मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
पुस्तकायन : समाजवाद की विरासत PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Sunday, 29 June 2014 10:41

अरुण चतुर्वेदी

जनसत्ता 29 जून, 2014 : भारत के समाजवादी आंदोलन को एक नई समझ से देखने, उसकी विरासत, विचारधारा और विमर्श को समझने की दृष्टि हाशिए पर पड़ी दुनिया पुस्तक देती है। इसमें बालकृष्ण गुप्त की यादों, विचारों और योगदान के माध्यम से समाजवादी चिंतनक्रम को समझने का प्रयास किया गया है। रवि राय ने अपनी भूमिका में बालकृष्ण गुप्त पर भावपूर्ण, पर महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की है। रवि राय भारतीय समाजवादी आंदोलन और विचार के प्रमुख स्तंभ रहे हैं। 

यह पुस्तक संस्मरण और बालकृष्ण गुप्त के लेखन पर आधारित है, जिसे इसके संपादकों- सारंग उपाध्याय और अनुराग चतुर्वेदी- ने पांच खंडों में बांटा है: ‘संस्मरण’, ‘हाशिए पर पड़ी दुनिया’, ‘बुद्धिजीवी, नेहरू, लोहिया और वामपंथ’, ‘बिड़ला, गोयनका और अंधी योजनाएं’ और ‘दस्तावेज’। 

पुस्तक के पहले खंड- ‘संस्मरण’ में सात संस्मरण हैं, जो बालकृष्ण गुप्त के परिवार के सदस्यों के हैं। इनमें सबसे रोचक और दृष्टि-संपन्न अनुभव विद्यासागर गुप्त के हैं ‘भाई साहब और डॉक्टर साहब’। 

राममनोहर लोहिया और बालकृष्ण गुप्त के संबंधों की शुरुआत 1926 में हुई। इन दोनों का यूरोप प्रवास आसपास का है। लोहिया 1929 में जर्मनी गए थे और बालकृष्ण 1931 में लंदन। दोनों ने जिनेवा सम्मेलन, 1933 में साथ खड़े होकर नारे लगाए और भारत में हो रहे ब्रिटिश अत्याचारों पर परचे बांटे। 

दूसरा खंड अंतरराष्ट्रीय बदलावों पर है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भारी बदलाव हुए, जिनमें यूरोपीय साम्राज्यवादी शक्तियों का अंत, अमेरिका-रूस के बीच शीतयुद्ध और एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिकी देश में स्वतंत्रता प्रमुख है। इस नए बदलाव को बालकृष्ण ‘हाशिए पर पड़ी दुनिया की दो-तिहाई रंगीन आबादी’ आलेख में स्पष्ट करते हैं। इनके खिलाफ षड्यंत्र की बात को वे उठाते हैं और इनके संघर्ष और स्वरूप भी स्पष्ट करते हैं। बालकृष्ण नए साम्राज्यवाद को परिभाषित करते हुए लिखते हैं: ‘अमेरिका और रूस में औद्योगिक प्रतिष्ठान अधिकाधिक एक जैसे ही होते जा रहे हैं। बड़ी-बड़ी अमेरिकी कंपनियों और रूस के बड़े-बड़े सरकारी संस्थानों का ढांचा एक जैसा होता जा रहा है... दोनों शुद्ध फायदे और लाभ की बात सोचते हैं... अमेरिका में लोभी पूंजीवाद सेठ और रूस में रूढ़ि कट्टरवादी कम्युनिस्टों की जगह व्यावहारिक प्रबंधक लेने लगे हैं।’ इस लेख में उनकी चिंताएं उस समय की तीसरी दुनिया के विचारकों जैसी हैं, जो बदलावों की व्याख्या कर रहे थे। 

