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बलात्कार और सामाजिक संरचना PDF Print E-mail
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Thursday, 03 July 2014 01:34

विनोद कुमार

 जनसत्ता 03 जुलाई, 2014 : बदायूं की घटना ने देश-विदेश में भारतीय सभ्यता और संस्कृति की महानता की पोल खोल दी। बलात्कार की इससे बर्बर घटनाएं इसके पूर्व में होती रही हैं। अति पिछड़े वर्ग की दो नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार और फिर उनके शवों को पेड़ पर लटकाना बर्बरता का एक रिकार्ड है। इसकी देश-विदेश में भर्त्सना हुई, लेकिन कुल मिलाकर राजनीति ज्यादा और शर्म कम दिखाई दे रही है। और समाधान के रूप में जो बातें कही जा रही हैं, यानी ग्रामीण इलाकों में शौचालय न होने और पुलिस बल की कमी बाबत, उससे हमारे समाज का बौद्धिक दिवालियापन ही प्रकट हो रहा है। 

कहा जा रहा है कि चूंकि महिलाओं को शौच के लिए घर से निकलना पड़ता है, उनके साथ बलात्कार हो जाता है। यानी मामला कुछ उस प्रकार का है कि बाघ जंगल के बीच नदी-घाट पर घात लगा कर छिपा रहता है और जैसे ही कोई मासूम जानवर पानी पीने के लिए वहां पहुंचता है, बाघ उसे धर दबोचता है। हालांकि जानवर वह नहीं करते जो इंसान करते हैं। पहले बलात्कार करते हैं और फिर अपनी यौनहिंसा के शिकार को मार कर पेड़ पर लटका देते हैं। अब अगर इससे बचना है तो बड़ी संख्या में शौचालय बनाने पड़ेंगे!

कहा जा सकता है कि शौचालय की सुविधा बलात्कार रोकने की दिशा में एक कदम है। अगर हमारी अर्थव्यवस्था इस काबिल हो गई है कि फ्लशयुक्त शौचालय में हम मल-मूत्र त्याग कर सकें तो वे जरूर बनने चाहिए। लेकिन हमारे यहां तो अभी पीने के पानी का ही टोटा है। वैसी अवस्था में कम से कम हमें इस आग्रह से बचना चाहिए कि शौचालय बिना बलात्कार नहीं रुक सकता। वैसे भी ये दो अलग-अलग समस्याएं हैं। उन्हें आपस में जोड़ना ठीक नहीं। और हमारी चिंता तो यहां इस बात को लेकर है कि क्या हजारों वर्षों की सभ्यता की दौड़ के बाद हम इसी जंगल-राज में पहुंचे हैं? 

फिर तो स्त्रियों का जीना ही मुश्किल है। क्योंकि उन्हें सिर्फ शौच के लिए घर से नहीं निकलना पड़ता। उन्हें खेत-खलिहानों में काम करना पड़ता है, शहर से ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में पढ़ाने के लिए आना पड़ता है, दफ्तरों में काम करना पड़ता है। उस दौरान उन्हें उन सड़कों से गुजरना पड़ता है, जहां संभव है थोड़ा सन्नाटा हो, थोड़ी कम रोशनी हो। उन्हें ऐसी बस में चढ़ना पड़ सकता है जिसमें पुरुष ही पुरुष हों। तो क्या दरिंदे उन्हें नोच खाएंगे? ऐसा ही समाज हमने बनाया है?

और पुलिस? हमारे देश में महिलाओं की आबादी करीबन पैंसठ करोड़ है। और बलात्कार की कोई उम्र सीमा नहीं। पांच वर्ष की बच्ची से लेकर साठ वर्ष की प्रौढ़ा तक बलात्कार की शिकार हो सकती हैं। इतनी बड़ी आबादी की सुरक्षा के लिए क्या हर जगह पुलिस बल की तैनाती हो सकती है? और इस बात की क्या गारंटी कि पुलिसकर्मी ही बलात्कार पर अमादा न हो जाएं! पुलिसकर्मी भी पहले पुरुष पुंगव होता है। हां, बड़ी संख्या में महिला पुलिसकमियों की बहाली की जा सकती है। लेकिन महिला पुलिसकर्मी की सुरक्षा की गारंटी कौन करेगा? 

