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बदलाव का सब्जबाग PDF Print E-mail
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Saturday, 28 June 2014 09:26

पुण्य प्रसून वाजपेयी

 जनसत्ता 28 जून, 2014 : बात गरीबी की हो, लेकिन नीतियां रईसों को उड़ान देने वाली हों। बात गांव की हो, लेकिन नीतियां शहरों को बनाने की हों। तो फिर रास्ता भटकाव वाला नहीं, झूठ वाला ही लगता है। ठीक वैसे जैसे नेहरू ने रोटी-कपड़ा-मकान की बात की। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया। अब नरेंद्र मोदी गरीबों के सपनों को पूरा करने के सपने दिखा रहे हैं। असल में देश के विकास का रास्ता कौन-सा सही है इसके मर्म को न नेहरू ने पकड़ा और न ही मोदी पकड़ पा रहे हैं। रेलगाड़ी का सफर महंगा हुआ। तेल महंगा होना तय है। लोहा और सीमेंट महंगा हो चला है। सब्जी-फल की कीमतें बढ़ेंगी ही और इन सबके बीच मानसून ने दो बरस लगातार धोखा दे दिया तो खुदकुशी करते लोगों की तादाद किसानों से आगे निकल कर गांव और शहर दोनों को अपनी गिरफ्त में लेगी। तो फिर बदलाव आया कैसा?

यकीनन जनादेश बदलाव लेकर आया है। लेकिन इस बदलाव को दो अलग-अलग दायरों में देखना जरूरी है। पहला, मनमोहन सिंह के काल का खात्मा, और दूसरा, आजादी के बाद से देश को जिस रास्ते पर चलना चाहिए था उसे वह सही रास्ता न दिखा पाने का पाप। नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह से मुक्ति दिलाई यह जरूरी था। इसे बड़ा बदलाव कह सकते हैं, क्योंकि मनमोहन सिंह पहले प्रधानमंत्री थे, जो भारत के प्रधानमंत्री होकर भी दुनिया की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नुमाइंदे के तौर पर ही सात रेसकोर्स में थे; मनमोहन सिंह ऐसे पहले प्रधानमंत्री बने जिन्हें विश्व बैंक से प्रधानमंत्री रहते हुए पेंशन मिलती रही। 

यानी प्रधानमंत्री रहते प्रतीक-राशि के तौर पर देश से सिर्फ एक रुपया लेकर ईमानदार प्रधानमंत्री होने का तमगा लगाना हो या फिर परमाणु संधि के जरिए दुनिया की तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मुनाफा बनाने देने के लिए भारत को ऊर्जा-शक्ति बनाने का ढोंग हो। हर हाल में मनमोहन सिंह देश की नुमाइंदगी नहीं कर रहे थे, बल्कि विश्व बाजार में बिचौलिए की भूमिका निभा रहे थे। जाहिर है, नरेंद्र मोदी बदलाव के प्रतीक हैं, जो मनमोहन सिंह नहीं हो सकते। लेकिन यहां से शुरू होता है दूसरा सवाल, जो आजादी के बाद नेहरू-काल से लेकर अभी शुरू हुए मोदी युग से जुड़ रहा है। नेहरू और मोदी के बीच फर्क सिर्फ इतना दिखाई दे रहा है कि भारत की गरीबी को ध्यान में रख कर नेहरू ने समाजवाद का छौंक लगाया था और मोदी के रास्ते में उस आरएसएस का छौंक है, जो भारत को अमेरिका बनाने के खिलाफ है। 

लेकिन बाकी सब? दरअसल, नेहरू यूरोपीय मॉडल से खासे प्रभावित थे। तो उन्होंने जिस मॉडल को अपनाया उसमें हर चीज बड़ी बननी ही थी। बड़े बांध। बड़े अस्पताल। बड़े शिक्षण संस्थान। यानी सब कुछ बड़ा। चाहे भाखड़ा नांगल हो या एम्स या फिर आइआइटी, और जब बड़ा चाहिए तो दुनिया के बाजार से इन बड़ी चीजों को पूरा करने के लिए बड़ी मशीनें, बड़ी टेक्नोलॉजी, बड़ी शिक्षा भी चाहिए। तो असल में नेहरू के समय से ही एक भारत में दो भारत के बनने का दौर शुरू हो चुका था। 

इसीलिए गरीबी या गरीबों को लेकर सियासी नारे भी आजादी के तुरंत बाद से गंूजते रहे और सोलहवीं लोकसभा में भी गूंज रहे हैं। लेकिन अब सवाल है कि मोदी जिस रास्ते पर चल पड़े हैं वह बदलाव कहां है? जनादेश ने कांग्रेस को खारिज कर अपनी तरफ से बदलाव किया, लेकिन क्या जनादेश के बदलाव से देश का रास्ता भी बदलेगा और वास्तव में बदलाव आएगा? 

