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पुस्तकायन : रेणु की दुनिया PDF Print E-mail
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Sunday, 06 July 2014 09:48

राजकुमार 

जनसत्ता 06 जुलाई, 2014 : भारत यायावर की पहचान फणीश्वरनाथ रेणु के संपादक, आलोचक और पाठक के तौर पर बनी है। यों उन्होंने महावीरप्रसाद द्विवेदी की रचनाओं का भी संकलन-संपादन किया है, लेकिन उनका मन रेणु में ही ज्यादा रमा। वे कहते हैं कि मैं रेणु के देहावसान के बाद ‘रेणुमय’ होता चला गया। उन्होंने रेणु पर लिखी नई पुस्तक रेणु का है अंदाजे बयां और के साथ अपने मत को और ज्यादा दृढ़ किया है। इसमें वे रेणु की जिंदगी और रचनाओं के माध्यम से झांकने वाली आख्यानमूलक कहानियों और समालोचनाओं के साथ उपस्थित हैं। यही कारण है कि यह पुस्तक रेणु की जीवनी की पूर्वपीठिका लगती है।  

भारत यायावर ने रेणु की जिंदगी के आत्मकथ्यों, संस्मरणों, बयानों, पत्रों, जनश्रुतियों और रचनाओं से इतनी अंतरंगता बना ली है कि रेणु की मुकम्मल जीवनी लिखी जा सकती है। कहना न होगा कि यह पुस्तक रचना और आलोचना का एक साथ आस्वाद कराती है। इसमें एक तरफ रेणु की जिंदगी की कही-अनकही कहानियां मौजूद हैं, तो दूसरी तरफ पाठालोचन और अनुसंधानात्मक आलोचनाएं। संभवत: हिंदी में रेणु पर अकेली ऐसी मुकम्मल पुस्तक है, जो उनकी जिंदगी, राजनीतिक-सामाजिक कर्म के साथ-साथ साहित्यिक-सांस्कृतिक उपलब्धियों को भी समेटती है।         

रेणु के ‘मैला आंचल’ को न सिर्फ भारतीय भाषाओं के साहित्य में श्रेष्ठ उपन्यास का दर्जा हासिल है, बल्कि कई आलोचक तो विश्वस्तरीय उपन्यासों में शामिल करते हैं। ‘परती परिकथा’ और उनकी कई कहानियां भी बहुपठित और बहुप्रसंशित हैं। एक कवि के रूप में और रिपोर्ताज लेखक के रूप में रेणु की चर्चा लगभग नहीं के बराबर हुई है। भारत यायावर ने इन पर स्वतंत्र निबंध लिख कर इस कमी को पूरा किया है। 

हिंदी आलोचना रेणु के उपन्यासों और कहानियों से आगे नहीं बढ़ी। अव्वल तो रेणु के रिपोर्ताज न सिर्फ उल्लेखनीय, बल्कि कई मायनों में कहानियों और उपन्यासों की तरह ही उच्च कोटि के हैं। कई बार यह भी अनुभव होता है कि रेणु का श्रेष्ठ लेखन यही है, जिसकी झलक भारत यायावर भी देते हैं। वे लिखते हैं कि जितने श्रम और तन्मयता से उपन्यासों और कहानियों को रचा गया है, उतनी ही तन्मयता और श्रम से रिपोर्ताज भी। रेणु और उनके रिपोर्ताज एकाकार हैं। एक तरफ ‘रिपोर्ताजों में रेणु’ हैं, तो दूसरी तरफ ‘रेणु के रिपोर्ताज’ हैं। 

