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मौत के ठिकाने PDF Print E-mail
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Friday, 04 July 2014 11:26

मधु कांकरिया

जनसत्ता 04 जुलाई, 2014 : अगर इस गरमी की सुलगती दोपहरी में किसी से कहा जाए कि दौड़ो, जितना तेज दौड़ सकते हो! दौड़ो, इस दौड़ से ही मिलेगी तुम्हें पुलिस में हवलदार की नौकरी, तो एक बेरोजगार युवक क्या देखेगा? आसमान से बरसती आग या पेट में धधकती आग? उनके पेट की धधकती आग आसमानी आग पर भारी पड़ी, इसलिए वे दौड़ पड़े। पैरों में चप्पल, पेट में दाना नहीं, लेकिन वे दौड़ पड़े कि पांच किलोमीटर की यही दौड़ उन्हें रोटी, चप्पल, छाया देगी। यह अवसर वे हाथ से कैसे खिसकने देते! पुलिस के आला अधिकारियों ने छांव में बैठ कर सीटी बजाई और आग बरसाते सूरज के सामने युवकों को भेड़-बकरी की तरह दौड़ा दिया। वे दौड़े, अपनी पूरी ताकत के साथ कि इसी में उनकी ‘मुक्ति’ थी! लेकिन शरीर की अपनी सीमाएं हैं। किसी को ‘डि-हाइड्रेशन’ हो गया, किसी के पांवों की मांसपेशियां खिंच गर्इं, किसी को लू लग गई। मुंबई पुलिस में भर्ती की प्रक्रिया के दौरान कम से कम पांच की जान चली गई और डेढ़ दर्जन से ज्यादा गंभीर रूप से बीमार हो गए।

मालेगांव के तेईस वर्षीय अंबादास सोनवने आॅटो रिक्शा ड्राइवर थे। कड़ी धूप में दौड़ पड़े लक्ष्य की तरफ और महज सौ मीटर दूर थे कि सांसों की डोर टूट गई। गहीनाथ लाटपोते और उन्नीस साल के प्रसाद माली का भी आखिर यही हश्र हुआ। घावों पर नमक छिड़कते हुए पुलिस भर्ती समिति के अधिकारी ने कहा- ‘उम्मीदवारों ने ताकत बढ़ाने के लिए ‘बूस्टर्स’ और ‘स्टेरॉयड’ का सेवन कर लिया था, इसलिए ऐसा हुआ। अब कोई पूछे उनसे कि जिसके पास पहनने को जूते नहीं, जो सिर्फ चाय और बड़ा पाव पर गुजारा कर रहा हो वह शक्तिवर्धक दवाओं के लिए पैसे कहां से लाएगा!

सवाल है कि मुंबई में जून के महीने में मानसून के पहले जहां पैदल चलने भर से आदमी पसीने से नहा उठता है, पुलिस भर्ती की यह दौड़ क्यों आयोजित की गई। क्या यह दौड़ सुबह-सुबह नहीं आयोजित की जा सकती थी? संवेदनहीन तंत्र और नाकारा अफसरों की नींद तब उड़ी, जब नाहक कई मौतें हो गर्इं। अब दोपहर ग्यारह से चार बजे तक दौड़ प्रतिबंधित है। सवाल यह भी है कि दौड़ के वक्त जरूरी सावधानियां क्यों नहीं बरती गर्इं। मसलन, दौड़ने वालों के लिए रास्ते में एम्बुलेंस, ग्लूकोज, पानी आदि की व्यवस्था। क्या ऐसा इसलिए नहीं किया गया कि वहां दौड़ने वालों में देश का मलाईदार तबका नहीं था और इसमें भाग लेने वाले समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोग थे? उनसे नियुक्ति के समय यह लिखित ले लिया गया था कि दौड़ के वक्त होने वाली किसी भी दुर्घटना के लिए प्रशासन जिम्मेदार नहीं होगा।

खैर, इन युवाओं की मौत पर कहीं क्षोभ देखने में नहीं आया। कॉरपोरेट क्षेत्र के मित्र इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पलक झपकने


भर के लिए दिखाई यह खबर। दरअसल, इसी दौरान प्रीति जिंटा ने नेस वाडिया पर छेड़खानी और हाथ मरोड़ने का आरोप लगाया था। सारा मीडिया इसी से संबंधित खबरें दिखाने में लगा था। पांच घरों के चिराग अफसरों की अमानवीयता के चलते बुझ गए और मुंबई शहर में विरोध की हल्की-सी सुगबुगाहट तक नहीं हुई। शायद यही कारण है कि इस देश के प्रशासन और तंत्र के अंदर से जनता का डर निकल गया है। इसीलिए इस देश में एक सामान्य आदमी के साथ कभी भी, कहीं भी कुछ हो सकता है।

इसी तरह, पिछले दिनों हिमाचल में घूमने-फिरने गए बाईस होनहार नौजवान मौत के मुंह में चले गए, सिर्फ प्रशासन की लापरवाही की वजह से। बिना किसी पूर्व सूचना के बांध का पानी छोड़ दिया गया और हंसते-खिलखिलाते युवकों की जल-समाधि बन गई। हर साल वर्षा में खुले मैनहोल में गिरने से जाने कितने बच्चों और खुद उनमें घुस कर सीवर की सफाई करने वाले लोगों की जान चली जाती है। सच्चाई यह है कि इस देश में जितने लोग युद्ध में मारे जाते हैं, उससे ज्यादा लोग अधिकारियों की लापरवाही के चलते अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं।

दुनिया के इतिहास में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं, जहां एक आदमी की जान बचाने के लिए पूरे देश ने अपनी ताकत झोंक दी। अमेरिका में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान रेयन नामक एक सैनिक की जान बचाने के लिए सेना की एक पूरी बटालियन लग गई थी, क्योंकि उसके दो भाई पहले ही उसी युद्ध में शहीद हो चुके थे। जैसे ही यह खबर सेना के कमांडर को लगी, उसने निर्देश दिया कि उस महान मां को और कोई सदमा नहीं लगना चाहिए और पूरी टुकड़ी रेयन की खोज और उसे सुरक्षित वापस लाने में जुट गई। और हमारे यहां? पिछले वर्ष उत्तराखंड में हुए हादसे में कई परिवारों के आधे से ज्यादा गायब सदस्यों को आज तक खोज नहीं पाया है प्रशासन! सोचना होगा कि यह देश किसका है और किसके लिए है!  


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