मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
खतरा या सियासी संदेश PDF Print E-mail
User Rating: / 1
PoorBest 
Tuesday, 01 July 2014 01:36

शीतला सिंह

 जनसत्ता 01 जुलाई, 2014 : अयोध्या की एक मस्जिद में पैंसठ वर्ष पूर्व रामलला के प्राकट्य और बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाईस वर्षों बाद अब सुरक्षा के नए प्रबंधों में इसे ‘नो फ्लाइंग जोन’ में शामिल किया जाना है क्योंकि अब खतरा धरती से अधिक आकाश से संभावित है। यह पता नहीं कि इसका दोष किस देशी, विदेशी या अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र को दिया जाए, जिसके फलस्वरूप अब नए सुरक्षा-प्रबंध की जरूरत पड़ गई है। अयोध्या राम जन्मभूमि के अधिकृत और सरकार द्वारा नियुक्त पुजारी सत्येंद्र दास, जो बीस से अधिक वर्षों से सेवारत हैं, संस्कृत विद्यालय के शिक्षक और रामलला के अर्चक अब अपनी नौकरी से सेवामुक्त हो गए हैं लेकिन उन्हें भी यह सब कुछ अजूबा-सा लगता है। 

छह दिसंबर 1992 को मस्जिद विध्वंस के बाद अस्थायी मंदिर निर्माण के इतिहास का तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डीवी राय को आधार माना जाए तो उनके द्वारा इस घटना के प्रकाशित तथ्यों और पुस्तक में यही बताया गया है कि जब वे दूसरे दिन विध्वंस स्थल पर पहुंचे तो वहां पुलिसकर्मियों की, जो सादे वस्त्रों में थे, भीड़ लगी थी। पुलिस अधीक्षक का वांछित सम्मान करने के बाद उनका कहना था कि कल तो हम सरकारी दायित्व का निर्वाह कर रहे थे लेकिन आज वैयक्तिक आस्था के अनुसार मंदिर निर्माण और उसके लिए आर्थिक सहायता में योगदान कर रहे हैं, भला वैयक्तिक आस्था से हमको कैसे रोका जा सकता है। 

यानी सरकारी सेवारत कर्मचारी के लिए इस मामले में वैयक्तिक आस्था का निर्वाह सर्वोपरि है, भले ही इतिहास की इस बात को भुला दिया जाए कि रामलला के प्राकट्य के लिए तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह को ही अगुआ माना गया है। एक तो तीसरे दिन ही सेवाकाल समाप्त होने के कारण सेवामुक्त हो गए थे, और दूसरे, जिन्हें जिला मजिस्ट्रेट के आरोपपत्र और जांच के बाद सरकार ने सेवामुक्त कर दिया था। लेकिन वे इसी सेवा के बल पर तत्कालीन भारतीय जनसंघ के टिकट पर बहराइच से पत्नी सहित सांसद चुने गए थे। पहला चुनाव तो ड्राइवर राम गरीब के साथ बस्ती से लड़े, लेकिन दलित कोटे में ड्राइवर तो निर्वाचित हो गया पर वे थोड़े वोटों से पिछड़ गए थे। इसी प्रकार बाबरी मस्जिद विध्वंस के अभियुक्तों की सूची में फैजाबाद के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डीवी राय और जिलाधिकारी रवींद्रनाथ श्रीवास्तव दोनों ही हैं। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक भाजपा के सदस्य के रूप में सुलतानपुर से सांसद भी चुने गए थे लेकिन दूसरे चुनाव में वे भाजपा के नहीं बल्कि ‘स्वतंत्र रामभक्त’ के रूप में चुनाव लड़े और हारे; मुकदमे के दौरान मृत्यु के कारण अब उनका नाम अभियुक्तों की सूची में नहीं है। 

इस मामले में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों का कितना योगदान रहा है और जिसे श्रद्धा, आस्था कहते हैं उस रूप में कितने जुड़े हैं अगर इसे जानना हो तो विवादित स्थल का दर्शन करने वालों की सूची पर्याप्त है जिसमें सिपाही से लेकर पुलिस महानिदेशक और कार्यपालिका के शीर्ष अधिकारियों तक के नाम मिलेंगे। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्रद्धावनत दर्शन करने वालों में मिल जाएंगे। सुरक्षाबलों में थल, वायु और नौसेना के कितने अधिकारी हैं जिनकी चिंता यहां विशाल राममंदिर देखने की है। जिन अधिकारियों को विशिष्ट दर्शन की व्यवस्था प्रशासन ने कराई है उस सूची में उनके नाम भी प्रमुख रूप से अंकित होंगे।