‘रिपोर्ताजों में रेणु’ में यायावर नोट करते हैं कि रेणु ग्रामीण मन के कथाकार हैं। उनका देखना किसान के नजरिए से होता था। उनकी सांस्कृतिक दृष्टि किसानी जिंदगी, तजरुबे, ग्रामीण समाज का प्रत्यक्ष अनुभव, गांव के ठेठ किसानों, उसकी बोलियों-बानियों से हासिल हुई थी। परिवेश का समग्र अनुभव उनकी जिंदगी से होकर गुजरता था। भाषा की शक्ति उसमें निहित संगीत और ध्वनियों के अनुभव, उनके बीच गुजारी रातों से हासिल हुई, जहां पूरी रात ‘विदापत नाच’, ‘विदेसिया’, ‘ननदी भउजिया’ और ‘जालिम सिंह सिपहिया’ जैसे संगीतात्मक लोकनाट्य खेले जाते थे। जब वे जीवन की विसंगतियों को उभारते थे या सामाजिक-राजनीतिक विद्रूपताओं को उद्घाटित करते थे तो स्वर विद्रूप हो जाते थे। व्यंग्य तीखा और गहरा होता था। ‘भूख से तड़प-तड़प कर मरते मनुष्यों का दर्शन करा कर रेणु ‘असली हिंदुस्तान’ का साक्षात्कार कराते हैं।’ 

ग्रामीण जीवन की सामाजिक-सांस्कृतिक छवियों की जितनी विविध, बहुरंगी, व्यापक छवियां रेणु के यहां मिलती हैं, अन्यत्र नहीं हैं, तो उसकी वजह उनका अपार जीवनानुभव है। उस समाज के साथ एंद्रिक जुड़ाव है। बेजुबानों, बेसहाराओं के प्रति करुणामय दृष्टि है। प्राकृतिक-मानवीय आपदाओं और त्रासदियों से घिरे समाज और जिंदगी को उठा कर उन्होंने उसे रिपोर्ताज बना दिया। लेकिन उसमें भी उन्होंने अद्भुत कल्पनाशीलता का परिचय दिया। रेणु के गद्य का हर टुकड़ा बेहद आत्मीय है। उसे वे सरस और संगीतमय बना कर प्रस्तुत करते हैं। यथार्थ को कोरा यथार्थ नहीं रहने देते, उसे प्रकृतवादी होने से भी बचाते हैं। रेणु ने रिपोर्ताजों में अपने जीवन के साथ-साथ घर, परिवार, परिवेश, साथी-संगी सबको उभारा है। ये चीजें उपन्यासों या कहानियों में नहीं उभरी हैं, इसलिए रिपोर्ताजों का अपना विशिष्ट महत्त्व है। 

रिपोर्ताजों पर लिखे लंबे निबंध में यायावर दर्ज करते हैं कि तीस वर्षों में फैले रेणु के रिपोर्ताजों में ‘रेणु के लेखन के विभिन्न मूड्स, जीवन स्थितियां, आस्था और लगाव पाठकों को दिखाई पड़ेंगे। इनमें वस्तु या कथ्य की जितनी विविधता है, उतनी ही भाषा शैली की


भी।’ वे लिखते हैं कि रेणु ने इन रिपोर्ताजों में एक साथ ही कई विधाओं का प्रयोग किया है। कहानी, रिपोर्ट, संस्मरण, डायरी, निबंध, यात्रा-संस्मरण आदि विधाओं को उसके अंदर समेट लिया है। यानी विधा के ढांचे की जकड़बंदी उन्हें स्वीकार नहीं थी। उसे प्रयोगधर्मी बनाते हैं। एक की सीमा के भीतर दूसरे को पिरोते हैं। उल्लेखनीय बात यह भी है कि इनमें आंचलिकता का अतिक्रमण करते हैं। 

