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घोड़ा नचाने की कवायद PDF Print E-mail
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Friday, 27 June 2014 09:20

गिरिराज किशोर

 जनसत्ता 27 जून, 2014 : देश परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। परिवर्तन के बारे में भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। मगर परिवर्तन का आश्वासन देने वालेउसकी एक तस्वीर अपने मन में बना लेते हैं और उसे मनचाहे ढंग से परोसते रहते हैं। परिवर्तन का आश्वासन कई बार घोड़ा नचाने की तरह होता है। जब तक वह नाचता है, तब तक साईस को लगता है कि घोड़ा उसके इशारे पर चल रहा है। नाच देखने वाले भी आनंद लेते रहते हैं। जहां घोड़ा अलिफ हुआ, साईस तो तरबतर होता ही है, तमाशबीन भी तितर-बितर हो जाते हैं। मोदीजी परिवर्तन और विकास के घोड़े को नचाते हुए प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हो गए। यह देश के लिए भी बड़ा अनुभव है। यह सरकार नए अंदाज के साथ आई है। 

अभी प्रधानमंत्री ने भूटान यात्रा की। वहां से लौट कर उन्होंने कहा कि वह उनके लिए यादगार यात्रा है। ऐसे उनके सैकड़ों यात्राएं होंगी। यह पहला अवसर था जब उन्होंने किसी देश की संयुक्त संसद को संबोधित किया। वहां की परंपरा के विपरीत अपने भाषण पर सांसदों से तालियां बजवा लीं। वहां तालियां बुरी आत्माओं को भगाने के लिए बजाई जाती हैं, लेकिन सांसदों ने अपनी बुरी परंपरा को एक विश्वव्यापी परंपरा में बदल कर अच्छी परंपरा बना दिया। आशा है, वे इस परंपरा को आगे भी चालू रखेंगे।  

इसी दौरान दो बातें हुर्इं। एक तो प्रधानमंत्री का यह कहना कि हिंदुस्तान का मजबूत होना छोटे देशों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। यह बात मेरे कानों को उसी तरह अखरी जैसे चैनलों पर आने वाले कार के एक विज्ञापन में पीछे बैठा पिता पुत्र से पूछता है कि एक्सीलरेटर पर पांव पहुंच रहा है या नहीं। वह उसे नागवार गुजरता है। जब वह ड्राइवर की सीट पर बैठा कार चला रहा है तो दूसरा व्यक्ति, भले वह उससे बड़ा हो, उसे कद में अपने से छोटा होने का अहसास कैसे करा सकता है। नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी के शासन तक पड़ोसी देश इस बात से बहुत नाराज थे कि हिंदुस्तान का व्यवहार उनके साथ बिग ब्रदर जैसा है। कोई छोटा देश हो या बड़ा, सबका कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समान है। नेहरू के संदर्भ में इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्ण ने इस बात का संकेत भी दिया था। मोदीजी ने उन्हें छोटा देश कह कर आहत तो नहीं किया? जब बड़े देशों में हमें गरीब देश कहा जाता है तो अच्छा नहीं लगता। बताते हैं कि एक बार संयुक्त राष्ट्र में भाषण देने जाते समय निक्सन ने इंदिराजी को वाशिंगटन आने के लिए निमंत्रण दिया, तो उन्होंने उसे यह कह कर टाल दिया था कि यह मेरे एजेंडे पर नहीं है। इस तरह के व्यवहार से पड़ोसी देश नाराज होते हैं। 

दूसरी बात हमारे रक्षामंत्री की सरहद दौरे से संबंधित है। वे नियंत्रण रेखा का निरीक्षण करने गए थे। युद्धपोत विक्रमादित्य को देश को समर्पित करने के सिलसिले में मीडिया ने प्रधानमंत्री को सागर पोत का कमांडर बताया था, उसी दिन रक्षामंत्री नियंत्रण रेखा के दौरे पर गए थे। वहां जाकर उन्होंने सेना के प्रबंधन के प्रति अपनी संतुष्टि प्रकट की। इससे जरूर सेना का मनोबल बढ़ा होगा। लेकिन शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को हमारे प्रधानमंत्री द्वारा बातचीत के जरिए समस्याओं का हल निकालने के आश्वासन के बरक्स रक्षामंत्री ने कहा कि जब तक आतंकी हमले नहीं रोके जाएंगे, तब तक पाकिस्तान से कोई बात नहीं होगी। यह बात प्रधानमंत्री के आश्वासन के उलट है। 

