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पहाड़ का दुख PDF Print E-mail
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Monday, 30 June 2014 11:39

संजीव चंदन

जनसत्ता 30 जून, 2014 : पिछले दिनों दशरथ मांझी के घर जाना हुआ। यह जानने के इरादे के साथ कि अपनी पत्नी के प्यार में जिस पहाड़ को काट कर उन्होंने रास्ता बनाया था, उसके दोनों ओर के मांझी परिवारों का क्या हाल है। दशरथ मांझी का गांव सुर्खियों में रहा है, जिसके कारण गांव में सुविधाओं के लिहाज से गुणात्मक स्तर पर फर्क आया है। पहाड़ के दूसरी ओर के गांव में मांझी परिवार की स्त्रियों से मिलना हुआ। लगभग सभी मर्द र्इंट भट्ठे पर काम करने गए थे। गांव में बिजली-पानी की सुविधा नहीं और न मनरेगा के तहत पूरा काम। पहाड़ के एक छोर पर दशरथ मांझी प्रतीक हैं, तो दूसरे छोर पर पुलिस की गोली से मारे गए माओवादियों की ‘शहीद समाधि।’

दशरथ मांझी के गांव जाते हुए तबाह पहाड़ियां दिखीं, जिन्हें लगातार डायनामाइट से नष्ट किया जा रहा है। गया की पहचान हैं बिना पेड़ के पहाड़, बिना पानी की नदियां, पंडे और पिंड। उन नष्ट होती पहाड़ियों ने मुझे अपने साथ के रिश्तों की यादों के कोलाज के बीच खड़ा कर दिया। विष्णुपद इलाके में रहते हुए मैं और मेरे एक दोस्त अक्सर श्मशान घाट पर बैठते। जलती चिताओं को देखते, फिर उतर जाते फल्गू नदी में। लक्ष्य होता था सामने पहाड़ का एक टीला। टीले के पास की नदी को सीता कुंड कहा जाता है और उसके ऊपर एक मंदिर बना है, जहां पत्थर से बनी कलाकृति में दशरथ के एक हाथ पर पिंड दर्शाया गया है। मिथ है कि सीता ने यहां राम की अनुपस्थिति में दशरथ को पिंड दान किया था, लेकिन राम को विश्वास नहीं हुआ। सीता के गवाह भी एक-एक कर मुकरते गए। क्रुद्ध सीता ने उन गवाहों को शाप दे दिया, जिससे इस शहर की नदी, पहाड़ आदि के चरित्र तय हुए। यहां मैं चूंकि पहाड़ों को याद कर रहा हूं, इसलिए किसी धार्मिक मन को दुखी नहीं करना चाहूंगा, इन मिथों की कोई स्त्रीवादी व्याख्या करके। इस विस्तृत व्याख्या में भी जाने का अवसर नहीं है कि कैसे बौद्ध धर्म के खिलाफ वैष्णव उल्लास (आतंक नहीं कह रहा हूं) के प्रतीक हैं विष्णुपद, उसके आसपास के इलाके और उससे जुड़े मिथ!

हम दोनों मित्रों का श्मशान घाट के बाद का अगला पड़ाव होता था ब्रह्मयोनी पहाड़। उस पर हम चढ़ते तो थे उस पर बनी सीढ़ियों से, लेकिन उतरते थे पत्थरों से गुजरते हुए जो पास के किसी गांव में उतार ले जाते। वहां से चल कर हम पहुंचते थे मंगला गौरी की पहाड़ी पर जो अब पहाड़ी कम, मंदिर ज्यादा है। मिथ है कि वहां सती के स्तन कट कर गिरे थे, विष्णु के


चक्र से। इसी संदर्भ में नीलिमा सिन्हा की कहानी ‘मंगलागौरी’ याद आती है।

गया के करीब जहानाबाद जिले में अपने गांव से जब भी मैं शहर में दाखिल होता था तो शहर की सीमा पर प्रेतशीला-रामशीला पहाड़ स्वागत करते थे। यादों के इस कोलाज में एक प्रसंग है, गया-नवादा मार्ग पर कटते पहाड़ों के एक टीले पर हंगरी की कुख्यात कविता ‘ग्लूमी संडे’ का पाठ। यहां से गुजरते हुए दशरथ मांझी के घर जाया जाता है। हम तब ‘कादंबिनी’ में ‘ग्लूमी संडे’ के बारे में छपी एक रपट को पहाड़ पर बैठ कर पढ़ रहे थे, जिसके मुताबिक कई लोग इस कविता को पढ़ते हुए या पढ़ कर आत्महत्या कर चुके हैं। खुद इसके कवि ने भी रचना के कई साल बाद आत्महत्या कर ली थी। हालांकि यह सिद्ध नहीं है कि वे आत्महत्याएं इसी कविता के पाठ के कारण हुई थीं। बीबीसी ने इस कविता के प्रसारण को कुछ दिनों के लिए रोक दिया था।

खैर, पत्रिका में इस कविता का अंश छपा था। हमने उसे पढ़ कर खत्म किया ही था कि ‘भागो’ की आवाज आई। दरअसल, वहां पहाड़ डायनामाइट से उड़ाया जाना था और कोई हमें चिल्ला कर कह रहा था कि भागो, पत्थर उड़ाए जाने वाले हैं। हम जान बचा कर भागे। मजदूरों के लिए बने एक शेड तक हमारे पहुंचते ही विस्फोट शुरू हो गए। पत्थर का एक टुकड़ा भी हमारी मौत का इंतजाम कर देता। बहुत दिनों तक हम मित्र हंसते थे कि ‘ग्लूमी संडे’ पढ़ने के बाद आत्महत्या से तो नहीं, लेकिन पत्थरों से हमारी जान जरूर चली जाती।

दशरथ मांझी के घर जाते हुए इन यादों के कोलाज से एक सवाल बनता है कि उनके बनाए रास्ते के लिए उमड़ते लोग क्यों नहीं इन खत्म होते पहाड़ों के बारे में सोचते हैं! दशरथ मांझी और उनका परिवार इन्हीं पहाड़ों में पले-बढ़े। ये पहाड़ उस इलाके के जीवन हैं।


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