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प्रसंग : स्वायत्तता का स्वर्णमृग PDF Print E-mail
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Sunday, 06 July 2014 10:04

शंभुनाथ

जनसत्ता 06 जुलाई, 2014 : आज हर सत्ता स्वायत्तता देने की बात करती है। इस संदर्भ में रामायण के मारीच की याद आती है। वह राक्षस-वृत्ति छोड़ कर रावण की लंका में कुटी बना कर स्वायत्तता के साथ रहता था और राम की भक्ति करता था। रावण ने जब सीता-हरण की योजना बनाई, वह स्वर्णमृग बनने का आदेश देते हुए अपने मामा मारीच के पास गया। मारीच ने मना कर दिया कि वह मायावी कर्म छोड़ चुका है। रावण ने उसके सामने तब दो विकल्प रखे, आदेश की अवहेलना करने पर अभी मेरे हाथों मरो या स्वर्णमृग बन कर राम के हाथों! यही स्थिति आज है। स्वायत्तता का वध बाजार के हाथों हो या राजनीति के?

वैश्वीकरण का प्रधान मूल्य है स्वायत्तता। माना जाता है कि स्वायत्तता की वजह से ही नए अन्वेषण, तेज गति से काम और पारदर्शिता संभव है। शिक्षा को राज्य या राजनीति के हस्तक्षेप से मुक्त रखने की बात होती है। मीडिया स्वायत्तता की बात करता है। धार्मिक स्वतंत्रता एक मान्य तथ्य है। नौकरशाही को स्वायत्तता देने की बात कही जाती है। कला स्वायत्तता के बिना संभव नहीं है। स्वायत्तता से गतिशीलता ही नहीं, स्वच्छता भी आती है, जो वैश्वीकरण की कामना है। शिक्षा, मीडिया, नौकरशाही, प्रशासन और संस्कृति के अलावा जब व्यापार को राज्य के नियंत्रण से मुक्त रखा जाने लगता है, आर्थिक सुधार, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और कड़े फैसले वैश्वीकरण के बक्से से दैत्य की तरह बाहर आते हैं। देखा जाता है कि ऐसी हालत में अन्य सारी स्वायत्तताएं निरीह और आत्मविसर्जन-मुखी हो उठती हैं। शिक्षा, मीडिया, कलाओं, धर्म, नौकरशाही और प्रशासन का मुक्त अर्थव्यवस्था के खेल में अपनी स्वायत्तता बचा पाना असंभव हो जाता है। 

इसी समय नए-नए राजनीतिक अवतार में राष्ट्र सामने आता है। उसे एक झपट्टे में दो कबूतर पकड़ना है। बाजार को भी देखना है, ताकि आर्थिक वृद्धि हो और लोकतंत्र को भी देखना है, ताकि जनता का असंतोष न फूटे। भारत दोनों कबूतरों के पीछे दौड़ते-दौड़ते एक हांफ उठा देश है। यहां हर जगह स्वायत्तता की बात जोर-शोर से कही जाती है और हर जगह स्वायत्तता का वध जम कर होता है। अंतत: राजनीतिक दबाव छा जाता है। कई सुधार रुक जाते हैं। विकास के कई काम ठप्प हो जाते हैं और कई गड़बड़ियां राजनीतिक प्रभाव से ढंक दी जाती हैं। यह वैश्वीकरण का चरम अंतर्विरोध है। 

स्वायत्तता की दुश्मन सिर्फ राज्यसत्ता नहीं, बाजार सत्ता भी है। शिक्षा, मीडिया, प्रशासनिक न्याय, कलाएं और तमाम सांस्कृतिक निर्माण आज जब बाजार की वस्तुओं में बदल चुके हैं, यह समझना कठिन नहीं है कि हम स्वायत्तता के आखिरी युग में हैं। फिर भी स्वायत्तता की कुछ अंतिम जगहें हैं, जहां हम अब भी कुछ सोच पा रहे हैं, भले सुने नहीं जा रहे हों। आज विकास के प्रभामंडल में आनंद और मातम के दृश्य बिल्कुल आमने-सामने हैं। यह जैसे स्वायत्तता की धारणा को ही फिर से परिभाषित करने की चुनौती है। किससे स्वायत्तता? राज्य की सत्ता से, बाजार की सत्ता से या धर्म की सत्ता से या तीनों में होने के बावजूद तीनों से? 