इस सवाल का जवाब मुश्किल नहीं है, क्योंकि नेहरू ने जो गलती की, उसे अत्याधुनिक तरीके से मोदी मॉडल अपना रहा है। सौ आधुनिकतम शहर। आइआइटी। आइआइएम। एम्स अस्पताल। बड़े बांध। विदेशी निवेश। यानी हर गांव को शहर बनाते हुए शहरों को उस चकाचौंध से जोड़ने का सपना जो आजादी के बाद बहुसंख्यक तबका अपने भीतर संजोए रहा है। जहां वह घर से निकले, गांव की पगडंडियों को छोडेÞ, शहर में आए, वहीं पढ़े। राजधानी पहुंचे तो वहां नौकरी करे। फिर देश के महानगरों में कदम रखे। फिर दिल्ली या मुंबई होते हुए सात समंदर पार। यह सपना कोई आज का नहीं है, लेकिन इस सपने में संघ की राष्ट्रीयता का छौंक लगने के बाद भी देश को सही रास्ता क्यों नहीं मिल पा रहा है। इसे आरएसएस भी कभी समझ नहीं पाया और शायद प्रचारक से प्रधानमंत्री बने मोदी का संकट भी यही है कि जिस रास्ते वे चल निकले हैं उसमें गांव कैसे बचेंगे यह किसी को नहीं पता। 

पलायन कैसे रुकेगा इस पर कोई काम हो नहीं रहा है। सवा सौ करोड़ की जनसंख्या सकारात्मक तौर पर काम करते हुए देश को बनाने-संवारने लगे इस दिशा में कभी किसी ने सोचा नहीं। पानी बचाने और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर बढ़ने में कभी सरकारों ने सक्रियता नहीं दिखाई। बने हुए शहर अपनी क्षमता से ज्यादा लोगों को पनाह दिए हुए हैं, उसे रोकें कैसे? या शहरों का विस्तार पानी, बिजली, सड़क की उपलब्धता के अनुसार ही हो, इस पर कोई बात करने को तैयार नहीं। तो फिर बदलाव का रास्ता है क्या? 

जरा सरलता से समझें तो हर गांव के हर घर में शौचालय से लेकर पानी-निकासी और बायोगैस-ऊर्जा


से लेकर पर्यावरण संतुलन बनाने की दिशा में काम होना चाहिए। तीन या चार पढ़े-लिखे लोग हर गांव को सही दिशा दे सकते हैं। देश में करीब छह लाख अड़तीस हजार गांव हैं। तीस लाख से ज्यादा बारहवीं पास छात्रों को सरकार नौकरी भी दे सकती है और गांवों के पुनर्निर्माण की दिशा में कदम भी उठा सकती है। फिर कुएं, तालाब, बावड़ी से लेकर बारिश के पानी को जमा करने तक पर कोई काम क्यों नहीं हुआ। जल संसाधन मंत्रालय का काम क्या है।

 पानी देने के राजनीतिक नारे से पहले पानी बचाने और सहेजने का पाठ कौन पढ़ाएगा। इसके समांतर कृषि विश्वविद्यालयों के जिन छात्रों को गरमी की छुट््टी में प्रधानमंत्री मोदी गांव भेजना चाहते हैं और लैब टु लैंड यानी प्रयोगशाला से जमीन की बात कर किसानों को खेती का पाठ पढ़ाना चाहते हैं उससे पहले जैविक खेती के रास्ते खोलने के लिए वातावरण क्यों नहीं बनाना चाहते? किसान का जीवन फसल पर टिका है और फसल की कीमत अगर लागत से कम होगी तो फिर हर मौसम में ज्यादा उगा कर भी किसान को क्या हासिल होगा। 