बालकृष्ण इस पुस्तक में पुरानी यादों में खोए हैं, जब उन्होंने ‘रहस्यपूर्ण इंग्लैंड’ का वर्णन किया है। लंदन पर एक टिप्पणी है ‘यह शहर दुनिया की सांस्कृतिक विविधताओं का ऐसा चलता-फिरता म्यूजियम बन पड़ता है कि यकीन नहीं होता कि आप किसी देश की राजधानी में घूम रहे हैं या फिर दुनिया के विशाल शहर में... वह पूरी दुनिया की राजधानी बन गया है।’ यह लेख अपने अलग तेवर के लिए याद किया जा सकता है। इस खंड में ‘इस्लामी दुनिया और तेल’ का सियासी षड्यंत्र’, इंग्लैंड की बेरोजगार सड़कें, इटली, मास्को की एक जेल, बदलते रूस में साकार होता साम्यवाद, सोवियत यूनियन का सातवां सूर्योदय। रूस की चिट्ठी और यूनान: एक इतिहास का भविष्य, लेख है, जो उनकी विश्व समझ को स्पष्ट करते हैं। 

तीसरा खंड भारत की राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़े लेखन का है। इसके अंतर्गत ‘भारतीय बुद्धिजीवी’ लेख में बालकृष्ण उन्हें बुद्धिजीवी, विद्वान और विचारक स्वीकार करते हैं, जो सतत चिंतन और मंथन द्वारा समाज का विश्लेषण करते हैं, न कि सिर्फ दूसरों के ज्ञान और अनुभव की गहरी जानकारी से विख्यात होना चाहते हैं। इस क्रम में वे उच्च अंक प्राप्त करने वाले को बुद्धिजीवी नहीं मानते, न ही राज्याश्रित होने की आकांक्षा लिए लोग बुद्धिजीवी हैं। भारतीय संदर्भ में हिमालय की गुफाओं में रहने वाले ‘साधु’ बुद्धिजीवी नहीं हैं, क्योंकि समाज के लिए उसका विशेष अर्थ नहीं है। गांधी और कृष्ण को वे बुद्धिजीवी मानते थे, क्योंकि वे समाज में बदलाव को प्रेरित करते थे। उनकी परिभाषा में जयप्रकाश नारायण और विनोबा नेहरू सरकार के गैर-सरकारी समर्थक मात्र हैं, जो आमूल सामाजिक बदलाव की मांग नहीं करते। 

‘कांग्रेस पार्टी’ पर महत्त्वपूर्ण विचार इस लेख में अभिव्यक्त है। पहले चरण में सालाना जलसों के लिए कांग्रेस जानी जाती थी, जिसमें देश की दुर्दशा पर आंसू बहाने के साथ कुछ मांगों का उल्लेख होता था और शासकीय जमात में हिस्सा हो, यह चाहना थी। गांधी, नेहरू और पटेल पर टिप्पणी में बालकृष्ण यह मानते हैं कि नेहरू के लिए जर्मन


और इतालवी फासिज्म ब्रिटिश साम्राज्यवाद में अधिक खतरनाक था, जबकि गांधी और पटेल का आग्रह ब्रिटिश साम्राज्य को हटाने का था। 1967 में बालकृष्ण की यह इच्छा थी कि विरोधी दलों को सीटों का बंटवारा कर कांग्रेस को ऐसी चुनौती देनी चाहिए कि जिस बहुमत ने उसे पागल बना दिया, वह समाप्त हो जाए और भूखी-नंगी जनता को मुक्ति मिले। 

बालकृष्ण बंगाल को बहुत अच्छी तरह समझते थे और उनकी बंगाल की राजनीति और समाज की पकड़ उनके लेख ‘वामपंथी बंगाल’ से समझ में आती है। इस खंड में नेहरू के नवरत्न, नेहरू के रहते क्या, भारत के राजनीतिक कार्यकर्ता, डॉ. राममनोहर लोहिया, कलकत्ता, काली चमड़ी गोरा राज, सोशलिस्ट पार्टी और सत्याग्रह तथा भारत की विदेश नीति पर लेख हैं, जो उनके समाजवादी सोच और चुटीली भाषा के लिए याद किए जा सकते हैं। 

