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पुस्तकायन : प्रेम, प्रकृति और विद्रोह PDF Print E-mail
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Sunday, 29 June 2014 10:38

कौमुदिनी मकवाड़ा

जनसत्ता 29 जून, 2014 : किसी भी भारतीय भाषा में संभवत: यह पहली बार हुआ है कि किसी एक कवि की विद्रोही क्षेत्रों से संबंधित कविताओं का स्वतंत्र संकलन आया है। श्रीप्रकाश मिश्र की पुस्तक मिअमाड़ में मिजोरम, असम, मेघालय और अबूझमाड़ से जुड़ी कविताएं संकलित हैं। वे इन इलाकों में लंबे समय तक रहे हैं। इसलिए वे वहां की जीवन-छवियों और लोगों के राग-विराग से खूब वाकिफ हैं। कविताओं में उन पक्षों की प्रस्तुति प्रामाणिक और आकर्षक है। 

मेघालय में खासी, बंगाली और पछीमा लोगों में तनाव के बावजूद अपेक्षाकृत शांति बनी रहती है। इसका असर यहां संकलित चौदह कविताओं में देखने को मिलता है। ये कविताएं किसी क्रांति, विद्रोह या मार-काट की बात न कर प्रेम और प्रकृति की बात करती हैं। वे सीधे स्थिति की बात करती हैं। कवि की कल्पना की अपनी विशेषता स्पष्ट होती है। पहली कविता का आरंभ इस तरह है: ‘मांसपेशियां अंधेरे की/ हमारी बर्फीली निरी बर्फीली/ हड्डियों पर छा जाती हैं/ तूफानी हवा के विगुल पर/ कवायद कर रहे जंगल के/ पार्श्व में जब डूबता सूरज/ चूम रहा होता है/ माघी बरसात को।’

संग्रह की एक कविता में कवि की फैंटेसी इस तरह उभरती है: ‘उस अंधेरे में मैं आगे बढ़ा/ और अजनबी बन गया/ मन के ऊतकों से डोर बनाई/ और हवा में टंग गया/ जिन्होंने भी आसमान की ओर/ दृष्टि डालने की कार्रवाई की/ अपनी दृष्टि के जाल में मुझे फंसाया/ उनमें से कुछ ने कहा: भूत-भूत/ कुछ ने कहा: दूत-दूत/ आदमी किसी ने नहीं कहा।’ पर तनाव तो है ही। इस दृष्टि से ‘नए दिन का भिनसार’ कविता भी द्रष्टव्य है, जहां खरगोश के पीछे कुत्ते लग जाते हैं। 

इससे अधिक उग्र असम संबंधी कविताएं हैं। वहां एक तरफ असमिया लोगों का बंगाली लोगों से, खासकर बांग्लादेश से भाग कर आए लोगों से लगातार तनाव बना रहता है, तो दूसरी तरफ कोकराझार जैसे इलाकों में आदिवासी ‘बड़’ लोगों का बांग्लादेश से आए बिहारी मुसलमानों से तनाव बना रहता है। असम अपने अधिकांश में मैदानी जनजातियों का देश है। उनमें आपस में हर समय तनाव बना रहता है और आए दिन जातीय हिंसा होती रहती है। उसकी अनुगूंज असम संबंधी तमाम कविताओं में है। 

पर ऐसा नहीं है कि वे हिंसा केंद्रित कविताएं मात्र हैं। मानव मन की छुअन वहां भरपूर है। एक लंबी कविता ‘बचपन में मैं’ तो बाल-मन की उत्सुकता को लेकर चलती है और तमाम बिंबों से गुजर कर एक निश्छल परिणति प्राप्त करती है। मसलन: ‘आम्दो के जंगल-तालों में पकड़ते ब्रह्मणी बत्तख/ और सुनहरी आंखों वाली कैंसा/ जारो, आपातानी कन्या से करते प्यार/ खिलखिलाते, झगड़ते, दौड़ते, डूब जाते/ बंगाल की खाड़ी में/ बांग्लादेश की मैदानी हरियाली से खिसक कर।’