दरअसल, शौचालय और पुलिसकर्मी की संख्या बढ़ाने से बलात्कार के बढ़ने और घटने का कोई रिश्ता नहीं। हम आपको एक ऐसे समाज की जानकारी दे सकते हैं, जहां शौचालय सिरे से गायब हैं और पुलिस थाने भी इतिहास के लंबे दौर में नहीं हुआ करते थे। हां, मैं आदिवासी समाज की ही बात कर रहा हूं। वहां शौचालय अब भी नहीं हैं, और पुलिस थानों की स्थापना पहली बार अंगरेजों ने उनके दमन के लिए ही की थी। कोल विद्रोह के बाद 1838 में सबसे पहले जमींदारी थानों की स्थापना हुई, जिनका खर्च अंगरेज बहादुर रैयतों से ही वसूलते थे। यह स्थिति 1863 तक चली, जब आधुनिक किस्म के थानों की स्थापना की गई। लेकिन आदिवासी समाज अपनी बेटियों की सुरक्षा के लिए कल भी पुलिस पर निर्भर नहीं थे और आज भी नहीं हैं। 

आप कहेंगे कि बलात्कार की घटनाएं तो वहां भी हुआ करती हैं। हां, बहिरागतों द्वारा आदिवासी महिलाओं का शारीरिक शोषण होता है। पलायन कर अन्य राज्यों में मजूरी करने गर्इं लड़कियों, र्इंट-भट्ठों में काम करने वाली आदिवासी लड़कियों का दैहिक शोषण होता है। अपसंस्कृति का शिकार हो रहे आदिवासी समाज के कुछ गांव-घरों से भी अब बलात्कार की खबरें निकल कर आने लगी हैं। बावजूद इसके, हम दावे के साथ कह सकते हैं कि औरत-मर्द की बराबरी के लिहाज से यह एक आदर्श समाज है। झारखंड के ग्रामीण इलाकों में बहुधा एक दृश्य आम है। तड़के बालू से, र्इंट और गिट््टी से लदे ट्रक पर रेजा कुली साथ-साथ बैठे हैं। कभी आपने सुना है कि सहकर्मी मजूर ने अपने साथ की मजूरन के साथ बलात्कार किया हो? फिर बलात्कार कहां होता है, उसे चिह्नित किया जाना चाहिए।

बलात्कार उस समाज में होता है, जहां औरत-मर्द में भारी गैर-बराबरी है। जहां औरत भोग की वस्तु और वंश-वृद्धि का साधन मात्र मानी जाती है। पहले समझ यह रही कि बच्चा ईश्वरेच्छा से होता है। जिस दिन पुरुष की समझ में यह बात आई कि समागम से संतानोत्पत्ति का रिश्ता है, उसने औरत पर कब्जा करना शुरू कर दिया। वह गाय-गोरू की तरह संपत्ति हो गई। और जब संपत्ति है तो उसकी रक्षा भी होनी चाहिए। रजस्वला होने के पहले उसका विवाह कर दो। उसके पूर्व वह पिता की संरक्षिता रहेगी, फिर पति की। अगर संरक्षक कमजोर हुआ तो उसकी लूट भी होगी। और आक्रमणकारी वह होगा जो ताकतवर है, और आक्रमण का शिकार वह होगा जो समाज का कमजोर तबका


है। 

एक भदेस मुहावरा इसी बात को रेखांकित करता है- कमजोर की बीवी, सबकी भौजाई। इस मुहावरे का निर्मम यथार्थ यह है कि दबंग हैं उच्च वर्णों के लोग और उनके शिकार बनते हैं दलित और अति पिछड़े तबके के लोग। दबंगों में पिछड़ी जातियों के वे लोग भी हैं जो आर्थिक संपन्नता और राजनीतिक शक्ति प्राप्त करते ही सामंती, विकृत जीवन मूल्यों को अपना लेते हैं। सबसे पहले अपने घर की औरतों का बाहर निकलना, खेत-खलिहानों में काम करना बंद कर देते हैं और कमजोर तबके की औरतों को खेत-खलिहानों में अपना शिकार बनाते हैं। वे ऐसा अपनी दबंगई के प्रदर्शन के लिए और कमजोर तबके का मनोबल तोड़ने के लिए भी करते हैं। दुश्मन-खेमे पर आक्रमण के वक्त औरतों से बलात्कार एक सामान्य परिघटना है। दलितों ने सामंतों की बात नहीं सुनी तो बस्तियों में आग लगाना और उनकी औरतों के साथ बलात्कार उत्पीड़न का एक आम हथियार है। बलात्कार कर पेड़ पर लटका देना उस क्रूरता की चरम अभिव्यक्ति।

