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कुनबापरस्ती का कारवां PDF Print E-mail
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Friday, 04 July 2014 11:31

धर्मेंद्रपाल सिंह

 जनसत्ता 04 जुलाई, 2014 : केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद राष्ट्रपति के अभिभाषण पर कैबिनेट मंत्री रामविलास पासवान

लोकसभा में जब धन्यवाद प्रस्ताव का अनुमोदन कर रहे थे तब विपक्षी दलों की बेंच से किसी सांसद ने उनके पुत्र चिराग का नाम उछाला तो वे भड़क गए। अपने पुत्र के बचाव में पासवान ने एक सांस में विपक्षी दलों के राजनीतिक परिवार से आए सांसदों के नाम गिना डाले। परिवारवाद पर तंज कसने वालों को आईना दिखा दिया। पासवान लोक जनशक्ति पार्टी के मुखिया हैं, जो राजग का एक घटक है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की लहर में इस बार उनके छह सांसद जीते हैं, जिनमें उनका बेटा चिराग भी है। पासवान ऐसे अकेले नेता नहीं हैं, जिनकी पार्टी में परिवार के सांसदों और विधायकों की भरमार है। भारतीय राजनीति के मौजूदा अधिकतर दल परिवारवाद के मोह में जकड़े हैं। कभी कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार पर कुनबापरस्ती का आरोप लगाने वाले दल और उनके नेता भी इस ‘धृतराष्ट्र ग्रंथि’ के शिकार हैं। 


सोलहवीं लोकसभा के निर्वाचित सांसदों की पृष्ठभूमि खंगालने पर परिवार मोह में जकड़ी पार्टियों की स्थिति स्पष्ट हो जाती है। इस बार संसद के निचले सदन के पांच सौ तिरालीस में से कम से कम एक सौ तीस सांसद ऐसे हैं, जिनका रिश्ता किसी न किसी राजनीतिक परिवार से है। मतलब यह कि मौजूदा लोकसभा के लगभग एक चौथाई सांसद सियासी कुनबापरस्ती के झंडाबरदार हैं। यों भी कहा जा सकता है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश राजशाही की पिट चुकी परंपरा पर लौट रहा है। यह संकेत इसलिए और भी चिंताजनक है कि अधिकतर पार्टियां और नेता इस परिवार मोह में जकड़े हैं। 

इस एक सौ तीस की संख्या की गहराई में जाएं तो पता चलता है कि गए जमाने के राजवंशों की तर्ज पर हमारे नेता भी प्रथम वरीयता अपने बेटों को देते हैं। माता-पिता की कृपा से चुने गए नए सांसदों में आधे से अधिक (उनहत्तर) बेटे हैं, जबकि बेटियां केवल ग्यारह हैं। दस सांसदों और विधायकों की धर्मपत्नी लोकसभा की शोभा बढ़ाने के लिए चुनी गई हैं। अन्य दस के भाई जीतने में कामयाब रहे हैं। परिवार की पैरवी पर चुने गए शेष सांसद बड़े नेताओं के निकटवर्ती रिश्तेदार (चाचा, ताऊ, चचेरे भाई-बहन, बहू आदि) हैं। राजनीति में अपने खानदान को बढ़ावा देने के मामले में उत्तर प्रदेश अव्वल है। उसके तेईस सांसद राजनीतिक परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। संख्या की दृष्टि से दूसरा स्थान अविभाजित आंध्र प्रदेश का है, जहां के अठारह सांसद सियासी खानदानों के चश्मेचिराग हैं। 

आयु वर्ग की दृष्टि से इन आंकड़ों का विश्लेषण करने पर तो और भी खतरनाक संकेत मिलते हैं। तीस साल से कम उम्र के पचहत्तर प्रतिशत सांसद किसी न किसी प्रतिष्ठित नेता के बेटा-बेटी हैं। तीस से चालीस साल के युवा सांसदों में से आधे राजनीतिक परिवार से आए हैं। इस बार लोकसभा में सर्वाधिक महिला सांसदों (इकसठ) के प्रवेश पर जश्न मनाने वाली बिरादरी को यह जान कर झटका लगेगा कि इकतालीस प्रतिशत (पचीस सांसद) महिलाएं अपने बल पर नहीं, परिवार की कृपा से देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंची हैं। यह देखने के बाद कहा जा सकता है कि राजनीतिक दलों के आम कार्यकर्ताओं के लिए मेहनत, लगन, निष्ठा और प्रतिभा के बल पर टिकट पाना, चुनाव लड़ना और जीतना निरंतर कठिन होता जा रहा है। 

