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सिने-संस्थाओं के कायाकल्प की जरूरत PDF Print E-mail
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Wednesday, 02 July 2014 01:54

सुनील मिश्र

 जनसत्ता 02 जुलाई, 2014 : हमारे देश में सिनेमा को अनुशासित करने, उस संस्कृति के इतिहास, वर्तमान और भविष्य को संरक्षित करने या उसकी चिंता करने का काम सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय करता है, यह हम सभी जानते हैं। एक सरकार के कार्यकाल में उस विभाग को चलाने वाले मंत्री और उत्तरदायी नियामकों की अपनी जवाबदारियां होती हैं, सोच और दिशा होती है जिसके आधार पर विभाग और उसकी संस्थाएं काम करती हैं। हर सरकार के समय इन सारी चीजों को समाज देखता है। सेंसर बोर्ड से लेकर अनेकानेक नामधारी कार्यालयों और उनके कामों का आकलन होता है, सक्रियता और सार्थकता को लेकर बात होती है। 

बीसवीं सदी में संप्रेषण और पहुंच के साथ-साथ सरोकार के सबसे शक्तिशाली और चमत्कारिक माध्यम, सिनेमा की बाबत सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के कामकाज को लेकर लंबे समय से असंतुष्टि का भाव चला आ रहा है। हमेशा इस बात को लेकर विभाग कठघरे में खड़ा किया जाता है कि जिन उद््देश्यों की पूर्ति इसे करनी चाहिए थी, वह नहीं हो पा रही है या जिस दिशा में काम किया जाना चाहिए था, नहीं किया जा रहा है। कई बार काम न होने की शिकायत होती है, कई बार काम के स्तरीय या उत्कृष्ट न होने की शिकायत होती है और कई बार काम के अच्छे होने के बावजूद उसके प्रकाश में न आ पाने की भी शिकायत हुआ करती है। विडंबना यह है कि विभाग की ओर से ऐसा कोई प्रवक्ता नहीं होता जो समाधानकारी उत्तर या शिकायतों और अपेक्षाओं पर अपना सार्थक पक्ष प्रस्तुत कर सके।

देश में इस बार बनी सरकार को लेकर एक जबर्दस्त उत्साह और आशावाद चारों ओर दिखाई देता है। सरकार में विकास, विस्तार, विदेश नीति, शिक्षा, जल, वन, सड़क, महिला, बच्चे, कानून-व्यवस्था और अन्य अनेक बातों के साथ सिनेमा को लेकर भी बात की जानी चाहिए। सिनेमा दरअसल मुंबइया सिनेमा की तरह बुरा या बाजारू भर नहीं है बल्कि सिनेमा की अपनी धरोहर बड़ी मजबूत और सम्हाल-सहेज कर रखी जाने लायक है। हमारे देश में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत सिनेमा के प्रति काम करने वाली संस्थाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था है, राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार। इस संस्था का मुख्यालय पुणे में है। 

राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार में सिनेमा-इतिहास की महत्त्वपूर्ण धरोहरें संग्रहीत हैं, अर्थात बीस हजार से भी ज्यादा दुर्लभ फिल्में जो सोलह और पैंतीस एमएम फार्मेट में हैं, रखी हुई हैं। खास बात यह है कि इस संस्थान में दादा साहब फाल्के द्वारा बनाई गई पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र और कालिया मर्दन आदि फिल्में भी संरक्षित हैं। एक बार यह संस्थान कुछ वर्षों पहले अग्निकांड का शिकार हो चुका है। संस्थान में संग्रहीत फिल्मों की सुरक्षा के लिए उसका रासायनिक उपचार भी नियमित रूप से किया जाता है। 

इसके बावजूद आज की आवश्यकता यह है कि इन सभी फिल्मों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से सुरक्षित कर लिया जाए। कुछ समय पहले यहां फिल्मों को डीजी बीटा फार्मेट में परिवर्तित करने का काम आरंभ हुआ था, जो बाद में रुक गया। विश्व-स्तर पर सिनेमा जैसी विधा और उसकी दुर्लभ धरोहरों को आधुनिक संसाधनों के साथ संरक्षित किया जा रहा है, वैसा काम यहां बरसों से अपेक्षित है।

पुणे में ही राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार के सामने कुछ दूरी पर फिल्म एवं टेलीविजन प्रशिक्षण संस्थान बना हुआ है जो अपनी एक लंबी विरासत का कमजोर वर्तमान माना जाने लगा है। हमारे देश में सिनेमा में सहभागिता का अर्थ हमेशा अभिनय ही रहा है। पीढ़ियां परदे पर दिखने के लिए आसक्त रही हैं, जबकि आगे चल कर ऐसी बहुत सारी तकनीकी और रचनात्मक विधाएं रही हैं जिनमें अपनी दक्षता, जिज्ञासा और क्षमता के प्रदर्शन से भी अपनी बड़ी पहचान बनाई जा सकती है। 

