मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
जिज्ञासा की राह PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Thursday, 03 July 2014 01:31

स्वतंत्र मिश्र

जनसत्ता 03 जुलाई, 2014 : बच्चे बहुत भोलेपन और कौतुक से भर कर कभी-कभी ऐसे सवाल कर जाते हैं कि कई बार समझना मुश्किल होता है कि उनके क्या जवाब दिए जाएं! 1980 के दशक में जब टीवी और मोबाइल या संचार के दूसरे आधुनिक संसाधन नहीं थे, तब बच्चों को हम तेनालीराम, नंदन वन, शेर, भालू, बकरी और जंगल के या नीति-नैतिकता वाले किस्से सुनाते थे। उनके सवाल भी अपने आसपास की दुनिया के ही होते थे। लेकिन 1990 के बाद, खासकर पिछले कुछ वर्षों में बच्चों की दुनिया टेलीविजन या स्मार्ट फोन की स्क्रीन पर जाकर खुलने लगी है, जहां वे अपने मां-पिता के साथ बैठ कर किसी धारावाहिक के साथ-साथ कंडोम के उत्तेजक विज्ञापन भी देख रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि वे बाकी खबरों के अलावा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किन्नरों को दिए गए ‘थर्ड जेंडर’ के ओहदे से भी रूबरू हो रहे हैं।

कुछ समय पहले टीवी पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जुड़ी खबर देखने के बाद सात-आठ साल से लेकर बारह-तेरह साल के बच्चों के मन में कई तरह के सवाल पैदा हुए। मसलन, ‘ये ताली क्यों पीटते हैं’, ‘ये लहरा कर क्यों चलते हैं’, ‘ये लोगों से पैसे क्यों मांगते हैं’, ‘आपकी तरह नौकरी क्यों नहीं करते हैं’, ‘ये हमसे अलग तरह से कपड़े क्यों पहनते हैं?’ हाल में ऐसा ही एक सवाल मुझसे टकराया जब मैं एक वेबसाइट पर प्रकाशित किन्नरों के जीवन पर केंद्रित लेख पढ़ रहा था। लेख के शुरू में ही एक न्यूड पेंटिंग थी, जिसमें एक व्यक्ति के मुंह पर दाढ़ी थी और वक्षस्थल स्त्री की तरह था। मेरा बेटा शब्द मेरे पीछे खड़ा था। उस चित्र पर उसकी नजर पड़ी और वह खिलखिला कर हंसने लगा। वह चित्र किन्नरों को परिभाषित कर रहा थी, लेकिन अभी उसे नहीं पता था कि स्त्री या पुरुष से परे तीसरे वजूद की भी कोई दुनिया होती है।

मैं दुविधा में पड़ गया। कंप्यूटर बंद करना मुझे ठीक नहीं लगा। इससे उसके कोमल मन में शायद यह सवाल नकारात्मक असर छोड़ जाता कि आखिर पिता ने इसे रहस्य क्यों बनाया। मैंने बेटे को उस कलाकृति में दाढ़ी दिखा कर पूछा- ‘चेहरे पर दाढ़ी किन्हें होती है?’ उसने जवाब दिया- ‘लड़कों को।’ फिर मैंने कहा कि दूध वाली छाती किनके पास होती है। उसने कहा- ‘मम्मी के।’ फिर चित्र के बारे में मैंने पूछा- ‘इसे लड़की कहोगे या लड़का?’ उसने कहा- ‘पता नहीं।’ मैंने कहा कि क्या तुमने कोई ऐसा लड़का देखा है जो लड़कियों की तरह कपड़े पहनता हो, तो उसने सिर पर अंगुलियां टिकाते हुए कहा- ‘हां! एक बार ट्रेन में


मैंने देखा था। वे ताली पीटते हैं और लोगों से पैसे मांगते हैं।’ इसके बाद शब्द ने पूछा कि उनका पहनावा और सजने-संवरने का तरीका लड़कियों की तरह क्यों होता है, वे ताली क्यों पीटती हैं, पैसे मांगने वाले दूसरे लोग क्यों ताली नहीं पीटते? इसके बाद मैंने उसे बताया कि वे हमारी तरह हैं। वे लड़कों या लड़कियों की तरह एक-दो काम को छोड़ कर बाकी सारे काम हमारी तरह कर सकते हैं। वे पढ़-लिख सकते हैं, स्कूल जा सकते हैं, लेकिन सरकारें उन्हें ऐसा नहीं करने देती थीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि उनकी भी एक खास सामाजिक पहचान है। अब वे भी सभी काम कर सकेंगे और सरकार ऐसा करने में उन्हें मदद करेगी। 

मेरे कहने का आशय यह है कि शब्द के दिमाग में बहुत सारे सवाल हैं। उसे इनके जवाब चाहिए। सामाजिक परंपराओं का लिहाज करके अगर किसी सवाल पर परदा डाला जाएगा तो वह किसी बच्चे के सामने एक भ्रम की दुनिया रचेगा। मैंने अपनी सीमा में बेटे के सभी सवालों के सही जवाब दिए, बात की और उसे संतुष्ट करने की कोशिश की। मैं जब इस उम्र में था तब शायद इतने सवाल मेरे पास नहीं होंगे और न उन सवालों पर बात करने वाला कोई होगा। यह किसी एक व्यक्ति का मामला नहीं है। एक पूरी परंपरा रही है कि बच्चों के सवाल पर उन्हें अधर में छोड़ दिया जाता रहा और उसके बाद उनके सामने किसी सही जवाब के बरक्स कोई काल्पनिक धारणा बना लेने के अलावा कोई चारा नहीं रहा। सही जवाब नहीं मिलने या टालमटोल होने के बाद बच्चों के भीतर एक प्रवृत्ति पैदा हो सकती है कि उनके भीतर कुछ नया जानने की उत्सुकता खत्म हो जाए। उसके बाद हम अंदाजा लगा सकते हैं कि अपने लिए और समाज के लिए ऐसे बच्चे की क्या उपयोगिता रह जाएगी!


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?