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मतांतर : जाति और धर्म की राजनीति PDF Print E-mail
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Sunday, 29 June 2014 10:55

गंगा सहाय मीणा

तुलसीराम ने ‘दलित जातिवादी राजनीति बनाम हिंदुत्व’ (जनसत्ता, 25 मई) शीर्षक से महत्त्वपूर्ण लेख लिखा। बहुजन समाज पार्टी और मायावती को केंद्र में रख कर दलित राजनीति का इतना बृहद विश्लेषण शायद ही पहले किसी ने किया हो। उन्होंने बड़ी बारीकी से चीजों को समझाते हुए दलित राजनीति की सीमाओं पर प्रकाश डाला। साथ ही उन्होंने दलित राजनीति की छत्रछाया में पलते हिंदुत्व की पहचान कर दोनों के महीन रिश्तों की पड़ताल की। जैसी कि अपेक्षा थी, सामाजिक न्याय की राजनीति से घृणा करने वाले तबके की तुलसीरामजी द्वारा दलित राजनीति की आलोचना पढ़ कर बांछें खिल गर्इं और जैसे ही बात हिंदुत्व पर आई तो उन्हीं को निशाना बना दिया। इसी का प्रमाण है कृष्णदत्त पालीवाल की टिप्पणी- ‘जातिवाद का भंवर’ (8 जून)।

हाल में हुए आम चुनावों के बारे में तुलसीराम का निष्कर्ष है: ‘‘भाजपा ने धर्म और जाति, दोनों का इस्तेमाल बड़ी रणनीति के साथ किया, जिसके पीछे वह चालाकी से ‘विकास’ की बात करके जनता को भ्रमित करने में सफल रही, जबकि असली मुद्दा धार्मिक ध्रुवीकरण का ही था।’’ तुलसीराम ने विभिन्न तर्कों और तथ्यों के माध्यम से तमाम राजनीतिक दलों द्वारा धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण की कोशिशों का पर्दाफाश किया है। पालीवालजी जैसे लोगों को अन्य दलों के साथ भाजपा का भी नाम लिए जाने से आपत्ति होती है। वे कहते हैं: ‘‘भाजपा ने हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर चुनाव नहीं लड़ा... जनता ने हिंदू-मुसलिम, अगड़ी-पिछड़ी जातियों की तोड़ने वाली राजनीति से हट कर एक क्रांतिकारी परिवर्तन का संदेश दिया।’’ वे अपने लेख में इसी बात को बार-बार दुहराते हैं। ऐसा मानने वाले कृष्णदत्त पालीवाल अकेले नहीं हैं। 

बसपा, सपा और जद (एकी) के सीटें न जीत पाने को मीडिया द्वारा भी इसी तरह प्रस्तुत किया गया कि अब जाति की राजनीति के दिन लद गए। जबकि यह सच नहीं है। जहां तक जाति की राजनीति का सवाल है, भाजपा हमेशा से ऊंची जातियों और हिंदुत्व की राजनीति करती रही है, उसने इस बार भी की। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि विमर्शकारों को भाजपा जाति और धर्म की राजनीति करती नहीं दिखती, जबकि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दलों पर हमेशा जातिवादी राजनीति करने का आरोप लगाया जाता रहा है। 

जिन्होंने भी इस बार के चुनाव पर ठीक से नजर रखी, वे जानते हैं कि यह चुनाव जाति और धर्म की राजनीति से मुक्त नहीं था। तमाम दलों ने जाति और संप्रदाय के आधार पर ध्रुवीकरण का प्रयास किया, लेकिन इसमें सबसे ज्यादा सफलता भाजपा को मिली। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि खुद को सांस्कृतिक संगठन कहने वाले हिंदुत्ववादी ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया और भाजपा में अपनी बात मनवा ली। पूरी चुनाव प्रक्रिया में संघ के कार्यकर्ताओं ने भाजपा के लिए जम कर प्रचार किया। 

संघ की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की धारणा से हम सभी परिचित हैं। शायद इसीलिए चुनाव जीतते ही भाजपा ने कश्मीरी पंडितों और दूसरे देशों में अल्पसंख्यक के रूप में रह रहे हिंदुओं की चिंता शुरू कर दी, मानो भारत हिंदू-राष्ट्र हो, जिसका प्रधान कर्तव्य हिंदू हितों की रक्षा करना हो! दूसरे देशों के अल्पसंख्यकों की चिंता करने वाले दल को सबसे पहले अपने देश के अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों की चिंता करनी चाहिए, जिन्हें उनके अधिकारों से लगातार वंचित किया गया और अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है। भाजपा ने यह चुनाव संघ की अगुआई में लड़ा। खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा के उम्मीदवारों का चयन करने वाली चुनाव समिति में भाग लिया। 

नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषणों और उनके प्रिय अमित शाह को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाए जाने का विश्लेषण करें तो काफी कुछ स्पष्ट हो जाएगा। विकास के नाम पर शुरू हुए भाजपा के चुनाव प्रचार में फैजाबाद पहुंचते-पहुंचते राम मंदिर की आकांक्षा शामिल हो गई, जिसका प्रमाण फैजाबाद में मोदी की सभा में प्रस्तावित राम मंदिर की तस्वीर लगाना है। क्या इसे ध्रुवीकरण नहीं


कहा जाएगा? जैसे-जैसे चुनाव की आखिरी तारीख नजदीक आने लगी और सबका ध्यान पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर टिक गया, भाजपा ने धर्म और जाति के नाम पर वोटों का ध्रुवीकरण करने की पूरी कोशिश की। इसी इलाके में आकर सामाजिक न्याय की राजनीति को चुनौती देने के लिए नरेंद्र मोदी ने जाति का कार्ड खेला। प्रियंका गांधी की एक टिप्पणी का जवाब देते हुए जब मोदी ने यह कहा कि ‘सामाजिक रूप से निचले वर्ग से आया हूं, इसलिए मेरी राजनीति उन लोगों के लिए नीची राजनीति है’, तो दरअसल उन्होंने सपा और बसपा के वोटों का जाति-आधारित ध्रुवीकरण करनी चाही, और ऐसा हुआ भी। 

इसी तरह पूरे चुनावों के दौरान पल-पल दोहराया जाने वाला नरेंद्र मोदी के पक्ष में भाजपा का ‘गंगा ने बुलाया है’ विज्ञापन याद कीजिए। नरेंद्र मोदी को बनारस से चुनाव लड़ने और गंगा को एक प्रतीक की तरह इस्तेमाल करने को क्या कहेंगे! चुनाव जीतने के बाद उनके बारे में पहली खबर आई कि फलां तारीख को वे गंगा आरती के लिए जाएंगे। गंगा आरती और बनारस की गलियों में गूंजने वाला ‘हर-हर मोदी’ का नारा क्या सेक्युलर कहा जा सकता है? 

तुलसीराम ने अपने लेख में ठीक ही रेखांकित किया कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली पार्टियां मुसलिम तुष्टीकरण की कोशिश में लगी रहीं, जिसके फलस्वरूप भाजपा के पक्ष में हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हुआ। साथ ही जिन दलित और पिछड़ी जातियों तक सामाजिक न्याय की राजनीति का प्रकाश नहीं पहुंचा, वे निराश होकर संघ के प्रयासों से हिंदुत्व की ओर मुड़ीं और उन्होंने जम कर भाजपा को वोट दिया। यानी भाजपा ने शेष दलों की तुलना में ज्यादा चालाकी से जाति और संप्रदाय के आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण किया। चुनाव से पहले होने वाले दंगे भी वोटों के ध्रुवीकरण के लिए कराए जाते हैं। चुनाव विश्लेषक बताते हैं कि लोकसभा चुनाव और पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के साथ-साथ तीन दर्जन और दंगे हुए, मध्यप्रदेश के इंदौर और हरदा में, बिहार के नवादा और बेतिया में, जम्मू के किश्तवाड़ और असम के सिलचर में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुर्इं। 

इस तथ्य को पढ़ कर अनायास गोरख पांडेय की कविता की ये पंक्तियां याद आती हैं, ‘इस बार दंगा बहुत बड़ा था/ खूब हुई थी/ खून की बारिश/ अगले साल अच्छी होगी/ फसल/ मतदान की।’ इन दंगों में हाथ कई पार्टियों का रहा, लेकिन लाभ एक पार्टी को ज्यादा मिला। 

भाजपा ने उदित राज और रामविलास पासवान जैसे नेताओं से हाथ मिला कर दलित मतदाताओं को लुभाया। क्या यह महज संयोग था कि बाबा रामदेव ने दलित स्त्रियों के खिलाफ आपराधिक बयान दिए और उनके बचाव में दशकों से दलित राजनीति कर रहे उदित राज को उतारा गया? इस आम चुनाव में भाजपा के पक्ष में मुख्य रूप से ऊंची जातियों का ध्रुवीकरण हुआ, पर कुछ इलाकों में दलित और पिछड़ी जातियों का भी। हिंदुत्व भी चुनाव के इर्द-गिर्द घूमता रहा। 

काश, तुलसीराम की तरह आत्मालोचन का साहस कृष्णदत्त पालीवाल भी कर पाते और भारतीय राजनीति में धर्म और जाति के नए अवतार को समझ पाते, जो ‘विकास’ की खाल ओढ़ कर आया है।


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