कहानी एवं पटकथा लेखन, संवाद लेखन, सिनेमेटोग्राफी, कला निर्देशन, संपादन, आॅडियो रेकॉर्डिंग आदि कितने ही आयामों में बेहतर सृजन और कीर्तिमान के लिए संभावनाएं खुली हैं। अभी कुछ समय से इन माध्यमों में भी नई पीढ़ी ने अपनी भागीदारी दिखाई है। लेकिन ऐसे सरकारी संस्थानों में जिस तरह पाठ्यक्रमों को लेकर, प्रशिक्षण प्रदान करने वाले गुणीजनों को लेकर उपेक्षा और उदासीनता दिखाई देती है वह काफी निराशाजनक है। फिल्म संस्थान में वे लोग पढ़ाने आते हैं जो सिनेमा से अव्वल तो कट चुके हैं; दूसरे, सक्रियता के वक्त भी उनका समृद्ध इतिहास नहीं रहा है। ऐसे में प्रशिक्षणार्थियों के मानस में उसी काम के प्रति घोर निराशा और असंतोष व्याप्त हो जाता है जिसके माध्यम से वे एक सपना लेकर अपना घरबार छोड़ कर आते हैं। परिणाम होता है विरोध, विद्रोह, आंदोलन।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ही एक संस्था है राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम, जिसकी स्थापना चालीस साल पहले मुंबई में हुई थी। इसका उद््देश्य यह था कि ऐसे फिल्मकार सामने आएं, उनको मदद हो जो सिनेमा को ठोस धरातल देने में विश्वास करते हों, जो सिनेमा को विचार और सार्थकता के आधार पर शक्तिसंपन्न बनाना चाहते हों, जो हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के सिनेमा में अपनी क्षमता और प्रतिभा से अलग और अनूठा रचने का काम कर सकें। एक उत्साहपूर्ण शुरुआत थी जिसने 1975 से ही बहुत उम्मीदें जगार्इं और काम भी किया। 

देश ने श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, सुधीर मिश्रा, मृणाल सेन, केतन मेहता, विजया मेहता, सई परांजपे, प्रकाश झा, सईद अख्तर मिर्जा, कुंदन शाह जैसे फिल्मकारों को इस संस्थान के माध्यम से जाना। सार्थक सिनेमा आंदोलन इस संस्थान के समर्थन से ही शुरू हो सका। बहुत सारी फिल्में बनीं लेकिन बाद में दस-बारह सालों में ही जैसे इस प्रयोग की उम्र पूरी हो गई। वे फिल्मकार जो निगम के समर्थन से फिल्में बनाते थे, बाहर रास्ता


तलाशने लगे। कुछ ने धाराएं बदल लीं, मध्यमार्ग अपना लिया और कुछ प्रतिबद्ध भी रहे, लेकिन मिर्च मसाला, पेस्टन जी, सलाम बॉम्बे, आदि शंकराचार्य, अन्तर्जली यात्रा, सलीम लंगड़े पे मत रो, गणशत्रु, मारुपक्कम, सूरज का सातवां घोड़ा जैसी फिल्मों की याद तो आज भी की जाती है जिनको विभिन्न श्रेणियों में राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी नवाजा गया। 

आज राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम जैसी संस्था को फिर जाग्रत और सक्रिय करने की जरूरत है। कुछ समय पहले निगम ने स्वनिर्मित अपनी सभी फिल्मों की डीवीडी जारी करके एक बड़ा काम किया है, लेकिन यह काफी नहीं है। इस ठहरे हुए संस्थान को गति देना जरूरी है क्योंकि सिनेमा में प्रयोगों और आधुनिक स्तर पर प्रदर्शन के लिहाज से अब का समय ज्यादा बेहतर और आशाजनक है।

मुंबई में ही स्थापित है साठ साल पुरानी राष्ट्रीय बाल एवं युवा चलचित्र समिति, जिसमें समय-समय पर जया बच्चन, नंदिता दास और अमोल गुप्ते जैसे लोग संस्था प्रमुख के पदों पर आसीन हुए हैं। इस संस्थान की गतिविधियों का पता ही नहीं चलता। मुख्य रूप से तो इसका उद््देश्य बच्चों और युवाओं के लिए अच्छी फिल्मों का निर्माण किया जाना होना चाहिए, लेकिन साल में एक बार 14 नवंबर के दिन यह संस्था कहीं बाल फिल्म महोत्सव भर का आयोजन करते समय चर्चा में आती है। दिलचस्प यह है कि विशाल भारद्वाज जैसे फिल्मकार मकड़ी और ब्ल्यू अम्ब्रेला जैसी दिलचस्प बाल-फिल्म अपनी सामर्थ्य से बना लेते हैं। मराठी भाषा में कुछ फिल्मकार बाल मनोविज्ञान पर महत्त्वपूर्ण फिल्में बनाते हैं जिनमें श्वास, टिंग्या आदि फिल्में याद आती हैं। पर समिति की सक्रियता क्या है यह पता नहीं चलता। छह दशक में इस संस्थान ने ग्यारह फिल्में बनाई हैं।

