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अच्छे की आस PDF Print E-mail
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Tuesday, 01 July 2014 01:46

संदीप जोशी

जनसत्ता 01 जुलाई, 2014 : अपन तो ब्राजील में चल रहे फुटबॉल के अनुष्ठान में लगे थे। क्या रामराज में अच्छे दिन आ गए हैं? और क्या कड़वा घूंट पीना ही इस जनमत का सुखकर है? सब जानते हैं कि अच्छे दिन कोई सेहरा बांधे घोडेÞ पर चढ़ कर नहीं आते हैं। यह भी कि ‘चट मंगनी पट ब्याह’ के बाद लंबा जीवन बिताना होता है। मगर क्या अच्छे दिन से पहले बुरे दिन देखना लाजिमी है? अच्छे दिन की आस में कड़वे घंूट पीना ही क्या लोकतांत्रिक जनाधार होता है? खेलों के सापेक्ष सत्य ही समान रूप से अच्छे दिन की आस में कड़वे घूंट पीना सिखाते हैं।

जिनने भी अच्छे दिनों की आस में नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा को बहुमत दिया, उन्हीं को कड़वा घूंट पीने के लिए छोड़ दिया गया है। लेकिन क्या इसी महंगाई के लिए भाजपा को जनता ने ऐसा बहुमत दिया था? अच्छे दिन का बहुमत क्यों कड़वा घूंट पिलाते हुए बुरे दिन दिखला रहा है? ये सब उसी जनता के सवाल हैं, जिसने नरेंद्र मोदी की विकास अवधारणा को संजो कर अच्छे दिनों की आस लगाई थी। मगर वही जनता अब सोचने पर मजबूर है कि ‘कहां गए वो दिन...!’ अगर यही राजनीति है तो क्यों ताजो-तख्त नहीं उछाले जाएंगे?

कांग्रेस राज ने क्या कड़वे घूंट पिलाने में कसर छोड़ी थी जो बहुमत मिलते ही मोदी सरकार उसे और कड़वा बना कर पिलाने पर आमादा है? सरकार के आर्थिक हालात क्या आम जनता के अच्छे दिनों से ज्यादा जरूरी थे? जो बहुमत सुधार नीति और संयमी विकास के लिए था, उसे क्या भाजपा सरकार दंभ भरा जनाधार मान बैठी है? अगर महंगाई के कड़वे घूंट पीने के लिए ही यह बहुमत होता तो क्या कारोबारी कांग्रेस से जनता कन्नी काटती? कोई राष्ट्रभक्त कतई इसे लोकसेवा की राजनीति नहीं मान सकता है। लोकसेवा के लिए नीति से ज्यादा अर्थ प्रेम आवश्यक कैसे हो सकता है?

महीने भर का ‘हनीमून’ अगले पांच साल होने वाले लड़ाई-झगड़े और मनमुटाव का अंदाजा लगाने के लिए पर्याप्त होता है। जैसे पूत के पांव पालने में दिखते हैं, वैसे ही हनीमून में जीवन का ‘फुल-मून’ भी देखा जा सकता है। क्या सरकार चलाना केवल आर्थिक परिस्थिति होती है? ‘हनीमून’ के खर्च का हिसाब जीवन की जरूरतों से नहीं लगाया जा सकता है। हनीमून वैवाहिकता की शुरुआत भर है जो जीवन का फलसफा नहीं होता है। जनता को महंगाई के कोड़े मार कर सरकार कौन-से हनीमून में रहना चाहती है? मानसून सत्र में संसद में रेलवे बजट पर सार्थक बातचीत होनी चाहिए थी। उससे पहले सरकार को कौन-से घाटे की भरपाई करनी थी जो रेल मालभाड़ा और यात्री किराया बढ़ाना ही सार्वकालिक धार्मिक अनुष्ठान


लगा? फिर जिस जनता ने राजनीतिक धर्म निभाते हुए भाजपा को अपना कीमती मत दिया, क्या उसी को कड़वा घूंट पीने के लिए छोड़ना सरकारी शोभा होती है? आस भरे आम मतदाता के लिए रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी होना ही क्या ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ है? अगर नगरी चौपट भी हो तो क्या राजा अंधेरगर्दी मचा सकता है? इस बार का जनाधार ‘टके सेर भाजी और टके सेर खाजा’ से आगे की आस का था।

सब जानते हैं कि सकल घरेलू उत्पाद ही राष्ट्रीय विकास का मानदंड होता है। क्या सरकार को घरेलू उत्पाद बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन के नीतिगत फैसले लेने के बजाय रेलवे मालभाड़ा और यात्री किराया बढ़ाना ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगा? पहले सकल घरेलू उत्पाद और रोजगार गुंजाईश बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाय मुनाफा कमाने में लगी भाजपा सरकार कैसे कांग्रेसी सरकार से अलग मानी जाएगी? भाजपा सरकार क्यों कांग्रेस के घोषित-अघोषित कार्य करने को ही जनादेश मान रही है? क्या सुचारु शासन चलाने का आश्वासन बहुमत आते ही व्यापार में मुनाफा कमाना हो जाता है?

मजबूत सरकारें सरल, सार्थक और सभ्य नीतिगत फैसले लेती हैं और ऐसे फैसले भी सर्वहारा विकास को दर्शाते हैं। लेकिन प्रजा को कड़वे घूंट पिलाना ही क्या मजबूत राजा होने का पर्याय है? यही कारण थे कि सन अस्सी और नब्बे के दशक में जनता ने न भाजपा और न कांग्रेस को पूर्ण बहुमत दिया था। क्या राजनीतिक अस्थिरता में ही लोक-भलाई की स्थिरता रहती है? आखिर इस हाथीनुमा बहुमत पर मोदी सरकार लोमड़ीनुमा व्यवहार क्यों कर रही है? बहुमत के लिए मोदी ने नए विचार से विकास और अच्छे दिन का वादा किया था। लेकिन सरकार बनाते समय उनने कांग्रेस की तरह नैतिकताविहीन अनुभव और वकालतवाद पर ही भरोसा दिखाया। चतुर नीति को चरित्र-नीयत से ज्यादा भाव दिए। कांग्रेस के पतन के भी यही कारण रहे। ब्राजील में बेशक अच्छे दिन आ सकते हैं। लेकिन कथित ‘रामराज’ में क्या ढाक के तीन पात ही हैं?


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