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कभी-कभार : ताड़ता हुआ आदमी PDF Print E-mail
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Sunday, 06 July 2014 09:52

altअशोक वाजपेयी

जनसत्ता 06 जुलाई, 2014 : दिल्ली की उर्दू अकादमी ने हाल में नज़ीर अकबराबादी पर दो दिनों का एक आयोजन किया और मुझे भी कुछ कहने का न्योता दिया। सो एक बार फिर इस अनूठे कवि की रचनाएं उलट-पुलट गया। चूंकि मैं हिंदी साहित्य का विधिवत छात्र नहीं रहा हूं, बहुत से कवियों तक पहुंच दूसरे कला-माध्यमों से हुई: कबीर तक पहुंचा कुमार गंधर्व के निर्गुण गायन से और नज़ीर तक हबीब तनवीर की रंग प्रस्तुति ‘आगरा बाजार’ से। इस नाटक के शुरू में एक गणेश वंदना याद आती है, जिसमें चाहा गया है कि गणेश की महिमा तो रहे ही, ‘महिमा उसकी भी रहे जिसका नाम नज़ीर’।

नज़ीर की कविता आज भी बड़े अचरज में डालती है। शायद थोड़ी-बहुत संस्कृत और प्राकृत के अलावा हमारे यहां कविता और रोजमर्रा की जिंदगी में खासी दूरी रही है। लेकिन नज़ीर के यहां यह दूरी बहुत कम है, न के बराबर। वह भी उस कविता में, जो अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध और उन्नीसवीं के पूर्वार्द्ध में लिखी गई। आम आदमी का बहुत नामजाप होता रहा है, पर सच तो यह है कि उसका पहला बड़ा कवि नज़ीर ही है: उसके यहां आमफहम जिंदगी की जैसी मौजूदगी है वैसी उसके पहले या बाद में भी कविता में शायद ही हुई हो। अलक्षित लोगों, चीजों, पक्षियों, ककड़ी-जलेबी, कोरा बर्तन, रीछ का बच्चा, तीज-त्योहार, मेले-ठेले सब इस कविता में सहज भाव से हैं: उनका जिंदगी में होना कविता में भी होना है। कहते हैं कि साधारण नागरिक नज़ीर का रास्ता रोक कर उनसे कविता सुनते थे। अपनी दुनिया का ऐसा निस्संकोच गुणगान अन्यत्र दुर्लभ है। 

शहर कविता और साहित्य में जब-तब बोलते रहे हैं। लेकिन आगरा जितना नज़ीर के यहां कविता में बोलता है उतना शायद ही किसी और कवि के यहां कोई शहर अपनी पूरी रंगारंग विविधता और ऊर्जस्विता में बोला हो। ग़ालिब के खतों में तो दिल्ली है, लेकिन उनकी कविता का शहर रूपक अधिक है, भौतिक सच्चाई कम। उस समय हिंदी कविता में स्थानीयता तो थी, पर कृष्ण-राधा और राम के मिथकों में ढंकी हुई: उसमें मिथकहीन लोग नहीं थे जैसे कि नज़ीर के यहां बेशुमार हैं।

नज़ीर दुनिया के तमाशे की भी याद दिलाते हैं और उनके यहां नश्वरता का बोध भी गहरा और सक्रिय है। उनकी एक कविता का समापन यों होता है:

क्या हिंदू, क्या मुसलमां, क्या रिंदो गबरो काफिर।

नक्काश क्या, मुसव्विर, क्या खुश नव्स शाइर।

जितने, नज़ीर हैं, यां, एक दम के हैं मुसाफिर।

रहना नहीं किसी को चलना है सबको आखिर।

दो चार दिन की खातिर, यां घर हुआ तो फिर क्या!

‘चिड़ियों की तस्बीह’ कविता में जितनी चिड़ियां अपने नाम से हैं उतनी शायद इससे पहले किसी कविता में इतनी जगह नहीं पा सकी थीं। एक अंश यों है:

पंख हो या गुड़ पंख उसी के गम के तप में तपते हैं

उनका और सीमुर्ग उसी की फुर्कत बीच तड़पते हैं

सारस, गिद्ध, हवासिल, बुज्जे, बगले पंख कलपते हैं

पंख पखेरू जितने हैं, सब नाम उसी का जपते हैं।

‘आदमीनामा’ कविता को भारत की एक महान कविता मानने में मुझे कोई संकोच नहीं है। नज़ीर ने ही यह हिम्मत की कि कह सके:

अच्छा भी आदमी ही कहाता है ऐ नज़ीर

और सब में जो बुरा है सो है वह भी आदमी।

इस समापन के पहले इसी कविता में ये पंक्तियां भी हैं:

पढ़ते हैं आदमी ही कुरान और नमाज यां

और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियां

जो उनको ताड़ता है सो है वह भी आदमी।

...

चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी

और सुन के दौड़ता है सो है वह भी आदमी।

‘दुनिया बदले की जगह’ में नज़ीर कहते हैं:

जो और किसी का मन रक्खे तो उसको भी अरमान मिले

जो पान खिलावे पान मिले, जो रोटी दे तो नान मिले

नुकसान करे नुकसान मिले, अहसान करे अहसान मिले

जो जैसा जिसके साथ करे फिर वैसा उसको आन मिले।

कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ और अदल परस्ती है

इस हाथ करो उस हाथ मिले, यां सौदा दस्त ब दस्ती है।

यह तर्क दिया जा सकता है कि नज़ीर की नैतिक दृष्टि कुछ सरलीकृत है। हमें बाज वक्त ऐसी सरल नैतिकता चाहिए, क्योंकि जटिलता से हमारा बहुत भला हुआ नहीं लगता: न जिंदगी में, न कविता में।



भुवनेश्वर में

इस बार फिर भुवनेश्वर जाना हुआ एक समारोह के सिलसिले में।


ओड़िया की प्रसिद्ध पारिवारिक पत्रिका ‘कादम्बिनी’ के वार्षिक समारोह में कुछ लेखकों और पाठकों को सम्मानित करने के लिए। ओड़िया के साहित्यकार शांतनु आचार्य की अध्यक्षता में समारोह दो घंटे चला और सभागार में तरह-तरह के लोग थे। मेरे अलावा रंगकर्मी सौरभ शुक्ल और नृत्यांगना दोना गांगुली भी थे। मैंने यह कहना जरूरी समझा कि साहित्य हर समय और समाज में प्राय: सविनय अवज्ञा या सिविल नाफरमानी की भूमिका निभाता है। उसका एक जरूरी काम है यह बताना कि राजा के पास कपड़े नहीं हैं या कि उसकी छाती उतनी चौड़ी नहीं है, जिसका कि दावा है। यह निरा विरोध भर नहीं है: यह अंत:करण को हर हालत में सक्रिय रखना है। साहित्य गलत हो सकता है और उसमें नासमझी भी हो सकती है। पर फिर भी उसे अपना सच कहने का जोखिम अनिवार्यत: उठाना ही चाहिए। 

समारोह के पहले हम लोग सरसरी तौर पर एक शैक्षणिक परिसर देखने गए, जिसकी विशालता अप्रत्याशित थी। यह एक निजी विश्वविद्यालय है कलिंग इंस्टीट्यूट आॅफ इंडस्ट्रियल टेकनालजी। भारत की सबसे बढ़िया निजी संस्थाओं में गिनी जाती है। भारत सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग आदि द्वारा बहुमान्य है। इसे शुरू किया एक किराए के मकान में 1992-93 में कुल पांच हजार रुपए की पूंजी से एक विलक्षण विनयी व्यक्ति अच्युत सामंत ने, जिसके गरीब पिता की मृत्यु हो गई थी, जब वे सिर्फ चार वर्ष के थे। अपनी गरीबी और भयावह संघर्ष को याद करते हुए इस आदमी ने जो प्रयत्न किया वह एक अद्भुत और प्रेरक मिसाल है। इस विश्वविद्यालय के अलावा उन्होंने ‘केजी से पीजी’ तक आदिवासी बच्चों को शिक्षित करने के लिए कलिंग इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज नाम से एक और संस्था बनाई। हैरत की बात यह है कि इस संस्था में इस समय विभिन्न स्तरों पर शिक्षा प्राप्त करने वाले साढ़े बीस हजार आदिवासी बच्चे-बच्चियां हैं। उनके लिए भी एक विशाल परिसर है, जिसमें होस्टल आदि की व्यवस्था है। आदिवासियों के लिए भारत का तो निश्चय ही, बल्कि शायद संसार का यह सबसे बड़ा संस्थान है। यह दिलचस्प है कि अच्युत सामंत को इसको चलाने के लिए कोई विशेष सहायता नहीं मिलती है, हालांकि उसे देखने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष आदि आ चुके हैं। सारा खर्च तकनीकी विश्वविद्यालय की आय से चलता है। इतना बड़ा भोजन-कक्ष, जिसमें हजारों बच्चे एक साथ भोजन करते हैं, मैंने जिंदगी में पहली बार देखा। खाना बनाने का काम नई यांत्रिकी का उपयोग कर किया जाता है। अच्युत सामंत के पास कोई औपचारिक दफ्तर नहीं है और वे किसी पेड़ के नीचे बैठ कर काम निपटाते हैं। वे किराए के मकान में रहते हैं। वे ही अपनी बहिन इति सामंत द्वारा संपादित पत्रिका ‘कादम्बिनी’ का वित्तपोषण करते हैं। 

मुझे लगता है कि देने की कला के अद्भुत और बिरले कलाकार हैं रसायनशास्त्र पढ़े अच्युत। एक ऐसे समय और समाज में, जिसमें प्राय: सभी लेने, लूटने और बटोरने में लगे हैं, देने का ऐसा अविरल उदाहरण एक अलग राह दिखाता है। अच्युत को यश और प्रसिद्धि, मान्यता और प्रशंसा भरपूर मिली हैं। पर उनके बेहद सादे व्यक्तित्व में एक तरह की अचूक आध्यात्मिक आभा है। दूसरों को देकर उन्होंने अपना कद भी बढ़ाया है और दूसरों की अपार मदद की है। इस बार भुवनेश्वर जाना एक तीर्थयात्रा जैसा लगा: हम एक सच्चे बेदाग सब कुछ लुटाने वाले से मिले, जो हममें से ही एक है। 


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