हालत तो यहां तक है कि कुछ बड़े पुलिस अधिकारी भी, यही कहते हैं कि मुकदमा चाहे जहां हो, सुनवाई चाहे जो करे, लेकिन रामलला विराजमान को अपनी जगह से हटाने में कोई सक्षम नहीं है। यानी न्यायपालिका को निर्धारित मान्यताओं और विधियों के आधार पर कार्य करने में वे सक्षम नहीं मानते। 

मगर एक ही धर्म को मानने वाले देश इराक के तीन भागों में विघटन की संभावनाएं यह भी बताती हैं कि इसके परिणाम क्या हो सकते हैं। इसे देश की कानून व्यवस्था, लोकतंत्र और संवैधानिक आस्था का प्रतीक मानें या उसके विपरीत, यह आपकी मर्जी है। तर्क यही है कि इस मामले में आस्था की ही जीत होगी- तथ्य, साक्ष्य, इतिहास की नहीं। इस संबंध में अब तक जो शोध प्रकाशित हैं वे भी इसके पक्के गवाह नहीं माने जा सकते। 

रामलला के प्राकट्य से लेकर 1984 तक अयोध्या में इसकी देखरेख और सुरक्षा का दायित्व पतला डंडा लिए थाने का एक ऐसा सिपाही निभाता था जिसका अन्य स्थानों पर कोई बड़ा उपयोग नहीं किया जा सकता था। लेकिन इस बीच ऐसा कोई हादसा नहीं हुआ जब आस्था, विरोध और विद्वेष के कारण इस मूर्ति को हटाने की आवश्यकता पड़ी हो, हां यह अवश्य देखा जा सकता है कि 23-24 नवंबर 1949 को प्राकट्य तो केवल रामलला विराजमान का बताया जाता है लेकिन वहां भरत, शत्रुघ्न और हनुमानजी की मूर्तियां कब प्रकट हो गर्इं इसका कोई उल्लेख नहीं। 

हां अब अस्थायी मंदिर में उन्हें अवश्य देखा जा सकता है। इस स्थल में अखबार वालों के कागज-कलम भी इसलिए रखवा लिए जाते थे क्योंकि उनसे सुरक्षा को खतरा हो सकता है। लेकिन वहां जिलाधिकारी केके नैयर, सिटी मजिस्ट्रेट और इस आंदोलन के नायक रामचंद्र दास परमहंस के तीन-तीन फीट के बड़े फोटोग्राफ कैसे पहुंच गए यह सरकारी जानकारियों में उपलब्ध नहीं है। 

अब सवाल उठता है कि आखिर मस्जिद के अस्तित्वहीन होने के बाद रामलला विराजमान को खतरा किन कारणों से या किन तत्त्वों के द्वारा संभावित है, वे देशी हैं या विदेशी? जब विमान की उड़ानों को भी हम अदृश्य खतरों में शामिल कर लेते हैं तो यही लगता है कि यह वास्तव में उसी प्रकार का तो नहीं जैसे कुछ लोग इस तरह की कल्पनाएं प्रचारित करते


रहते हैं कि अब सृष्टि का विनाश होने वाला है या अमुक देश का अमुक भाग समाप्त होने वाला है या किसी क्षेत्र में महाप्रलय जैसी स्थिति आएगी और कुछ भी नहीं बच पाएगा। यह बात दूसरी है कि ये सारी आस्थाजनित भविष्यवाणियां कहीं भी सत्य नहीं सिद्ध हुई हैं। लेकिन जब सुरक्षा के उपाय करने ही हैं तो अतिरिक्त प्रयत्नों से एतराज क्या! 

हवाईखतरे की सूचनाएं किन आधारभूत साक्ष्यों और सामग्रियों पर आधारित हैं इसे पूछना भी क्या पता रामलला में अनास्था का परिचायक कहा जाए। लेकिन जब इस विवाद के इतिहास को देखा जाएगा और गुप्तचर एजेंसी के द्वारा दी गई रिपोर्ट इस संबंध में कितने भ्रमों और कितनी वास्तविकताओं का पर्याय रही है इसका विवेचन किया जाएगा, तो फैलाए गए भ्रमों की संख्या, जो इस आंदोलन को बढ़ाने में सहायक थी, कई गुना अधिक मिलेगी। यही कारण है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब अस्थायी मंदिर का निर्माण हो रहा था, प्रधानमंत्री सचिवालय के पास भी यही रिपोर्ट थी कि अगर  इसमें व्यवधान डाला गया तो दस हजार हिंदू अपने प्राण देकर इसका विरोध करेंगे। लेकिन जब तीसरे दिन रात में पुलिस की एक छोटी टुकड़ी कब्जा लेने गई, तो उसे बंदूक चलाने को कौन कहे, लाठी-डंडा चलाने की भी नौबत नहीं आई, क्योंकि वहां केवल थोड़े से लोग इस कार्य में लगे थे जो केंद्रीय पुलिस बल को देखते ही वहां से चंपत हो गए।