आजादी के बाद से अब तक संसद और विधानसभाओं पर चुनिंदा सियासी कुनबों के कसते शिकंजे का कोई विस्तृत अध्ययन नहीं हुआ है। हां, ब्रिटिश लेखक पैट्रिक फ्रैंच ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया: ए पोट्रेट’ में पिछली लोकसभा का विश्लेषण जरूर किया है। उन्होंने पाया कि पंद्रहवीं लोकसभा के तीस वर्ष से कम उम्र के सभी सांसद किसी न किसी राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते थे। तीस से चालीस वर्ष आयु वर्ग के दो-तिहाई सांसद भी ऐसे ही परिवारों की देन थे। 

सन 2009 के आम चुनाव में निर्वाचित डेढ़ सौ सांसदों की सफलता के पीछे उनके खानदानों का हाथ था। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च जैसी संस्थाएं चुनाव आयोग से संसद और विधानसभा में विजयी होकर आए जन-प्रतिनिधियों की आयु, शैक्षिक योग्यता, संपत्ति और आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़े आंकड़े जुटाकर जनता को जानकारी देती हैं। लेकिन सांसदों और विधायकों की पारिवारिक पृष्ठभूमि का लेखा-जोखा उनके पास भी नहीं है। अच्छा हो नियमित जानकारी जुटा कर ये संस्थाएं  भारतीय राजनीति की इस बीमारी को भी उजागर करें। 

कड़वा सच यह है कि जो राजनीतिक परिवार आज सत्ता के शीर्ष पर हैं उन्हीं के पास पैसा है और वही टिकट बांटने और चुनाव लड़ाने का काम करते हैं। इस एकाधिकार से पार्टी कार्यकर्ता हताश हैं। राजनीति में जन-भागीदारी घटती जा रही है। अक्सर सत्ता की अदला-बदली कुछ परिवारों और चुनिंदा नेताओं के बीच ही होती है। 

जनता का काम तो सिर्फ वोट देना रह गया है। मौजूदा व्यवस्था में साधारण पार्टी कार्यकर्ता चुनाव लड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता। पैसे और ताकत के बल पर ऐसा चक्रव्यूह रच दिया गया है, जिसमें प्रवेश का दुस्साहस करने वाला व्यक्ति अक्सर खेत हो जाता है।

भारतीय राजनीति में परिवारवाद की विषबेल बोने का पाप कांग्रेस ने किया है। आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने और इसके साथ ही पार्टी में परिवारवाद के बीज पड़ गए। अपने कार्यकाल के दौरान ही उन्होंने बेटी इंदिरा गांधी को पार्टी अध्यक्ष बना दिया था। नेहरूजी की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने और उनकी अकाल मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी ने कुर्सी संभाली। 

इंदिरा गांधी ने सुनियोजित तरीके


से पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का गला घोंटा। धीरे-धीरे कांग्रेस के कद्दावर नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और पूरी पार्टी पर नेहरू-गांधी परिवार का शिकंजा कस गया। इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी और फिर सोनिया और राहुल पार्टी के सर्वेसर्वा बन गए। कांग्रेस की देखा-देखी अब अन्य दलों में भी परिवारवाद की बीमारी फैल चुकी है। अब तो भारतीय लोकतंत्र कुछ परिवारों की मुट्ठी में कैद है। राजशाही की तरह कुर्सी का हस्तातंरण कुनबे के लोगों को होता है। 

देश में फैले राजनीतिक परिवारों की फेहरिस्त पर नजर डालें तो पता चलता है कि उनकी जड़ें कितनी गहरी हैं। कांग्रेस पर नेहरू-गांधी परिवार की पांचवीं पीढ़ी (मोतीलाल नेहरू से राहुल गांधी तक) राज कर रही है। आज अधिकतर क्षेत्रीय दल भी कांग्रेस के पदचिह्नों पर चल रहे हैं। निश्चय ही चौधरी चरण सिंह, मुलायम सिंह यादव, शरद पवार, प्रकाश सिंह बादल, चौधरी देवीलाल, शेख अब्दुल्ला, बाल ठाकरे, बीजू पटनायक, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, भजनलाल, बंसीलाल, करुणानिधि, एचडी देवगौड़ा, राजशेखर रेड्डी, एनटीआर जैसे नेताओं ने कड़ी मेहनत और प्रतिभा के बल पर पहले जनता के बीच स्थान बनाया और फिर अपने बूते पार्टी खड़ी की और चुनाव जीते। लेकिन सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बाद वे मानो अपने कार्यकर्ताओं की कुर्बानी भूल गए। योग्यता को तरजीह देने के बजाय परिवार को प्राथमिकता देने लगे। अंधे आदमी की तरह उन्होंने रेवड़ी बार-बार अपने खानदान के लोगों को बांटी। 