वर्ष 1948 में मुंबई में ही स्थापित एक बड़ा संस्थान फिल्म डिवीजन है जो कभी आरंभ में समाचार दर्शन और डाक्युमेंट्री फिल्मों के निर्माण के समय चर्चा में रहा करता था। बाद में इस संस्थान में बीच-बीच में कुछ अच्छे निदेशकों के आने से समाज, देश, कला, साहित्य, संस्कृति और सिनेमा-संगीत आदि की शख्सियतों पर अच्छी फिल्मों के निर्माण भी हुए, जिसका क्रम आगे चल कर बंद हो गया। 

गौरतलब है कि अब भी फिल्म प्रभाग कभी-कभार लघु फिल्में बनाता है लेकिन उनके प्रदर्शन का प्लेटफॉर्म देश भर में कहीं नहीं है, सिवाय समारोहों के, जिन्हें करते रहने या देश भर में प्रचार और प्रदर्शन का नेटवर्क फैलाने के लिए फिल्म प्रभाग के लोग चिंितत नहीं दिखते। यह सरकारी ढर्रे का शिकार एक निष्क्रिय संस्थान बन कर रह गया है। 

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ही एक सबसे जिम्मेदार संस्था सेंसर बोर्ड है जो हमेशा शिकायतों और विवादों में घिरी रहती है। संयोग की बात है कि इस बोर्ड को ज्यादातर महिलाओं ने अध्यक्ष के रूप में सुशोभित किया है- आशा पारेख, शर्मिला टैगोर, लीला सेमसन आदि- लेकिन सिनेमा में बढ़ती अश्लीलता, भद््देपन और हिंसा दिखाए जाने से उठने वाले विवादों को लेकर फिल्म प्रभाग की ओर से कोई भी उत्तरदायी जवाब नहीं दे पाया। 

ताज्जुब है कि सनी लिओन जैसी कुछ नहीं जानने वाली या विवादास्पद अभिनेत्री को इसी अनुशासन में हमने हाल के ही वर्षों में ऐसा महिमामंडित होते देखा है जिसका जवाब नहीं। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में दिवंगत विजय आनंद का कार्यकाल याद किया जाता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस पद पर प्रधानमंत्री जिन्हें नियुक्त करेंगे, उन्हें इस मंत्र के साथ, कि सिनेमा अपने स्वरूप और अपनी उपादेयता में मर्यादित रहे।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ही एक बड़ी संस्था फिल्म समारोह निदेशालय है जो अपने नाम के अनुरूप भारतीय फिल्मों के देश और दुनिया में प्रदर्शन की आयोजनपरक गतिविधियों से जुड़ी हुई है। निदेशालय कभी उस अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह को लेकर चर्चित (और विवादास्पद भी) बना रहता था जो अब पूरी तरह गोवा में जाकर स्थापित हो गया है। पहले यह समारोह एक साल नई दिल्ली और एक साल देश के किसी आतिथेय राज्य में हुआ करता था। गोवा में जाने के बाद इस समारोह की पहचान बॉलीवुड केंद्रित समारोह की ज्यादा हो गई है। इसके अतिरिक्त निदेशालय साल में एक बार दादा साहब फाल्के पुरस्कार सहित विभिन्न श्रेणियों में नेशनल अवार्ड भी सिनेमा के क्षेत्र में प्रदान करता है। इन फिल्मों के राज्यों में समारोहिक प्रदर्शन आसान हों, राज्य सरकारों के सहयोग से इनमें एक तरह की निरंतरता आए, इसका ध्यान रखा जाना जरूरी है।

भारत में सिनेमा की उम्र सौ साल से ज्यादा हो गई है, हम नई सदी के दूसरे दशक के अधबीच में भी हैं। यह एक बड़ा विषय है कि भारतीय सिनेमा इतिहास की धरोहर के संरक्षण के मापदंड अब तक क्या हैं और उनमें किस तरह के परिवर्तन की जरूरत है? वास्तव में अगर बहुत सारे आयामों में आदर्श और मानदंड स्थापित करने की गंभीरता प्रबल है तो इस माध्यम को भी जरूर देख लिया जाना चाहिए।


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