हालांकि उनके इस वक्तव्य के बाद 17 जून के कुछ अखबारों में छपा है कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान की व्यावसायिक मुद्दों पर सचिव स्तर की जल्दी बात होगी। रक्षामंत्री ही वित्तमंत्री भी हैं। व्यावसायिक मुद्दों पर बातचीत वित्त मंत्रालय के अधीन होगी। लगता है कि वित्त मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की बात अलग-अलग कोणों से कही गई हैं। व्यक्ति एक हो सकता है, पर मंत्रालयों का नजरिया अलग हो जाता है। इस बार मोदीजी ने मंत्रालय के बंटवारे में प्रयोग किए हैं। यह उनका विशेषाधिकार है। उस पर प्रश्नचिह्न लगाना ठीक नहीं, मगर चर्चा हो सकती है। 

एकाएक कई समस्याएं सामने आ गर्इं। सबसे पहली गांठ तो केंद्रीय रसायन राज्यमंत्री निहाल चंद के ऊपर लगे बलात्कार के आरोप की है। मोदी ने राष्ट्रपति के भाषण पर अपना उत्तर देते हुए दागी सांसदों के बारे में कहा था कि एक साल के अंदर लंबित मुकदमे तय किए जाएं, जो निर्दोष हों वे बने रहें, जो दागी साबित हों जेल जाएं।

इस बात से लोगों को लगा था मोदी संसद में दिए गए आश्वासन पर जरूर अमल करेंगे। पर रसायनमंत्री ने गाड़ी अटका दी। राजस्थान के, भाजपा सरकार के मंत्री राठौड़ साहब उन्हें निर्दोष बता रहे हैं। अब तो पूरी पार्टी समर्थन में आ गई है। पीड़ित महिला ने अपने सम्मान की बाजी लगा कर पुनर्विचार याचिका दायर की है। क्या वह झूठ बोल रही है? अगर बोल भी रही है तो पार्टी मोदीजी के संसद में दिए गए आश्वासन का सम्मान तो करे। 

रसायनमंत्री संसद का टिकट पाते समय कथित दागी रहे होंगे। जहां इतने तथाकथित अन्य दागी प्रत्याशियों को टिकट मिले, वहां उनको भी मिल गया। पर मंत्री को समन मिलना, वह भी बलात्कार के मामले में, नाजुक बात है। प्रधानमंत्री चुप हैं। भाजपा उन्हें बने रहने के लिए कह रही है। आधी आबादी के सम्मान का सवाल है। वे उन्हें कह सकते हैं कि फिलहाल त्यागपत्र दे दो, जब पाक-साफ होकर आओगे तो हम राज्यमंत्री तो क्या, पूरा


मंत्री बना देंगे। महिलाओं को इस बात से सम्मान भी मिलेगा और आश्वासन भी, कि प्रधानमंत्री महिलाओं के सम्मान के प्रति गंभीर हैं। वरना सरकारों का स्थायी जवाब होता है कि जब तक कोई दोषी साबित नहीं हो जाता, उसे दंडित नहीं किया जा सकता। यही भाजपा कह रही है। खैर, यह निर्णय तो प्रधानमंत्री के अधिकार क्षेत्र में आता है। 

दूसरा संकट महंगाई का है। प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी महंगाई के सवाल से जूझ रहे हैं, क्योंकि अच्छे दिन आने वाले हैं का नारा इसी बात को लेकर दिया गया था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां कह रही हैं कि पता नहीं अच्छे दिनों के लिए कितना इंतजार करना पड़े। अच्छे या बुरे दिन सरकारों के हाथ में नहीं होते। उसके लिए बहुत से तत्त्व जिम्मेदार होते हैं। कांग्रेस के बुरे दिन मोदी के अच्छे दिन में बदल गए। जनता के दिन वर्तमान हालात में बुरे दिन ही न होकर रह जाएं। चैनलों ने तो अभी से नारे में अच्छे दिन शब्द को काट कर महंगे दिन कर दिया। 

