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राजभाषा और दक्षिण का द्वंद्व PDF Print E-mail
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Monday, 30 June 2014 11:43

कनक तिवारी

 जनसत्ता 30 जून, 2014 : सोशल मीडिया पर हिंदी में पोस्ट करने के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों को केंद्र के निर्देश पर

गैर-हिंदीभाषी राज्य विरोध में खड़े हो गए। फिर केंद्र को सफाई देनी पड़ी कि यह आदेश हिंदीभाषी राज्यों के लिए है, गैर-हिंदीभाषी राज्यों के लिए नहीं। 


विरोध शुरू हुआ था तमिलनाडु से। द्रमुक प्रमुख करुणानिधि ने केंद्र पर हिंदी थोपने का आरोप लगाया। फिर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने विरोध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी। भाजपा के तमिलनाडु में सहयोगी पीएमके-एमडीएमके के अलावा माकपा, नेशनल कॉन्फ्रेंस आदि ने भी मुखालफत की। 

भारत दुनिया में जातियों और भाषाओं के लिहाज से सबसे बड़ा देश है। प्रांतीय भाषाओं का वर्गीकरण संस्कृत और द्रविड़ भाषाओं के उत्तराधिकारी समूह के रूप में किया जाता रहा है। संस्कृत के खेमे में हिंदी, बांग्ला, गुजराती और मराठी और द्रविड़ समूह में तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम आदि का उल्लेख होता है। भारत सदियों तक एक प्रशासनिक इकाई के रूप में एकनिष्ठ नहीं हो सका था। इसलिए प्रादेशिक भाषाओं को अपने-अपने क्षेत्रों में राजकाज और न्याय व्यवस्था की भाषाओं की भूमिका अदा करनी पड़ी। अंगरेजों की हुकूमत के दौर में अंगरेजी प्रशासन और उच्च शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा बना दी गई। अंगरेजी पत्रकारिता के इलाके में भी पैठ गई। उसने हिंदी और भारतीय प्रादेशिक भाषाओं को दरकिनार करना शुरू किया। 

विभिन्न जाति समूहों की संस्कृति, परंपराओं, साहित्य और इतिहास को पूरी तरह बेदखल करना तो अंगरेजी के लिए संभव नहीं हुआ, लेकिन उसने उच्चतम प्रशासन की प्रतिनिधि होने के कारण भारतीय जनमानस को दो फांक करने में कुटिल सफलता हासिल कर ली। देश के शीर्ष प्रशासक, न्यायाधीश, वकील, इंजीनियर, डॉक्टर, प्राध्यापक, पत्रकार और लेखक अंगरेजी की गोद में प्रकृतिस्थ होते गए। कई नामचीन लोगों ने ईसाई धर्म भी ग्रहण कर लिया। एक विदेशी भाषा ने आकर देशज संतुलन को तहस-नहस कर दिया। अंगरेजी ने शक्ति और सत्ता के आधार पर अपनी श्रेष्ठता का परचम इस तरह गाड़ा कि वह कमोबेश आज तक फहरा ही रहा है। उस पर भी तुर्रा यह कि भारतीय बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग के उपचेतन में यह तर्क काबिज हो गया कि जुदा-जुदा भाषाओं के इस देश में अंगरेजी ही राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने का निर्विकल्प माध्यम है। 

संविधान के मूल प्रारूप पर तीन मुख्य धाराएं संसद में काम कर रही थीं। गोविंद दास के नेतृत्व में कई सांसद देवनागरी लिपि सहित हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित करने के हठयोगी थे। भले ही अंगरेजी अस्थायी तौर पर अपनी राजगद््दी संभाले रहे। कुछ सांसद हिंदी और उर्दू को मिला कर हिंदुस्तानी के उपयोग के सिलसिले में गांधी को उद्धृत करते थे। तीसरा खेमा अहिंदी भाषियों का था, जो किसी एक भाषा को पूरे देश विशेषकर दक्षिण पर लादने का विरोध कर रहा था। टीटी कृष्णमाचारी इसे ‘भाषाई साम्राज्यवाद’ की संज्ञा देते थे। उन्होंने हिंदी के ‘लादने’ पर पृथकतावाद पनपने का खतरा भी संसद को दिखाया था। उन्होंने ‘संपूर्ण भारत’ और ‘हिंदी भारत’ की विभेदक रेखा खींच कर हिंदी की मुखालफत की। 