स्वायत्तता का संबंध मानवीय और संवैधानिक उत्तरदायित्व से है, अंत:विवेक से है, जो खरीदे-बेचे जाने के लिए नहीं होता है। पर यह अंत:विवेक आज बड़ी आसानी से खरीदा-बेचा जा रहा है। दुनिया के सैकड़ों साल के इतिहास में बुद्धिजीवी कभी इतने बड़े पैमाने पर सत्ता के पिछलग्गू और दरबारीलाल नहीं थे। मध्यवर्ग कभी इतने बड़े पैमाने पर दकियानूस नहीं था- जातिवाद, धार्मिक पाखंड और अंध-जातीयता में फंसा। यह सहिष्णुता की बात करता है, पर खुद सबसे ज्यादा असहिष्णु होता है। इस वजह से एक बड़ी सामाजिकता, मिश्रित अंतर्दृष्टि और लोकतांत्रिक चेतना का विकास सभ्यता के शिखर पर भी अवरोध का शिकार है। लोकतंत्र का अर्थ है ‘दूसरे के लिए जगह’, जबकि फासीवाद दूसरे धर्म, दूसरी जाति, दूसरी जातीयता और दूसरे राजनीतिक दल के प्रति प्रत्यक्ष या छिपी घृणा पर टिका होता है। आज ऐसी घृणा का बीज बोने वाले लोग साधारण वर्गों के नहीं, सिर्फ मध्यवर्ग के हैं, जबकि वर्तमान युग का संदेश है ‘स्वायत्तता के साथ सहयात्रा’। 

स्वायत्तता का धनलोलुपता से कोई संबंध नहीं हो सकता, जबकि शिक्षा, मीडिया, कलाओं, धर्म, प्रशासन और नौकरशाही की दुनियाओं में धनलोलुपता भरी हुई है। शिक्षा, न्याय और कलाएं धनलोलुपता के उद्देश्य से उत्पादित चीजों से ऊंची वस्तुएं हैं। ये अगर स्वतंत्रता के उत्पादन न होकर पैसे की संस्कृति से प्रभावित हैं, तो कभी मानवीय नहीं हो सकतीं और कभी एक


अच्छी सभ्यता का निर्माण नहीं कर सकतीं। 

स्वायत्तता का अर्थ देखना हो तो हम बुद्ध में, नालंदा विश्वविद्यालय जैसे प्राचीन प्रतिष्ठानों में, कबीर और तुलसी जैसे भक्त कवियों में, गांधी जैसे व्यक्तित्व में या अज्ञेय और नागार्जुन जैसे आधुनिक कवियों में देख सकते हैं। उनमें से किसी ने भी अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता न राज्यसत्ता के हाथ में गिरवी रखी, न बाजारसत्ता और धर्मसत्ता के हाथों में। उनमें स्वायत्तता की चेतना की वजह से ही एक वृहत्तर मानवीय उत्तरदायित्व का बोध था। ऐसा नहीं था कि उनके समय में आज से कम कठिन स्थितियां थीं, पर निश्चय ही उनके भीतर ऐसी स्थितियों से टकराने की संकल्पशक्ति आज से बहुत ज्यादा थी। 

कहना न होगा कि हमारे देश में शिक्षा, मीडिया, कला-साहित्य या प्रशासन में, कोई भी शासन हो, स्वायत्तता को एक स्वच्छ अंत:विवेक के साथ पनपने का मौका कभी नहीं मिला। इन क्षेत्रों में बार-बार राजनीतिक हस्तक्षेप हुए। यहां राजनीति, वहां राजनीति। जहां देखो तहां राजनीति। स्वतंत्रता से सांस लेने की एक छोटी जगह भी नहीं। राजनीति का अर्थ बदल गया, यह परिवर्तन की जगह अब निजी या सामुदायिक आत्मपोषण का हथियार है। इसी तरह बाजार का अर्थ बदल गया, अब यह सिर्फ बिकने की जगह है। हम स्वतंत्रता का भोग नहीं कर रहे हैं, हम सिर्फ खरीदे जा रहे हैं? 

