूछते हैं हम कि देश को क्या लाभ मिला है इस लाइसेंस राज से? इसके होते हुए नहीं बन पाए हैं वह कालेज, वह विश्वविद्यालय जिनके बिना भारत के बच्चे आगे नहीं बढ़ सकेंगे। याद है मुझे कि पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री, कपिल सिब्बल, ने मुझे खुद बताया था 2009 में दिए गए एक इंटरव्यू में कि विश्वविद्यालयों कितनी सख्त कमी है देश में कि उनके हिसाब से हमको जरूरत है 1500 नए विश्वविद्यालयों की। आज देश भर में विश्वविद्यालयों की संख्या 500 के करीब है निजी विश्वविद्यालयों को गिनने के बाद।

वह 1500 नए विश्वविद्यालय अगर अभी क्षितिज पर भी नहीं दिख रहे हैं तो इसलिए कि यूजीसी और उसकी सगी बहन एआईसीटीई (आल इंडिया काउंसिल फार टेक्निकल एजूकेशन) कोटा से ज्यादा लाइसेंस देते ही नहीं हैं। इनका कब्जा बिल्कुल वैसा है जैसा किसी जमाने में उद्योग जगत पर लाइसेंस राज का कब्जा हुआ करता था। कोटे से ज्यादा अगर कोई उद्योगपति उत्पादन करने की गलती करता था, जेल जाने की नौबत आ सकती थी। इस लाइसेंस राज को समाप्त किया डाक्ट मनमोहन सिंह ने 1991 में जब वे वित्तमंत्री थे और भारतीय उद्योग के लिए अच्छे दिन फौरन आ गए थे। आज अगर स्मृति ईरानी शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे दिन लाना चाहती हैं तो उनको लाइसेंस राज को एक झटके में खत्म करना होगा। एआईसीटीई को मिलनी चाहिए सजा-ए-मौत और यूजीसी को सौंपा जाना चाहिए गरीब छात्रों को आर्थिक सहायता और वजीफे देने का काम। फिलहाल यूजीसी अपने पैसे बांटता है संस्थानों को जिसका लाभ छात्रों को कम ही मिलता है क्योंकि मामूली फीस बेशक देते हो अपनी पढ़ाई के लिए लेकिन मामूली पढ़ाई भी हासिल करते हैं। ऊपर से समस्या यह भी है


कि विश्वविद्यालय इतने कंगाल हो चुके हैं कि विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में कम से कम पांच लाख प्राध्यापकों की कमी है। भारतीय मूल के प्रोफेसर बेशुमार हैं दुनिया में लेकिन उन विदेशी कॉलेजों में पढ़ाना पसंद करते हैं जहां उनकी तनख्वाहें उनकी काबलियत के मुताबिक मिलती है

उच्च शिक्षा क्षेत्र में खराबी, भ्रष्टाचार और गिरावट इतनी आ चुकी है कि हमको चिंता यह नहीं होनी चाहिए कि श्रीमती ईरानी सिर्फ बारहवीं पास हैं चिंता होनी चाहिए कि उनमें इस चुनौती का सामना करने की हिम्मत है कि नहीं। हिम्मत है तो उनका नाम इतिहास में लिखा जाएगा सुनहरे अक्षरों में लेकिन ऐसा होने से पहले उनको कई महिषासुर मारने होंगे जो जिंदा हैं लाइसेंस राज की बदौलत। अगर ऐसा करने की हिम्मत नहीं है मंत्रीजी में तो वह भी कामचलाऊ सुधार करके काम चला सकती हैं जैसे अक्सर होता रहता है पिछले दशक में। दो रास्ते हैं उनके सामने और सही रास्ता अगर चुनना चाहती हैं तो इस बात को याद रख कर चलना होगा कि अगर वह गलत रास्ता चुनती हैं तो प्रधानमंत्री का वह नया भारत का सपना कभी साकार न हो सकेगा। इसलिए कि हर वर्ष इस देश में रोजगार ढूंढ़ने निकलते हैं एक करोड़ से ज्यादा नौजवान जिनको रोजगार तब ही मिलेगा जब वह उच्च शिक्षा प्राप्त करके आएंगे। यह कैसे संभव होगा जब अच्छे कालेजों की इतनी गंभीर समस्या है कि काबिल छात्रों के लिए भी दाखिला मिलना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है?

इस स्थिति में कोई तब्दीली नहीं आने वाली है अगर मंत्रीजी हिम्मत दिखा कर लाइसेंस राज को पूरी तरह से खत्म करने का काम नहीं करती हैं। बिना इजाजत के अधिकार मिलना चाहिए किसी को भी किसी नए कालेज या विश्वविद्यालय का निर्माण करने का। सरकार की तरफ से सिर्फ इतना होना चाहिए कि वह ठोस मापदंड तय करके सार्वजनिक कर दे। इस काम में मंत्रीजी को पूरा समर्थन मिलना चाहिए प्रधानमंत्री का, 

क्योंकि विरोध बहुत होगा न सिर्फ उन सरकारी अफसरों से जिनकी रोजीरोटी- जिनकी शक्ति, इस लाइसेंस राज पर निर्भर है लेकिन उन वामपंथी बुद्धिजीवियों से भी जिनके कहने पर उच्च शिक्षा का यह ढांचा बना है। 

दुख की बात है कि यह सब हुआ है गरीब छात्रों के नाम पर और सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं को हुआ है। इसलिए कि पैसे वाले छात्र चले जाते हैं विदेश जब यहां जगह नहीं मिलती है। गरीब कहीं नहीं जा सकते।


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