कृष्णमाचारी ने कहा था ‘मैं इस आधार पर दक्षिण के निवासियों की ओर से चेतावनी दूंगा कि दक्षिण में ऐसे विचार के व्यक्ति हैं, जो पृथक होना चाहते हैं। यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी संपूर्ण शक्तिलगा कर उन विचारों को न पनपने दें, पर अपने हिंदी-साम्राज्य के प्रिय विचार को बार-बार यहां दुहरा कर हमारे संयुक्त प्रांत के मित्र इस दिशा में हमारी कोई सहायता नहीं करते। मेरे संयुक्तप्रांत के मित्रों के हाथ में यह बात है कि वे अखंड भारत की स्थापना करें या हिंदी भारत की। उनको इन दोनों उद्देश्यों में से एक को चुनना है और अपने निश्चय को इस संविधान में सम्मिलित कर देना है। अगर वे हमें छोड़ देंगे, तो ठीक है, हम अपने भाग्य को कोसेंगे; पर साथ ही यह भी भरोसा रखेंगे कि हमारा भविष्य सुंदर होगा।’ 

अंगरेजी शब्दों के विविध हिंदी अनुवादों का लगभग मजाक उड़ाया एसवी कृष्णमूर्ति राव ने। ‘भारत में एक प्रेसीडेंट होगा’ के अंगरेजी कथन के निम्नलिखित हिंदी अनुवाद उन्होंने सदन में पढ़े। हिंद का एक प्रेसीडेंट होगा- सुंदरलाल का अनुवाद। भारत का एक राष्ट्रपति होगा- राहुल सांकृत्यायन का अनुवाद। भारत का एक प्रधान होगा- घनश्याम सिंह गुप्त का अनुवाद। भारत का एक परम पंच होगा- काका कालेलकर का अनुवाद। उलाहने के स्वर में उन्होंने कहा कि दक्षिण में ‘प्रेसिडेंट’ का अनुवाद होता है ‘अध्यक्ष’। लिहाजा यही शब्द क्यों नहीं मान लिया जाता? इसी तरह ‘कॉम्पेन्शेसन’ (क्षतिपूर्ति) ‘सिटीजन’ (नागरिक) ‘रिपब्लिक’ (गणतंत्र) ‘ओथ’ (शपथ) आदि कई शब्दों के विभिन्न हिंदी अनुवाद उन्होंने पढ़ कर सुनाए। इस आधार पर हिंदी को तत्काल राष्ट्रभाषा बनाए जाने की स्वीकार्यता को चुनौती दी। 

लगभग परेशान होकर कृष्णमूर्ति राव ने कहा, ‘हम हिंदीभाषा की तकनीकियां और मुहावरे नहीं सीख सकते। गोविंद दास, पुरुषोत्तम दास टंडन और घनश्याम सिंह गुप्त तमिलभाषियों के साथ रहें और तमिल सीखें। जितने समय में वे तमिल सीख लेंगे, उतना ही समय हिंदी को लागू करने के लिए निर्धारित किया जाए। मुझे विश्वास है उन्हें पंद्रह वर्ष तो क्या बीस से पच्चीस वर्ष लगेंगे।’ सहसा उठ कर हस्तक्षेप करने की आदत डाले हुए हिंदी वीरों में से किसी ने चुनौती स्वीकार नहीं की। 

प्रसिद्ध विद्वान डॉ सुब्बारायन ने हिंदुस्तानी को रोमन लिपि में राष्ट्रभाषा बनाने को लेकर अभिनव तर्क दिए। उन्होंने कहा संघ की भाषा रोमन लिपि सहित हिंदुस्तानी हो। हमें अधिकतम ‘एक विश्व’ के बारे में ही सोचना चाहिए। अगर वास्तव में आपका ‘एक विश्व’


और शांति के विचारों में विश्वास है, जिनका महात्मा गांधी ने संसार में प्रचार किया तो मुझे विश्वास है कि आपमें से अधिकांश लोग, अगर आप अपने दिलों को टटोलेंगे तो मेरे प्रस्ताव के पक्ष में मत देने के लिए तैयार हो जाएंगे।’ 

कांग्रेसियों के हिंदी को अपनाने के आचरण को लेकर सुब्बारायन ने तीखी टिप्पणी भी की: ‘संयुक्त प्रांत के अपने सहकारियों को मैं एक सूचना और दूंगा। ‘कांग्रेस पत्रिका’ अंगरेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में प्रकाशित होती है। आप इन दो भाषाओं के प्रकाशनों की ग्राहक संख्या को देखें तो आपको आश्चर्य होगा। हिंदी के ग्राहकों की संख्या अंगरेजी के ग्राहकों की संख्या की 1/40वां भाग है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि गांधीजी के प्रयासों और अन्य प्रयासों के होते हुए भी जो लोग हिंदीभाषा के समर्थक हैं उन्हें भी हमें ‘कांग्रेस पत्रिका’ के हिंदी संस्करण को खरीदने के लिए तैयार नहीं कर सके हैं।’ रोमन लिपि को देवनागरी लिपि से पुरानी बताए जाने पर उनकी पंडित बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ से झड़प हो गई। डॉ सुब्बारायन ने मद्रास के शिक्षामंत्री के प्रभार के तीन महीनों का अपना अनुभव सुनाते हुए कहा कि मद्रास में हिंदी को अनिवार्य विषय बनाए जाने के बाद प्रतिदिन सुबह उठने पर उन्हें नारे सुनाई पड़ते थे, ‘हिंदी मुर्दाबाद’, ‘तमिल जिंदाबाद’, ‘सुब्बारायन मुर्दाबाद’, ‘राजगोपालाचारी मुर्दाबाद।’ आरके सिध्वा ने टोका कि गांधी ने कभी भी रोमन लिपि में हिंदुस्तानी के प्रयोग की बात नहीं कही। 

