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गंगा को बचाने के अनिवार्य कदम PDF Print E-mail
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Saturday, 05 July 2014 11:45

अभय मिश्र

 जनसत्ता 05 जुलाई, 2014 : गंगा समग्र यात्रा के दौरान कानपुर में उमा भारती ने कहा था कि

उनकी पार्टी की सरकार बनने पर दो काम उनकी प्राथमिकता में होंगे। एक यह कि कानपुर के गंगा-जल को आचमन के योग्य बनाएंगे। और दूसरा, गौ हत्या पर काफी सख्त कानून बनाया जाएगा। लेकिन यहां हम बात केवल गंगा की कर रहे हैं। गंगा को लेकर बड़े-बड़े वादे करने वाले अब सत्ता में हैं।


कानपुर से ही बात शुरू करते हैं। इन पंक्तियों के लेखक का दावा है कि कानपुर में गंगा-जल है ही नहीं। तो फिर आचमन-योग्य किस चीज को बनाया जाएगा? कानपुर गंगा पथ का ऐसा अभागा शहर है जहां नाव पतवार से नहीं, बांस से चलती है। यहां की गंगा में तो टीबी अस्पताल के नाले जैसे कई नालों की गाद और टिनरीज का लाल-काला पानी है, जिसमें बांस गड़ा-गड़ा कर नाव को आगे बढ़ाया जाता है। हरिद्वार में आधे से ज्यादा गंगा-जल दिल्ली को पीने के लिए हर की पैड़ी में डाल दिया जाता है। इसके बाद बिजनौर में मध्य गंगा नहर से भारी मात्रा में पानी सिंचाई के लिए ले लिया जाता है। बचा-खुचा पानी नरौरा लोअर गंग नहर में डाल कर उत्तर प्रदेश के हरित प्रदेश में पहुंचा दिया जाता है। 

वास्तव में गंगा नरौरा में आकर ही खत्म हो जाती है। अदालत की लगातार फटकार और लोगों के दबाव में नरौरा के बाद बहुत थोड़ा-सा पानी आगे बढ़ता है। नरौरा, जहां नहर नदी की तरह दिखाई देती है और नदी नहर की तरह। नाममात्र के इस गंगा-जल को कानपुर पहुंचने से ठीक पहले बैराज बना कर शहर को पानी पिलाने के लिए रोक लिया जाता है। चूंकि शहर में पानी की किल्लत रहती है इसलिए यहां से एक बूंद पानी भी आगे नहीं बढ़ पाता। इसके बाद इलाहाबाद के संगम में और बनारस की आस्था के स्नान में गंगा-जल को छोड़ कर सबकुछ होता है। वास्तव में आस्थावान लोग जिसमें गंगा समझ कर डुबकी लगाते हैं वह मध्यप्रदेश की नदियों- चंबल और बेतवा- का पानी होता है, जो यमुना में मिलकर गंगा को आगे बढ़ता है। तो अगर नई सरकार का मन कानपुर में आचमन करने का है तो गंगा को वहां पहुंचाना होगा और उसके लिए बड़ी इच्छाशक्ति की जरूरत है। 

नई सरकार आने के बाद से गंगा को लेकर नदी विकास की बातें प्रमुखता से कही गई हैं। तट विकसित होंगे, पार्किंग बनेंगी, घाट बनेंगे, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लाइट ऐंड साउंड कार्यक्रम होगा, परिवहन होगा, गाद हटाई जाएगी, मछली पालन भी होगा। लेकिन इस सब में मूल तत्त्व गायब है, गंगा में पानी कहां से आएगा इस पर कोई बात नहीं हो रही। जहाजरानी मंत्रालय की ओर से ग्यारह बैराज बनाने का विचार सामने आया है। इसकी सार्थकता पर सरकार के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। तो फिर किया क्या जाए?  

पहले कदम के रूप में निजी और उद्योगों के नालों को बंद करने का कदम उठाना चाहिए, ये नाले सरकारी नालों की अपेक्षा काफी छोटे होते हैं लेकिन पूरे गंगा पथ पर इनकी संख्या हजारों में है। रही बात बड़े और सरकारी नालों की, तो उन्हें बंद करने का वादा नहीं नीयत होनी चाहिए। वास्तव में उत्तरकाशी, हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस और गाजीपुर जैसे शहरों की सीवेज व्यवस्था ही ऐसे डिजाइन की गई है, जिसमें गंगा मुख्य सीवेज लाइन का काम करती है। अब इन शहरों में पूरी सीवेज व्यवस्था को नए सिरे से खड़ा करना होगा ताकि गंगा इससे अछूती रहे। नए सीवेज सिस्टम के लिए बनारस भविष्य में एक मॉडल का काम कर सकता है।  