‘बिड़ला, गोयनका और अंधी योजनाएं’ किताब का चौथा खंड है। यह भारत की आर्थिक नीतियों के विश्लेषण से जुड़ा है। ‘बिड़ला रहस्य’, बिड़ला समूह का औद्योगिक साम्राज्य के विस्तार को समझने में सहायक है। इस संदर्भ में बालकृष्ण की यह टीप एक दृष्टि अवश्य देती है: ‘अपने बढ़ते व्यापार और ऊंचे उठते उद्योग धंधों की तरक्की के लिए भी बिड़ला को अपनी महत्त्वाकांक्षा फलीभूत होती नजर आती थी, इसलिए बिड़लाजी हर महीने, हर साल वायसराय, गवर्नरों, ब्रिटेन के इंडिया सेके्रटरी, प्रधानमंत्री और अन्य प्रभावशाली ब्रिटिश राजनीतिकों से मिलते रहते थे... और यह भावना पैदा करने की कोशिश करते थे कि घनश्यामदास बिड़ला अंगरेजी राज का सच्चा दोस्त है और अंगरेजी राज को भारत में महात्मा गांधी से एक स्थायी और मजबूत समझौता करना जरूरी है... लेकिन बिड़ला ने कभी विद्रोह का बिगुल नहीं बजाया।’ उद्योग घरानों और राजनीतिक संबंधों को स्पष्ट करने वाले अन्य लेख हैं ‘बिड़ला और मथाई’ और ‘करोड़पति गोयनका’, ‘अमेरिकी पूंजी और कार्बन के काले शेयर’। 

इसी खंड में भारत सरकार की औद्योगिक नीति पर लेख है, जो बालकृष्ण की आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी है। जनवरी 1964 में लिखा ‘कानी सरकार अंधी योजनाएं’ भारतीय नियोजन पर बालकृष्ण की तल्ख प्रतिक्रिया है, जिसका आरंभ वे योजना भवन को नेहरू युग की भद्दी निर्माण पद्धति कह सकते हैं और उन्हें आपत्ति है: ‘योजना आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्री और सदस्यों में कोई भी हरिजन, आदिवासी और शूद्र नहीं, सबके सब उस स्थापित उच्च वर्ग के लोग हैं, जिसको नीचे के लोगों की कोई चिंता नहीं।’ 

उन्हें बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और वितरण प्रणाली पर चिंता है। हिंदुस्तान के शिक्षित युवा यूरोप जा रहे, यह उन्हें अनुचित लगता है। भारत में राष्ट्रीयकरण और समाजवाद पर उनका मत रहा है ‘दोनों का मजाक ही नहीं कटु आलोचना का विषय बन गए हैं। राजनीतिक प्रभुत्व का इस्तेमाल कर आलोचना-प्रत्यालोचना की बहस सिर्फ तानाशाही मुल्कों में बंद की जा सकती है, जनतंत्रों में नहीं।’ उनकी यह सलाह उचित लगती है कि जब तक आदमी को आदमी नहीं माना जाता, तब तक सारी चीजें हवा में ही तैरती रह जाएंगी। इस खंड के अन्य लेख हैं: बिड़ला और मथाई, करोड़पति गोयनका, अमेरिकी पूंजी और कार्बन के काले शेयर, भारतीय चीनी व्यापार, मुद्रास्फीति और चोर-बाजारी। 

पुस्तक का अंतिम खंड ‘दस्तावेज’ है, जिसमें सत्ता से दूर रह कर आंदोलन पर ही नजर रही। राज्यसभा में बालकृष्ण गुप्त, दो अधलिखी कहानियां, खोज परिषद- एक परिचय, सोशलिस्ट पार्टी पूर्णिया का चुनावी पर्चा और ‘दिनमान’ में श्रद्धांजलि सम्मिलित है।

हाशिए पर पड़ी दुनिया: बालकृष्ण गुप्त, सं.- सारंग उपाध्याय और अनुराग चतुर्वेदी; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 600 रुपए। 


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta



आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?