रेणु का पूरा जीवन क्रांतिकारी रहा है, जिसकी चर्चा लगातार यायावर करते हैं। उनकी रचनाओं में आए प्रसंगों से जोड़ते हैं। उनके संघर्षों की कथाओं को बताते चलते हैं। अन्याय, भ्रष्टाचार, तानाशाही, सांप्रदायिकता के खिलाफ चलने वाली लड़ाइयों को जीवन और साहित्य से अविच्छिन्न करते हैं। कथ्य के उद्घाटन के साथ रिपोर्ताजों की संरचना और शिल्प की भी चर्चा करते हैं। उन्हें भाषा का खिलाड़ी मानते हुए लिखते हैं कि रेणु लोकभाषा की परंपरा को सामने रखते हैं। वे पाठकों को बाध्य करते हैं कि अर्द्ध-तत्सम शब्दों के अनुमानों का खेल खेलें। वे मानवेतर ध्वनियों से भी भाषा को समृद्ध करते हैं। उच्चारणों की दीर्घता या नकल बिल्कुल वैसी है जैसा कि पात्र हैं। पात्रों की बहुलता और उसके स्वर भी रेणु के शिल्प के वैभव हैं। 

रेणु की कविताओं के अध्ययन में यायावर चूके हैं। बहुत ही साधारण तरीके से विश्लेषण हुआ है। जिस तरह उनका मन रिपोर्ताजों में रमा है, कविताओं में नहीं। वे रेणु का साम्य नागार्जुन से बिठाते हैं। दोनों में व्यवस्था के प्रति व्यंग्य है। इमरजेंसी का तीखा विरोध वैसे ही है जैसे नागार्जुन में। रेणु की कविताओं में फैले साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, सांप्रदायिकता के विरोध की पड़ताल की गई है। 

रेणु की कहानियों के अध्ययन में वे पाते हैं कि उन्होंने अपनी पार्टी और विचारधारा के प्रति लगाव और दृष्टिकोण को स्पष्ट कर दिया है। उनके भावबोध को राजनीति के तंतुओं के गुंजलक संचालित करते हैं। कई बार राजनीति ‘आब्सेशन’ के रूप में है, तो कभी दुस्वप्न के रूप में। राजनीतिक मूल्यों के क्षरण के ही परिदृश्य फैले पड़े हैं। नए रस से संचारित कहानियों के विश्लेषण की बारीक बुनावट की चर्चा भी करते हैं और गांव-इलाके के ‘संवदिया’ बन जाने की भी। संवदिया इस रूप में कि वे आसपास के गांवों, किसानों, मजदूरों की भूख और गरीबी की कहानियां कहते हैं। रंग और उल्लास भी रचते हैं। उसके मेले ठेले भी ले आते हैं तो रससिक्त प्रेम भी। 

यायावर ‘मैला आंचल’ और ‘परती परिकथा’ जैसे उपन्यासों को छोड़ उन रचनाओं पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, जिनकी चर्चा बहुत कम हुई है। वैसे तो वे स्वीकार करते हैं कि रेणु अपने को दोहराने से बचने के लिए अलग-अलग तरह की रचनाएं करते हैं। कथावस्तु बदलते हैं, लेकिन ‘पल्टूबाबू रोड’, ‘कलंकमुक्ति’, ‘कितने चौराहे’ की तुलना में रेणु का मन ‘जुलूस’ में रमता है। भारत विभाजन संबंधित उपन्यासों में ‘जुलूस’ इकलौता उपन्यास है, जो बंगाली शरणार्थियों पर केंद्रित है। कलंकमुक्ति में स्त्री समस्याओं के क्रूरतम अंतर्विरोधों की अभिव्यक्ति हुई है। वे इन उपन्यासों के पात्रों का अध्ययन भी करते हैं। 

यायावर रेणु की रचनाओं में राष्ट्रवाद की उपस्थिति की चर्चा करते हैं, लेकिन इस बात को नहीं पढ़ पाते कि रेणु का ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ सत्ता और राजनीति के गलियारे में बन रहे राष्ट्रवाद का प्रतिलोम है। इसके बावजूद रेणु के पाठकों के लिए यह बेहद जरूरी पुस्तक है। 

रेणु का है अंदाजे बयां और: भारत यायावर; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 300 रुपए। 


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