वाराणसी को तीन पाइपलाइन मिलनी थी, पीने के पानी के अलावा वर्षाजल निकासी और सीवेज की पाइपलाइन डाली जानी थी। शहर खोदा गया, सीवेज के पाइप डाले गए, लेकिन सीवेज संयंत्र के लिए जरूरी जमीन का अधिग्रहण नहीं हो सका। 

वाराणसी में हर रोज पैदा होने वाले चालीस करोड़ लीटर एमएलडी सीवेज में से मात्र सौ एमएलडी साफ हो पाता है, बाकी सारा गंगा को भेंट हो जाता है। सरकार के लिए वाराणसी की गलियों की ऐतिहासिकता बचा कर रखते हुए इस काम को कर पाना बड़ी चुनौती है। 

दूसरा बेहद जरूरी कदम यह है कि कानपुर के चमड़ा-कारखानों को तुरंत वैकल्पिक जगह उपलब्ध कराई जाए। अदालत ने भी कई बार इन कारखानों को हटाने का आदेश दिया है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति न होने के चलते यह अब तक संभव नहीं हो सका। अकेले उत्तर प्रदेश में 442 बड़े और मंझोले चमड़ा कारखाने हैं। जब सरकार चीन को बिजनेस पार्क के लिए जगह दे सकती है तो इन कारखानों को क्यों नहीं?

तीसरा कदम है रिवर पुलिसिंग का। हर दो किलोमीटर पर एक गंगा चौकी हो, जहां जल-पुलिस की तैनाती हो, जिसमें स्थानीय मछुआरों को रोजगार दिया जाए। रिवर पुलिस लोगों को गंगा में कचरा डालने से रोकेगी। अर्थदंड लगाने जैसे अधिकार भ्रष्टाचार को बढ़ावा देंगे, इसलिए रिवर पुलिस की भूमिका जागरूकता फैलाने और स्थानीय प्रशासन के बीच सेतु बनाने की होनी चाहिए। 

गंगा संरक्षण की दिशा में चौथा उपाय मोटर से चलने वाली छोटी नाव पर रोक के रूप में होना चाहिए। रोजगार के नाम पर लाखों की संख्या में डीजल आधारित मोटरबोट गंगा में चलती हैं। नावों में लगाई जाने वाली ये सेकेंडहैंड मोटरें बड़ी संख्या में बांग्लादेश से तस्करी कर लाई जाती हैं। अत्यधिक पुरानी होने के चलते इनसे काला धुआं और तेल की परत निकलती है, जिसमें मछलियां और उनके अंडे जीवित नहीं रह पाते। इन नावों में डीजल की जगह केरोसिन का उपयोग होता है। एक तर्क यह दिया जाता है कि जब छोटे जहाज और स्टीमर गंगा में चल सकते हैं तो इन गरीबों की नाव रोकने की क्या तुक है। पर गंगा में स्टीमर और फेरी मुख्यत: बिहार और बंगाल में ही चलते हैं जहां गंगा में पानी की समस्या नहीं है। बनारस तक के क्षेत्र में, जहां गंगा अस्तित्व के लिए ही जूझ रही है, वहां


यह बंद होना चाहिए। वहां गैस से चलने वाले स्टीमर की इजाजत दी जा सकती है।  

पांचवां और बेहद महत्त्वपूर्ण विषय है आस्था को ठेस पहुंचाए बिना पूजन सामग्री के निपटान का। गंगा पथ पर बसे घरों की समस्या यह है कि वे पूजा के फूलों और पूजन सामग्री का क्या करें। मजबूरी में लोग उसे नदी में डालते हैं, क्योंकि कहीं और फेंकने से आस्था को ठेस पहुंचती है। एक उपाय यह है कि हर रोज नगर निगम इस पूजन सामग्री को लोगों के घरों से इकट्ठा करें। इस काम के लिए कूड़ा उठाने वाली गाड़ियों का उपयोग न किया जाए। इस इकट्ठा की गई पूजन सामग्री का उपयोग खाद बनाने में हो सकता है। मूर्ति विसर्जन पर पूर्णत: रोक छठा कदम है, जिसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए। सातवां निर्णय तुरंत लागू किया जा सकता है, कि मौजूदा सीवेज शोधन संयंत्र अपनी पूर्ण क्षमता से काम करें। अभी तो आधे से भी कम संयंत्र चालू हालत में हैं, ये भी अपने दावे के अनुरूप नहीं चलते। सिर्फ उत्तर प्रदेश में पैंतालीस बड़े नाले गंगा में गिरते हैं, छोटे नालों की तो गिनती ही नहीं है। अकेले बनारस में तीस छोटे-बड़े नाले गंगा में मिलते हैं। बिजली की भारी कमी के चलते भी सीवेज प्लांट नहीं चलते। 