भौतिक सुखवादियों के विश्वग्राम में क्या सच्ची स्वायत्तता और वैश्वीकरण संभव है? कहना न होगा कि स्वायत्तता एक भ्रमजाल है, जिस तरह आज किसी आदमी में सच्चा विश्व-मन नहीं है। यह उदारीकरण का जमाना है, पर एक-एक आदमी अनुदार होता जा रहा है। राष्ट्र और राष्ट्र के बीच, एक ही देश में विभिन्न जातीयताओं के बीच और विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच दीवारें बढ़ रही हैं। धर्म की स्वायत्तता हाईजैक कर ली गई है। इस पर बाजार और राजनीति दोनों ही दो तरफ से सवार हैं। दरअसल, भौतिक सुखवाद और कट्टरवाद सियासी जुड़वा हैं, जो कभी सच्चे वैश्वीकरण की तरफ नहीं ले जा सकते। 

इसलिए आनंद और मातम दोनों तरह के दृश्यों के बीच अगर ‘अच्छे दिन- कड़े फैसले’ का विरोधाभास दिखता है, इसमें कुछ भी अचरज नहीं है। हमारे दुखों की तरह हमारी आशाएं भी अब राजनीतिक खिलौने हैं।

बाजार ही असली सरकार है। इसलिए जो भी पार्टी सत्ता में आएगी, वह सबसे पहले अपने सिद्धांत का त्याग करेगी। इस बाजार का मकसद सिर्फ माल और सेवाएं बेचना नहीं है, बल्कि मानवीय स्थितियों के लिए संघर्ष कर रहे लोगों को यह बताना भी है कि नई दुनिया तुम लोगों द्वारा नहीं, सिर्फ टेक्नोलॉजी के नए-नए आविष्कारों, एक के बाद एक नई लहर की बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कुछ ‘कड़े फैसलों’ द्वारा ही अस्तित्व में आएगी। 

यह भी उल्लेखनीय है कि देश में नेता जितने हों, पर जन-आंदोलन का नामोनिशान नहीं है। अति-उत्साह में जुझारू लोग अपना सब कुछ खोते गए हैं। फिर भी बाजार और सरकार दोनों के लिए एक बुरी खबर है। भारत में लोकतंत्र अब भी एक जीवित ज्वालामुखी है। इसकी आग कहीं से न फूट कर कहीं से फूटी और कांग्रेस को फिलहाल भस्म कर गई। मीडिया को भ्रम है कि यह उसकी करामात है या अपनी गड़बड़ियों को ढंकने के लिए कई नेता इसे महज ‘ध्रुवीकरण’ का मामला कहते हैं या महज कॉरपोरेट पैसे का खेल बताते हैं। यह मुख्यत: जन-असंतोष का नतीजा है, जो दूसरे मजबूत के पक्ष में गया। 

यह आग अभी जल रही है। अगर बड़े राष्ट्रीय फलक पर नहीं फूटेगी, छोटे-छोटे ‘स्थानों’ से फूटेगी। स्वायत्तता का बाजारीकरण चुनौतीविहीन नहीं होगा और न स्वायत्तता का राजनीतिकरण। स्वायत्तता लोकतंत्र की अमर आत्मा है, यह सिर्फ वैश्वीकरण का प्रधान मूल्य नहीं है। इसलिए संभव है, अंतत: मारीच बच जाए।


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