एक उदाहरण से इस घातक प्रवृत्ति को बेहतर समझा जा सकता है। इस बार समाजवादी पार्टी के पांच सांसद चुने गए हैं और सब मुलायम सिंह यादव के परिवार से हैं। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि उनके बेटे अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। मतलब यह कि पूरी पार्टी एक खानदान की मुट्ठी में सिमट गई है। 

यह स्थिति उन पार्टियों की है, जिनका परिवार प्रेम जगजाहिर है। लेकिन ऐसे नेताओं की भी भरमार है, जो किसी पार्टी के सर्वेसर्वा तो नहीं हैं, लेकिन वरिष्ठता और शीर्ष नेतृत्व से नजदीकी के आधार पर अपने बेटे-बेटी, भाई-भतीजे, पत्नी-बहू को टिकट दिलाने की हैसियत रखते हैं। 

कैडर आधारित भारतीय जनता पार्टी में भी ऐसे नेताओं की भरमार है। वहां भी दूसरी-तीसरी पीढ़ी के सांसदों और विधायकों की संख्या अच्छी-खासी है। 

राजनीति में परिवारवाद का विरोध होने पर नेता अक्सर लचर तर्क देते हैं। उनके अनुसार जब किसी वकील का बेटा वकील, डॉक्ट२र का बेटा डॉक्टर और फिल्म स्टार का बेटा फिल्म स्टार बन सकता है, तब नेता का बेटा राजनीति में क्यों नहीं आ सकता? यह बात कहते समय वे भूल जाते हैं कि राजनीति कोई पेशा नहीं, जन-सेवा का सशक्त माध्यम है। इसी कारण किसी जन-प्रतिनिधि की तुलना किसी डॉक्टर, वकील या फिल्म स्टार से नहीं की जा सकती। नेताओं का दूसरा तर्क यह होता है कि वे अपने परिवार के सदस्य को टिकट तो दे सकते हैं, जिता नहीं सकते। 

चुनाव तो जन-समर्थन से जीता जाता है। यह बात भी आधा सच है। चुनाव जीतने के लिए पहले टिकट मिलना और फिर पैसे और साधन जुटाना जरूरी होता है। टिकट देने का अधिकार और पैसे और साधन जुटाने की कला बड़े नेताओं के पास है। ऐसे में उनका यह तर्क कैसे मंजूर किया जा सकता है?

देश में आर्थिक विकास तेज होने के बाद चुनाव में हार-जीत का दाव बहुत ऊंचा हो गया है। इस कारण भी परिवारवाद तेजी से पनपा है। अब जीत के लिए पार्टियां हर हथकंडा आजमाती हैं। चुनाव प्रचार पर अरबों रुपए फंूके जाते हैं। 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव पर कुल पचहत्तर लाख रुपए का खर्चा आया था, जबकि इस चुनाव में पचार हजार करोड़ रुपए व्यय होने का अनुमान है। अब प्रत्येक प्रत्याशी को कानूनन सत्तर लाख रुपए तक व्यय करने की इजाजत है। पैसे, परिवारवाद और बाहुबल का बढ़ता प्रभाव हमारे लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है। 

संसद और विधानसभाओं में दागी, करोड़पति और मुट्ठी भर परिवारों के जन-प्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में इजाफे की रफ्तार आसमान छूने लगती है। आज राजनीति कमाई का सबसे अच्छा जरिया बन गई है। इसीलिए हर बड़ा नेता अपने परिवार के सदस्यों को राजनीति में उतारने का इच्छुक रहता है। चुनाव लड़ने वाले नेताओं की संपत्ति में पांच वर्ष में औसत 134 प्रतिशत वृद्धि बड़े-बड़े उद्योगपतियों को चौंकाती है। कुछ मामलों में तो संपत्ति में वृद्धि की दर एक हजार प्रतिशत से ज्यादा देखी गई है। इसीलिए अब समृद्ध व्यापारी और उद्योगपति भी संसद में प्रवेश पाने के लिए हाथ-पैर मारते हैं। 

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि किसी समाज का पतन अपराधियों की कारगुजारी नहीं, अच्छे लोगों की निष्क्रियता से होता है। हमारा लोकतंत्र भी जनता की निष्क्रियता के कारण संकट में है। चुनावी व्यवस्था को परिवारवाद की काली परछार्इं से बाहर निकालने की पहल जनता को ही करनी होगी। 


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