यह हालत खासकर उत्तर प्रदेश में है जहां इन संयंत्रों का चालू रहना बेहद जरूरी है। साथ ही यह पक्का किया जाए कि भविष्य में कोई नया प्लांट नहीं लगाया जाएगा। हमारे देश की स्थिति लंदन से अलग है। हमारे यहां सीवेज जमीन के भीतर नहीं इकट्ठा होता जिसे शोधित कर उपयोग में लाया जा सके। हमारे यहां तो बहते हुए नालों को ही सीवेज ट्रीटमेंट सेंटर बनाने की जरूरत है और उस शोधित पानी को भी गंगा में या सिंचाई में उपयोग में न लाया जाए। एक बानगी देखिए। वाराणसी के पास सारनाथ से सटे कोटवा गांव में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाया गया। पहले पहल शहर के गंदे नाले का पानी खेतों में डाला गया तो लगा दूसरी हरित क्रांति हो गई। फसल चार से दस गुना तक बढ़ी। 

मगर अब स्थानीय लोग खुद इन खेतों की सब्जियों को हाथ नहीं लगाते, क्योंकि वे देखने में तो चटक हरी, बड़ी और सुंदर होती हैं मगर उनमें कोई स्वाद नहीं होता, और कुछ ही घंटों में कीड़े पड़ जाते हैं। यही हाल अनाज का भी है, सुबह की रोटी शाम को खाइए तो बदबू आएगी। कई सालों तक उपयोग करने के बाद बीएचयू के एक अध्ययन में यह सामने आया कि शोधित पानी सोने की शक्ल में जहर है। इन साग-सब्जियों में कैडमियम, निकिल, क्रोमियम जैसी भारी धातुएं पाई जाती हैं।

लोकलुभावन घोषणाओं और गंभीर पहल के बीच का फर्क समझते हुए उमा भारती को अगले कदम के रूप में हरिद्वार और ऋषिकेश के आश्रमों को नोटिस देना चाहिए कि वे एक समय-सीमा के भीतर अपने सीवेज का वैकल्पिक इंतजाम कर लें। इनके भक्तों पर गंगा को निर्मल बनाने और निर्मल रखने की इनकी अपील का असर तब पड़ेगा, जब ये खुद इस पर अमल करेंगे। अब तक तो गंगा आंदोलन में शामिल सभी आश्रमों के मुंह से निर्मल गंगा की बात ऐसे ही लगती है जैसे हम पेड़ काटते हैं, उसका कागज बनाते हैं और फिर उस पर लिखते हैं ‘वृक्ष बचाओ’। 

अविरल गंगा के रास्ते की बाधा हटाने का नौवां कदम होना चाहिए हर बैराज के ठीक पहले डिसिल्टिंग का। गंगा पर बने हर बैराज के पहले कई किलोमीटर तक भारी गाद जमा हो गई है; फरक्का बैराज के पहले जमा गाद ने गंगा की सहायक नदियों पर भी काफी प्रतिकूल प्रभाव डाला है। साथ ही गंगा में रेत खनन पर जारी रोक को तुरंत हटाना चाहिए। रेत खनन न होने से कई जगह नदी का स्तर उठ गया है, जो आने वाले मानसून में बाढ़ का सबब हो सकता है। रेत खनन विशेषज्ञ की देखरेख में किया जाए, क्योंकि गाद हटाने के नाम पर रेत माफिया कब से गंगा पर नजर गड़ाए हुए हैं। वास्तव में यह रेत खनन नहीं रेत चुगान होना चाहिए। बालू के क्षेत्र को नियंत्रित किया जाना जरूरी है। 

दसवां और सबसे महत्त्वपूर्ण काम। गंगा में गंदगी डालने को कार्बन क्रेडिट जैसा मामला नहीं बनाना चाहिए। किसी भी उद्योग पर गंदगी डालने पर जुर्माना न लगाया जाए, हर हाल में यह पक्का करना चाहिए कि गंदगी न डाली जाए, जुर्माने वाली व्यवस्था से सिर्फ भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। कई बड़े उद्योगों का गणित यह है कि जुर्माना देना सरल है, वैकल्पिक व्यवस्था करना महंगा है। इसलिए वे जुर्माने को मलबा निपटान की अपनी लागत में जोड़ कर चलते हैं।

 एक प्यारी छोटी-सी मछली होती है हिल्सा। फरक्का बनने से पहले वह गंगा में ही पाई जाती थी। खारे पानी की यह मछली अंडे देने मीठे पानी में उत्तराखंड तक आती थी। कानपुर का जल आचमन के लायक हुआ या नहीं, इस पर वैज्ञानिक बहस करते रहेंगे। पर जिस दिन कानपुर में हिल्सा नजर आई, समझें वह नई मंत्री का इस्तकबाल करने आई है। क्या नए शासन में इतनी इच्छाशक्ति है?


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