मिजोरम संबंधी कविताएं बड़ी सशक्त हैं। वहां बीस वर्षों से अधिक समय तक विद्रोह और उसे दबाने के लिए सरकार की कार्रवाई चलती रही। कवि की पक्षधरता विद्रोहियों की तरफ है। ये कविताएं दरअसल श्रीप्रकाश मिश्र के उपन्यास ‘जहां बांस फूलते हैं’ के परिशिष्ट रूप में हैं। उन्हें वहां देख कर एक समीक्षक ने उनकी तुलना तब बोरिस पास्तरनाक के ‘डॉ. जिवागो’ संबंधी कविताओं से की थी। ऐसी कविताओं के सपाट बन जाने का खतरा बना रहता है, पर श्रीप्रकाश मिश्र ने उन्हें अद्भुत काव्य संतुलन में साधा है। एक अंश देखें: ‘मैं अपने गांव की धरती पर पांव रखते ही/ अनार के पौधे में रूपायित हो जाता हूं/ जैसे ही कोई फल तोड़ना चाहता है/ अंगार बन गिर पड़ता हूं जमीन पर/ जब कोई मेरा हृदय चीर कर दाने निकालता है/ लहू के कतरों में तब्दील हो जाता हूं/ लेकिन यह तो कोई परीकथा है/ या मैं कायर


हूं, सिर्फ सपने देखता हूं।’

लंबे-लंबे विवरणों में उकेरे गए काव्य-बिंब अद्भुत हैं और बड़ी गहरी बात करते हैं। इस मामले में इस खंड की कविता संख्या एक, दो, तीन, चार, और पांच विशेष रूप से पठनीय हैं। अब तो मिजोरम में शांति है। पर इन कविताओं से वह भिड़ंत-युग एक बार आंखों के सामने उपस्थित हो जाता है। 

सबसे आकर्षक कविताएं अबूझमाड़ शृंखला की हैं। संभवत: इसलिए कि वहां लड़ाई अब भी चल रही है। अखबारों से वहां की हर दिन की खबरें हमें मिलती रहती हैं। स्थानीय लोगों के प्रति कवि की संवेदना और पक्षधरता इन कविताओं के पीछे काम करती दिखती है। एक कविता है ‘नागवंश की कथा’ जो बीस पन्नों की है। यह सृष्टि के आदि से लेकर आज तक की कथा एक गाथा की तरह प्रस्तुत करती है, जिसमें मिथकों से पचासों उद्धरण हैं। उससे जाहिर होता है कि किस तरह सूर्यवंशियों, चंद्रवंशियों और नागवंशियों की उत्पत्ति एक ही स्रोत से हुई और किस तरह आपस में संबंध के बावजूद नागवंशियों को जंगल में खदेड़ दिया गया, उन्हें दैत्यों और असुरों के समतुल्य बना दिया गया। 

यह प्रक्रिया प्रागैतिहासिक काल में भी जारी रही और मुसलिम और अंगरेज शासकों से होती हुई आज जनतांत्रिक शासन प्रणाली तक चली आई है और उनसे अधिक खतरनाक हो गई है। जब जल, जमीन और जंगल छीनने के दौरान उन्हें अपने वतन से बहिष्कृत किया जा रहा है, उनके नेताओं को मार दिया जा रहा है। कविता का अंत इस प्रकार है: ‘मैं अपनी इन्हीं आंखों से देख रहा हूं/ अपने धान खेतों को/ एक-एक कर बदल जाते हुए/ खदानों, कारखानों, मिलों में/ जिनके मालिक हम नहीं हैं/ हमारे हरे-भरे पहाड़/ एक-एक कर होते जा रहे हैं भूरे-वीरान/ कुछ के अस्तित्व का पता ही नहीं चलता/ हमारी नदियां सूख गई हैं/ उनमें कभी चमक कर तैरने वाली मछलियां/ गायब हो गई हैं/ गायब हो गई हैं नदी की रेती/ मैं अपने इन्हीं आंखों से देख नहीं पा रहा हूं/ कि इनके मालिक कौन लोग बनते जा रहे हैं।’

आतंकवाद से प्रभावित इलाकों में मनुष्य की जान की कीमत नहीं होती। अबूझमाड़ की विडंबना यह है कि इन्हें सताने वालों में न केवल सरकार, बल्कि वे लोग भी हैं, जो इनके लिए लड़ने आते हैं। परिणति यह है कि: ‘कभी सोचा भी न था/ कि जीनी पड़ेगी ऐसी जिंदगी/ जिसमें जिजीविषा चौतरफा हार का परचम होगी/ क्रांति आत्महत्या की ओर ले जाएगी/ अंधेरा रोशनी का पर्याय होगा...।’ 

मगर इससे वहां के आदिवासी हार मानने वाले नहीं हैं। संकल्प लेते हैं कि: ‘हम तीस दिनों का रखेंगे अलग-अलग नाम/ पैदा करेंगे उनके नाम पर संतान/ रोकेंगे अपनी वंशवेलि का विनाश।’ 

और भी बहुत कुछ है इस संग्रह में। ‘मिअमाड़’ समकालीन हिंदी कविता भी एक उपलब्धि है। 

मिअमाड़: श्रीप्रकाश मिश्र; यश पब्लिकेशंस, 1/11848, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 295 रुपए।


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