मद्रास की दुर्गाबाई ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने का तो समर्थन किया, लेकिन हिंदी समर्थकों के अड़ियल, सनकी और जिद््दी रवैए की कठोर आलोचना की। उन्होंने कहा कि दक्षिणवासी हिंदी या हिंदुस्तानी के पक्ष में गांधी के प्रति अपने समर्थन के कारण हैं। यह भी कि जिस तरह हिंदी-समर्थक अहिंदी भाषियों से अपेक्षा करते हैं, उसी उलटे अनुपात में उन्हें भी एक गैर-हिंदी भाषा सीखनी चाहिए।

दुर्गाबाई ने कहा कि अहिंदीभाषी लोगों की भावनाओं में कटुता लाने का कारण आपका यह दृष्टिकोण है कि आप एक प्रांतीय भाषा को राष्ट्रीय रूप देना चाहते हैं। मुझे भय है कि इससे निश्चय ही उनके भावों और भावनाओं पर बुरा प्रभाव पड़ेगा जिन्होंने पहले ही देवनागरी लिपि में हिंदी को स्वीकार कर लिया है। उनके इस अत्यधिक और कुप्रयुक्त प्रचार के कारण मेरे समान लोगों का समर्थन भी अब प्राप्त नहीं रहा है, जो हिंदी जानते हैं और हिंदी के समर्थक हैं और नहीं रहेगा। राष्ट्रीय एकता के हितार्थ हिंदुस्तानी ही भारत की राष्ट्रभाषा बन सकती है। यहां जो भाषाई अल्पसंख्यक हैं, उन्हें मुसलिमों के समान, अपने आपको परिस्थितियों के अनुकूल ढालने के लिए समय चाहिए।...मैंने हिंदी सीखी। मैंने दक्षिण में सैकड़ों महिलाओं को हिंदी सिखाई। मेरा अनुभव यह है कि जिन्होंने हिंदी में उच्चतम परीक्षाएं पास की हैं वे लिख सकते हैं, पढ़ सकते हैं, पर उनके लिए बोलना असंभव है, क्योंकि बोलने के लिए खास प्रकार का वातावरण चाहिए। दक्षिण में हमें ऐसा वातावरण कहां मिलता है?’ 

टीए रामालिंगम चेट्टियार ने भाषा के सवाल को दक्षिण के लिए जीवन और मरण का प्रश्न बताते हुए कहा, ‘आखिर स्थिति क्या है? हमारे क्षेत्रों की भाषाएं हिंदी से अधिक विकसित हैं और उनका साहित्य भी हिंदी के साहित्य से अधिक वृहत है। यदि हम हिंदी को स्वीकार करने जा रहे हैं तो वह इस कारण नहीं कि वह उत्कृष्ट भाषा है। इस कारण नहीं कि वह सबसे अधिक सुसंपन्न है। इस कारण नहीं कि संस्कृत के समान वह अन्य भाषाओं की जननी है। इस प्रकार की कोई बात नहीं है। हम उसे केवल इस कारण स्वीकार करने जा रहे हैं कि बहुत-से लोगों की भाषा हिंदी है। यह बात भी नहीं है कि इस देश के अधिकांश लोग हिंदीभाषी हैं। केवल बात इतनी है कि भारत में जो भाषाएं बोली जाती हैं उनमें से हिंदी बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक है। केवल इसी आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि हिंदी को सारे देश की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया जाए। व्यवहारवादी होने के कारण हम यह दावा नहीं करते कि हमारी भाषाओं को स्वीकार किया जाए। भले ही वे अधिक विकसित हों। 

जब उन्होंने सगर्व यह घोषणा की कि दक्षिण की भाषाओं का साहित्य हिंदी के मुकाबले कहीं समृद्ध है, सभापति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने झिड़की दी कि भाषाओं के साहित्यों की तुलना करने की जरूरत नहीं है। इस पर तुनक कर चेट्टियार ने कहा कि दक्षिण के लोग हिंदी को अधिकतम राजभाषा के रूप में तो स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन राष्ट्रभाषा के रूप में नहीं, क्योंकि वे अपनी मातृभाषाओं को ही राष्ट्रभाषा समझते है। उन्होंने यह भी कहा कि तमिल भाषा संस्कृत से उत्पन्न नहीं हुई है।


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