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पेड़ पर कंबल PDF Print E-mail
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Wednesday, 02 July 2014 01:53

राजेंद्र उपाध्याय

जनसत्ता 02 जुलाई, 2014 : रोज घूमने जाता हूं सुबह-सुबह। अक्सर पेड़ों की ओर नहीं देखता। कभी-कभी हरी पत्तियों की चमक पर नजर टिक जाती है और कभी वह भी नहीं। कभी किसी पेड़ पर जामुन या आम देखता हूं तो उन्हें तोड़ने की इच्छा हो जाती है, तो कभी किसी पेड़ पर बैठी कोयल की आवाज भी ध्यान खींचती है। कभी किसी बंदर के उत्पात से बचने के लिए पेड़ों की ओर देखता हूं और कभी किसी फुदकती गिलहरी की ओर अनायास नजर चली जाती है। कभी कोई बिल्ली भी पेड़ पर चढ़ी दिखती है या फिर गिलहरी रास्ता पार करती है तो उसकी ओर से बच कर चलता हूं। 

पंडारा रोड की इस अति-संभ्रांत कॉलोनी में अक्सर पेड़ों के ऊपर की ओर मेरी नजर कम ही जाती है। लेकिन मेरी क्या, किसी की भी नहीं जाती होगी। पर आज कुछ दूर से पेड़ के ऊपर की ओर मेरी नजरें चली गर्इं, तो देखा कि वहां एक कंबल लटका हुआ था। कंबल देखने में तो अच्छा-भला लगता था, पर वह वहां ऊपर पेड़ की डाल पर क्यों झूल रहा है? वहां वह कैसे पहुंचा या किसने वहां किसलिए डाला है? दिमाग में यह भी आया कि क्या रात को उस पेड़ पर आकर कोई भूत सोता है, जिसे ठंड लगती है तो उसके लिए यह कबंल डाला गया है, जैसे मेरी बेटी कमरे में अकेले नहीं सोती! कहती है कि इस पेड़ पर भूत रहता है, जिससे मुझे डर लगता है। यह भी सोच लिया कि रोज रात को कौन इस पेड़ पर चढ़ कर सोता है और सुबह अपने काम पर चला जाता है!

क्या यह कंबल किसी दयालु मकान मालिक ने उन बंदरों, चिड़िया, तोते या गिलहरियों के लिए डाला है, जो हर रोज यहां इस पेड़ पर आकर रैन बसेरा करते हैं और सुबह इधर-उधर चले जाते हैं, दाना पानी की तलाश में? मुझे लगा कि बंदरों के लिए तो नहीं ही है, क्योंकि अगर वह बंदरों के लिए होता तो क्या अब तक साबुत बचता? अब तक तो उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए होते। आखिर बंदर भी तो मनुष्य के ही पूर्वज हैं- मिल-बांट कर कोई चीज नहीं इस्तेमाल कर सकते। उसके लिए लड़ते हैं, छीना-झपटी करते हैं और आखिर में किसी के हाथ नहीं आने देते। सत्ता के लिए बंदरबांट इसी को कहते हैं। देश के कुछ राज्यों में जैसा देखा गया, वह आजादी के बाद से अब तक कई बार होता आया है। पर वह कंबल साबुत कैसे है? क्या बंदरों की नजर इस पर नहीं पड़ी? जरूर पड़ी होगी। पहले शायद


वे इससे डर कर भाग गए होंगे, अब धीरे-धीरे आएंगे और इस पर झूलेंगे, जो मर्जी करेंगे, चिड़ियां रैन बसेरा करेंगी।

हो सकता है कि किसी मकान मालिक ने इसे हाल-फिलहाल फेंका हो। यह उनके नौकर का हो और वह उनकी नौकरी छोड़ कर चला गया हो। इसे घर में लाने के बजाय उन्होंने इसे इसी तरह पेड़ पर फेंक दिया हो। यह खयाल आने के बाद मेरे मन में आया कि इससे अच्छा तो कंबल किसी गरीब, भिखारी को दे दिया होता, तो उसके लिए ठंड में काम आता। दिल्ली में ठंड में कंबल बांटने के काम में कई राजनेता, कई स्वयंसेवी संस्थाएं लग जाती हैं और नशे के आदी कई भिखारी उन कंबलों को बेच कर नशा भी करते हैं। यह भी एक दृश्य है कि कुछ भिखारी भयंकर गरमी में भी कंबल ओढ़े किसी फ्लाई ओवर के नीचे या रेलवे स्टेशन के बाहर बैठे मिल जाते हैं। कई कार्यालयों में तो कुछ कर्मचारी गरीबों को कंबल बांटने के नाम पर अपने सहयोगियों से चंदा वसूलते हैं और उन भिखारियों के पास कंबल पहुंचते ही नहीं। वह पैसा उगाहने वाले की जेब में जाता है। 

बहरहाल, इस कंबल की कहानी क्या है? क्या वह ‘बेताल पचीसी’ वाले बेताल का कंबल है? किसी को इसे फेंकना ही था तो ठीक तरीके से कूड़ा ले जाने वाले या कबाड़ी को दे देना था। हो सकता है उन्होंने इसे किसी को देने की सदिच्छा से ही फेंका हो और यह पेड़ पर लटक गया। अब इसे कौन उतारे! इसे उतारने के लिए या तो फायर ब्रिगेड को बुलाया जाए या बिजली ठीक कराने वाली लंबी सीढ़ी मंगाई जाए! एक लंबी लकड़ी से भी इसे नीचे गिराया जा सकता है। किसी जरूरतमंद को इतना तो कष्ट उठाना ही चाहिए या फिर किसी कंबल बांटने वाली संस्था को आगे आना चाहिए! 


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