खनन से लेकर तमाम बड़ी परियोजनाएं, जो बिजली की हों या फिर इन्फ्रास्ट्रक्चर की, उन्हें पूरा करने में टेक्नोलॉजी की जगह मानव श्रम क्यों नहीं लगाया जा सकता। जबकि मौजूदा वक्त में जितनी भी परियोजनाओं पर काम चल रहा है और जो परियोजनाएं मोदी सरकार की प्राथमिकता हैं उनमें से अस्सी फीसद की जमीन तो ग्रामीण भारत में है। इनमें भी साठ फीसद परियोजनाएं आदिवासी बहुल इलाकों में हैं।

देश के बीस करोड़ से ज्यादा श्रमिक हाथ बेरोजगार हैं। क्या इन्हें काम पर नहीं लगाया जा सकता? लातूर में चीन की टेक्नोलॉजी से आठ महीने में बिजली परियोजना शुरू हो गई। मशीनें लाई गर्इं और लातूर में लाकर उन्हें जोड़ दिया गया। लेकिन इसका फायदा किसे मिला? जाहिर है, उसी कॉरपोरेट को जिसने इसे लगाया। 

तो फिर गांव-गांव तक जब बिजली पहुंचाई जाएगी तो वहां तक लगे खंभों का खर्च कौन उठाएगा? निजी क्षेत्र के हाथ में पॉवर सेक्टर आ चुका है, तो फिर खर्च कर वह वसूलेगा भी। तो महंगी बिजली गांव वाले कैसे खरीदेंगे। और किसान महंगी बिजली कैसे खरीदेगा। अगर ये खरीद पाएंगे तो अनाज का समर्थन-मूल्य तो सरकार को ही बढ़ाना होगा। यानी महंगे होते साधनों की कीमत-वृद्धि पर रोक लगाने का कोई मॉडल सरकार के पास नहीं है। 

सबसे बड़ा सवाल यही है कि बदलाव के जनादेश के बाद क्या वाकई बदलाव की खूशबू देने की स्थिति में मोदी सरकार है, क्योंकि छोटे बांध, रहट से सिंचाई, रिक्शा और बैलगाड़ी, सरकारी स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सौर ऊर्जा या बायोगैस, सब कुछ खत्म कर जिस विकास मॉडल में सरकार समा रही है उस रास्ते पहाड़ियों से अब पानी झरने की तरह गिरता नहीं है। सड़कों पर साइकिल के लिए जगह नहीं।

बच्चों के खुले मैदानों की जगह कंप्यूटर गेम्स ने ले ली है। चलने वालों की पटरी पर चढ़ाई कर चार-पहिया गाड़ियां ओवर-टेक कर दौड़ने को तैयार हैं। और जिस पेट्रोल-डीजल पर विदेशी बाजार का कब्जा है उसका उपयोग ज्यादा-से-ज्यादा करने के लिए गाड़ियों को खरीदने की सुविधा ही देश में सबसे ज्यादा है। यानी आत्मनिर्भर होने की जगह पैसा बनाने या रुपया कमाने की होड़ ही विकास मॉडल हो चला है। तभी तो मोदी सरकार ने रेल बजट का इंतजार नहीं किया और रेल यात्रियों का सफर चौदह फीसद महंगा कर दिया यह जानते-समझते हुए कि भारत में रेलगाड़ी का सबसे ज्यादा उपयोग कमजोर तबका करता है।

 खत्म होते गांवों, खत्म होती खेती के दौर में शहरों की तरफ पलायन करते लोग और कुछ कमा कर होली-दिवाली-ईद में मां-बाप के पास लौटता आदमी ही सबसे ज्यादा रेलगाड़ी में यात्रा करता है। दूसरे नंबर पर धार्मिक स्थलों के दर्शन करने वाले और तीसरे नंबर पर विवाह-उत्सव में शरीक होने वाले आते हैं। और जो भारत रेलगाड़ी से सस्ते में सफर के लिए बचा उस भारत को खत्म कर शहर बना कर गाड़ी और पेट्रोल-डीजल पर निर्भर बनाने की कवायद भूमि सुधार के जरिए करने पर शहरी विकास मंत्रालय पहले दिन से ही लग चुका है।

यानी महंगाई पर रोक कैसे लगे इसकी जगह हर सुविधा देने और लेने का सोच विकसित होते भारत की अनकही कहानी हो चला है, जिसके लिए हर घेरे में सत्ताधारी बनने की ललक का नाम भारत है। तो गंगा साफ कैसे होगी जब व्यवस्था मैली होगी? और सत्ता पाने की खातिर गरीबों के लिए जिएंगे-मरेंगे का नारा लगाना ही आजाद भारत की फितरत होगी!


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