इराक का शिया-सुन्नी झगड़ा और सुन्नियों का इतना आक्रामक होते जाना कि हुकूमत को निष्क्रिय बना कर देश के बहुत बड़े हिस्से पर अपनी हुकूमत कायम कर लेना, दूसरे देशों की आर्थिक स्थिति बदल रहा है। इराक पेट्रोल का बड़ा पूर्तिकर्ता देश है। हिंदुस्तान के लिए दूसरे नंबर का पूर्तिकर्ता है। वहां के सबसे बड़े शोधक कारखाने के पचहत्तर प्रतिशत हिस्से पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम भी बढ़ गए। पेट्रोल और डीजल के दाम अगर बढ़ते हैं तो हिंदुस्तान में महंगाई बढ़ेगी। दूसरी समस्या चालीस भारतीयों को अगवा करके अज्ञात स्थान पर रखा गया है। टीवी चैनल रात-दिन दिखा रहे हैं कि उनके संबंधी रो-रोकर बेहाल हैं। उनका वापस आना देश की शांति से जुड़ा है। 

शिया-सुन्नी का मतांतर लखनऊ के दोनों वर्गों को प्रभावित कर रहा है। सरकार आश्वासन दे रही है कि वह हर कोशिश कर रही है उन्हें सही-सलामत वापस लाने की। अभी तक पता नहीं कि वे कहां रखे गए हैं। पता भी चल गया तो क्या करेंगे। यही नहीं, तीस छात्र भी फंसे हैं। दरअसल, चालीस लोग अगवा कर लिए गए तो दबाव बढ़ना स्वाभाविक था। लेकिन जो लगभग अठारह हजार लोग वहां से आना चाहते हैं उन्हें लाने के बारे में सरकार की कोई योजना नहीं है। 

सरकार हर क्षेत्र में सबसिडी वापस लेने की बात कह रही है। रेलमंत्री ने रेल किराया 14.2 प्रतिशत बढ़ा दिया। उनका कहना है कि पहली सरकार का प्रस्ताव था, उसे लागू किया गया है। यह सरकार अगर पहली सरकार के मंसूबों को बिना नुक्ता हटाए क्रियान्वित कर रही है, तो फिर नई सरकार की मौलिकता कहां रही। वैसे पहली सरकार ने कभी इतना किराया नहीं बढ़ाया। यह सरकार तो उनके प्रस्ताव में दो प्रतिशत भी कम करने को तैयार नहीं हुई। ये सब स्थितियां अच्छे दिन लाने में रुकावट पैदा कर सकती हैं।

इस बीच मुसलिम देशों के साथ हमारे पहले जैसे संबंध नहीं हैं। नहीं तो मित्र मुसलिम देशों के माध्यम से वहां फंसे लोगों को वापस लाने की कोशिश की जा सकती थी। मोदीजी के बारे में माना जाता है वे मंसूबों को व्यावहारिक जामा पहनाने में माहिर हैं, पर जब बात दूसरे देशों की हो तो वह महारत कितनी कामयाब होगी, कहना मुश्किल है। 

मैंने गृहमंत्री के व्यक्तिगत सचिव की नियुक्ति का मामला फेसबुक पर डाला था। किसी सज्जन ने, जो संभवत: मोदी-भक्त हैं, लिखा कि कारिंदों के साथ यही होता है। अब तो कार्मिक मंत्रालय से आदेश जारी हो गया कि कोई मंत्री पहली सरकार के मंत्रियों के साथ रहे कर्मियों में से किसी को अपने यहां नहीं रखेगा, सब निर्णय प्रधानमंत्री करेंगे। राज्यपालों पर तो गाज गिर ही रही है, छोटे अफसर और बाबू लोग नफरत के लपेटे में आ जाएंगे, यह उम्मीद नहीं थी। 

सुना है, गृहमंत्री ने प्रधानमंत्री से अपनी व्यथा कही है। कानूनमंत्री के साथ भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने वक्तव्य दिया कि हर मंत्री को अपने निर्णय लेने का अधिकार है। उपरोक्त आदेश के बाद न गृहमंत्री की व्यथा का मतलब है, न कानूनमंत्री के वक्तव्य का। ये सब बातें नई सरकार के संचालन में कहां तक सहायक हो सकती हैं, कहना मुश्किल है। सवाल इस बात से भी जुड़ा है कि प्रधानमंत्री ने यूपीए कार्यकाल के कैबिनेट सचिव को छह महीने का सेवा विस्तार दे दिया, जबकि पहली सरकार उन्हें दो साल का विस्तार दे चुकी थी। इससे पता चलता है कि वे उस सरकार के कितने निकट थे। यह नीतियों के दोहरेपन की तरफ इशारा करता है। इतने ऊंचे स्तर पर तो और भी अधिक। प्रधानमंत्री का घोड़ा नाचेगा, तो क्या मंत्रियों को टट्टुओं पर संतोष करना पड़ेगा!


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