फैजाबाद के आयुक्त, जो केंद्र की ओर से इस विवादित स्थल के रिसीवर भी हैं, दबे मन से कहते हैं कि हां निर्णय तो हो गया है लेकिन अंतिम फैसला केंद्र को करना है, क्योंकि अयोध्या सर्किल एरिया इक्यूजीशन एक्ट जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने भी विधि-सम्मत करार देकर केवल विवादित स्थल को उससे अलग किया है, यह भूमि केंद्र के अधीन है और फैजाबाद के मंडलायुक्त उसकी ओर से नियुक्त रिसीवर हैं। अब केंद्र में नरेंद्र मोदी पूर्ण बहुमत के साथ सत्तारूढ़ हैं और वे यह भी कहते हैं कि राम मंदिर बनाने का निर्णय संवैधानिक परिधि के भीतर ही होगा।

वर्तमान स्थिति में भी क्या वे अयोध्या को अति संवेदनशीलता के घेरे में रखना चाहते हैं और इसके पीछे इस आंदोलन के इतिहास की भांति कोई राजनीतिक कारण विद्यमान नहीं है? क्योंकि मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान इन विवादित प्रश्नों को अपने अभियान का मुद््दा बनाया ही नहीं। वे महंगाई, बेरोजगारी, सुशासन, भ्रष्टाचार, विदेशों में जमा कालाधन और अच्छे दिन लाने के दावे को ही अपने चुनाव अभियान का आधार बना रहे थे। 

सांप्रदायिक कट्टरता के बल पर उत्तर प्रदेश में भाजपा को अधिक से अधिक तैंतीस प्रतिशत मत मिलता रहा, लेकिन इस चुनाव में राज्य में यह बढ़ कर बयालीस प्रतिशत लांघ गया जिसके कारण पुराने समीकरण ध्वस्त हो गए। लेकिन नई स्थितियों में कहीं इसकी आवश्यकता तो नहीं है कि यह संदेश दिया जाए कि राष्ट्र-द्रोहियों का खतरा कम नहीं हुआ है। इसलिए सुरक्षा के इन प्रयत्नों में उन्होंने धरती के साथ आकाश को भी ले लिया है। वहां की सुरक्षा के लिए सरकार तीन अरब रुपए से अधिक वार्षिक खर्च कर रही है लेकिन उसे नए प्रयत्नों की भी आवश्यकता है।

सुरक्षा के नाम पर अयोध्या को तीन भागों रेड, येलो और ग्रीन जोन में बांटा गया है। अयोध्या के प्रमुख मंदिर, जिन्हें आस्था का केंद्र बताया जाता है, लगभग सभी येलो जोन में ही आते हैं, जहां पहुंचने के लिए कोई व्यक्ति वाहनों का इस्तेमाल नहीं कर सकता और जहां राज्य और केंद्र के सुरक्षाबलों की सक्रिय चौकसी दर्शनार्थियों, आस्थावादियों और तीर्थयात्रियों के लिए साधक नहीं बल्कि बाधक ही बनती है। नए राजनीतिक परिवर्तनों के बाद भी इसमें कोई ढील नहीं आई है। लेकिन राज्य का स्थायी शासक तो नौकरशाही है जिसे नए शिगूफे अपनी आय और सुविधा के लिए आवश्यक लगते हैं। ‘नो फ्लाइंग जोन’ का फरमान वहां के मौजूदा सुरक्षा-खर्च में कैसे पूरा किया जाएगा, इसमें भी तो वृद्धि चाहिए! 

यह कहा जा सकता है कि देश की सुरक्षा के लिए जिस प्रकार सेना के खर्चे विवादों से परे हैं उसी प्रकार रामलला विराजमान की सुरक्षा को भी खर्च से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। यह बात दूसरी है कि पैंसठ वर्षों में कुछ ही बड़े और छोटे टकराव हुए हैं, फिर बीस वर्षों में कोई नया इतिहास इसमें नहीं जुड़ा है। साथ ही अब रामलला विराजमान को नुकसान पहुंचा कर या वहां हमला करके किन वृहत्तर उद्देश्यों की प्राप्ति हो सकती है, जो वर्तमान समीकरणों के विपरीत हो। शांतिपूर्ण समाधान की कौन कहे, अब तो बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी भी यही कहते हैं कि उनकी अंतिम इच्छा यही है कि राममंदिर का निर्माण हो ही जाए। लेकिन कठिनाई यह है कि यह मंदिर निर्माण इस नाम पर होने वाली राजनीति को ही चोट पहुंचाएगा और उसकी हवा निकल जाएगी।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?