शहरों में ये विकृतियां सभ्यता के आवरण में ढंकी रहती हैं। लेकिन उच्चकुलीन वर्ग की प्रतिष्ठा और उनके घर की औरतों की इज्जत सुरक्षित रहे, इसके लिए बाजाफ्ता जिस्मफरोशी के अड््डे बनाए गए हैं। पूंजीवादी व्यवस्था ने औरत के जिस्म को एक तिजारती वस्तु में बदल दिया है। विज्ञापनों में हम नारी देह के इस दोहन को लगातार देखते हैं। आमोद-प्रमोद के ढेरों उपक्रम किए गए हैं। शराब पीते हुए औरत के नंगे जिस्म को निहारना, सौंदर्य प्रतियोगिताओं के नाम पर कैटवॉक करती लगभग नग्नप्राय नारी जिस्मों का अवलोकन करना, आदि। लेकिन बावजूद इसके, खाते-पीते अघाए समाज की मानसिक विकृतियां तरह-तरह से प्रगट होती रहती हैं। 

क्यूप्रिन के ‘गाड़ी वालों का कटरा’ उपन्यास की भूमिका में लेखक ने उसका कुछ ब्योरा दिया है। भद्र समाज के तहखानों से कैसे भ्रूणों का ढेर बरामद हुआ था, कैसे बच्चियों की योनि में दतवन का टुकड़ा डाल दिए जाने का रिवाज था ताकि दतवन के फूलने के साथ उनकी जनेंद्रियां भी बड़ी हों, आदि। हम सिर्फ यह कहना चाहते हैं कि निठल्ले समाज और बिना श्रम के पैदा हुए इफरात पैसे ने अजीबोगरीब विकृतियां एक वर्ग-विशेष में पैदा की हैं। 

हम इस भ्रम में हैं कि तथाकथित विकास और तकनीकी क्रांति से मनुष्य का मानस भी बदल रहा है। जब तक वर्ण-व्यवस्था पर टिकी हमारे देश की सामाजिक-आर्थिक संरचना नहीं बदलती, तब तक हमारा मानस भी नहीं बदलने वाला। तकनीकी क्रांति के इस दौर में भी वर्ण-व्यवस्था नहीं टूटी है। उत्पादन के साधनों पर अब भी समाज के एक छोटे-से तबके का कब्जा है। शारीरिक श्रम करने वाला तबका अब भी दलितों और आदिवासी का ही है। भूमिहीन श्रमिक, सड़कों पर खटने वाले उजरती मजदूर, कोयला क्षेत्र के पत्थरकट्टा मजदूर, लौह अयस्क खदानों में काम करने वाले श्रमिक आदिवासी, दलित और पिछड़ी जातियों से ही आते हैं। नगर के कूड़े-कचरे को साफ करने का काम दलितों के ही जिम्मे है। 

मायावती उत्तर प्रदेश की सत्ता में लंबे समय तक रहीं, लेकिन वे कांशीराम और मदमस्त हाथियों की मूर्तियां ही बनवाती रहीं। दलितों की आर्थिक स्थिति बदले, इस दिशा में कुछ नहीं किया। 

बिहार में लालू और नीतीश भूमि-सुधार नहीं कर सके। वन अधिकार कानून को लागू करवाने के लिए आंदोलन हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश की अधिकतर दलित बस्तियां अब भी सामंतों की जमीन पर बसी हुई हैं। सरकार ने बासगीत का पर्चा और उसके साथ जमीन पर कब्जा नहीं दिलवाया। कम से कम नगरपालिकाओं में काम करने वाले दलितों को नियमित तो कर दिया होता। कुल मिलाकर, दलितों के आर्थिक-सामाजिक हालात में बहुत कम बदलाव आया है, आजादी के इतने वर्षों बाद भी।

ऐसी स्थिति में जब दलित, अतिपिछड़ा समाज दबंगई का चुनावों में विरोध करता है तो दबंग तबका बौखला उठता है। हम मुलायम और अखिलेश सरकार को कोस रहे हैं। अगर उनकी जनता पर पकड़ ही रहती तो वे हारते? और जिस सरकार के पीछे व्यापक जन समर्थन नहीं, उस सरकार की नौकरशाही बेलगाम हो जाती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश, जिसने प्रतिदिन दस बलात्कार का रिकार्ड बना रखा है, वहां से मोदी को लोकसभा चुनाव में अस्सी में से सत्तर सीटें मिली हैं। 

कट्टर हिंदूवादी ताकतें दलितों को उनकी औकात बताने में लग गई हैं। इसका मुकाबला दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक मिलकर ही कर सकते थे। लेकिन सत्ता की राजनीति ने दलितों और पिछड़ों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया है। और मोदी इस फिराक में हैं कि ये दोनों शक्तियां आपस में टकरा कर पस्त हो जाएं, ताकि विधानसभा चुनाव में सभी उनकी शरण में पहुंच जाएं। हम तो दलितों पर होने वाले हमलों को, जो नोएडा से लेकर सुदूर पांडिचेरी तक हो रहे हैं, इसी नजरिए से देखते हैं। और इस स्थिति को सुधारने में पुलिस और शौचालय हमारी कुछ भी मदद नहीं कर सकते।


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