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वक़्त की नब्ज़ : आलोचना की आतुरता PDF Print E-mail
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Sunday, 29 June 2014 10:59

altतवलीन सिंह

जनसत्ता 29 जून, 2014 : चलो जी, तय हो गया अभी से कि अच्छे दिन कभी नहीं आएंगे। ऐसा कह रहे हैं इस देश के सबसे जाने-माने राजनीतिक पंडित। कई हफ्ते गायब रहने के बाद अचानक ये लौट आए हैं मैदान में। चुनाव नतीजे जिस दिन आए ये पंडित अदृश्य हो गए थे। इनके साथ अदृश्य हुए कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता। हारे हुए सांसद और उनके वामपंथी हमसफर। लेकिन अब वापस आ गए हैं।

टीवी पर पहली बार तब प्रकट हुए ये लोग जब रेल मंत्री ने किराए बढ़ाए और ऐसा हल्ला मचाया इन्होंने कि रेल मंत्री को सफाई देनी पड़ी कि उन्होंने उस फैसले पर अमल किया है जो पिछली सरकार ने किया था। अगर मंत्री जी यह कहकर अपने आलोचकों को चुप कराना चाहते थे तो वे असफल रहे। हल्ला मचा रहा। ‘कहां गए अच्छे दिन? आ गए क्या। कहा था न हमने कि मोदी जनता को बेवकूफ बना रहे थे चुनाव प्रचार के दौरान।’

इस बात को सबसे ज्यादा दोहराया माकपा के प्रवक्ताओं ने जिनकी नजरों में चीन जन्नत बन चुका है। चीन की रेल सेवाओं की तारीफ करते नहीं थकते हैं कभी और तुलना करते हैं भारत की टूटी-पुरानी रेल सेवाओं के साथ। क्योंकि इनका दिल थोड़ा सा चीनी है तो वहां से लौट कर बड़े गर्व से कहते हैं कि चीन में रेलगाड़ियां तीन सौ किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार पर चलती हैं। इस बात को भूल जाते हैं जानबूझ कर कि भारत में भी शायद हम इस तरह की रेलगाड़ियां लाए होते अगर हमने उसी वक्त आधुनिकीकरण किया होता रेल सेवाओं का जब चीन ने किया था। किराए नहीं बढ़ाएंगे तो आधुनिकीकरण कैसे होगा?

बात रेल सेवाओं की नहीं है। बात है प्रधानमंत्रीजी के आलोचकों के हौसले बुलंद होने की। नया जोश आ गया है उनमें। इतना कि जब भी कोई मंत्री गलत बयान दे देता है या कोई दूसरी गलती करता है तो फौरन टीवी पर हो-हल्ला मचने लगता है। वे सारे चेहरे नजर आने शुरू हो जाते हैं जो शुरू से मोदी के आलोचक रहे हैं। इनमें कई टीवी पत्रकार भी हैं। सो जब तारीफ लायक कुछ करते हैं प्रधानमंत्री उसका जिक्र कम होता है। 

सो प्रधानमंत्री ने जब लोकसभा में अपना पहला भाषण दिया ऐसा लगा कि मेरे मीडिया बंधुओं ने न सुना, न देखा। न इस भाषण की तारीफ हुई न विश्लेषण बावजूद इसके कि इस भाषण से प्रधानमंत्री ने एक नई आर्थिक और राजनीतिक दिशा दिखाने का काम किया। पिछले दस वर्षों में इतना अच्छा भाषण लोकसभा में सुनने को नहीं मिला था। अब सुनिए कि ऐसा क्यों हो रहा है। क्यों नए प्रधानमंत्री को देश के लिए कुछ अच्छा करने का मौका नहीं देना चाहते हैं कुछ लोग? चुनाव प्रचार में उन्होंने जनता से मांगे थे 60 महीने यह कह कर कि कांग्रेस को 60 वर्ष दिए गए हैं सो 30 दिनों में क्यों मोदी को नाकाम करार दिया गया है? 

इसलिए कि मेरे कई पत्रकार बंधु ऐसे हैं जो खुद को धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार मानते हैं। उनकी नजरों में मोदी सांप्रदायिकता के प्रतीक हैं। अगर अगले पांच सालों में हिंदू-मुसलिम दंगे नहीं होते हैं बड़े पैमाने पर


देश भर में तो ये लोग निराश हो जाएंगे क्योंकि उन्हें मोदी से कोई और उम्मीद नहीं है। इसलिए उन्हें सांप्रदायिक साबित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा जाता है। 

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिन बाद पुणे में एक शर्मनाक घटना घटी जिसमें एक मुसलिम युवक को हिंदू कट्टरपंथियों ने सरेआम मार डाला। इस बेगुनाह को मारने से पहले हत्यारों की भीड़ लाठियां लिए मोटरसाइकिलों पर शहर में घूमती, मुसलमानों के खिलाफ नारे लगाती दिखी। लेकिन पुलिसवालों ने इन्हें नहीं रोका। इस लापरवाही की जिम्मेदारी महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार की होनी चाहिए। लेकिन इसका भी दोष प्रधानमंत्री के सिर थोपा गया। 

क्यों नहीं प्रधानमंत्री कुछ बोले जब यह हादसा हुआ? क्यों नहीं उस समय कुछ बोले जब बदायूं में उन बच्चियों की निर्मम हत्या की गई? क्यों नहीं अपने उस मंत्री को बर्खास्त किया जिसके खिलाफ राजस्थान की एक महिला ने बलात्कार का मुकदमा दर्ज कराया। क्यों नहीं प्रधानमंत्री दिल्ली विश्वविद्यालय में हो रहे विवाद पर कुछ बोले हैं? हाल यह है कि अगर बरसात नहीं आती है अगले कुछ दिनों में तो इसका भी दोष प्रधानमंत्री पर लगाया जाएगा।

ऐसा लगने लगा है कि राजनीतिक पंडितों ने ठान लिया है कि क्योंकि लोकसभा में विपक्ष तकरीबन खत्म है तो उन्हें इस भूमिका को निभाना पड़ेगा। सो, जहां सोनियाजी अपने कुछ दोस्तों के साथ पहाड़ों में छुट्टियां मना रही हैं और उनके बेटे भी इन तमाम विवादों से दूर चले गए हैं कहीं उनकी जगह ले ली है राजनीतिक पंडितों ने। इस भूमिका को इतनी गंभीरता से निभा रहे हैं कि इस देश के राजनीतिक इतिहास में पहली बार किसी प्रधानमंत्री को उनके शासनकाल के पहले महीने में ही नाकाम साबित करने की कोशिश की गई है। इन लोगों ने तब अपना मुंह नहीं खोला जब सोनियाजी की सलाहकार समिति ने ऐसे फैसले किए जिनका सीधा बुरा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा। ये लोग मोदी की सरकार को मोहलत देने को तैयार नहीं हैं। सो, प्रधानमंत्री को विनम्रता से मैं यह नसीहत देना चाहूंगी कि इनकी बातों की परवाह न करें और उन चीजों पर ध्यान दें जो वास्तव में उनके अच्छे दिनों के सपने को बर्बाद कर सकती है। मिसाल के तौर पर देहातों में अभी से बरसात के न आने की तैयारी होनी चाहिए क्योंकि बरसात के न आने से प्रभावित होते हैं वे लोग जिन्होंने कभी अच्छे दिन नहीं देखे हैं।


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