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फिर जेपी का सवाल सामने है PDF Print E-mail
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Thursday, 26 June 2014 09:13

कुमार प्रशांत

 जनसत्ता 26 जून, 2014 : छब्बीस जून, 1975 वह तारीख है जहां से भारतीय लोकतंत्र का इतिहास एक मोड़ लेता है। सत्ता की चालें-कुचालें थीं सब ओर और सभी हतप्रभ थे, लेकिन कोई बोलता नहीं था। राजनीति चाटुकारों से और समाज गूंगों से पट गया था। 1973-74 में गुजरात में युवकों ने एक चिनगारी फूंक तो डाली थी लेकिन वह रोशनी कम और आग ज्यादा फैला रही थी। बिहार में भी युवकों ने ही इस सन्नाटे को भेदने का काम किया था लेकिन सन्नाटा टूटा कुछ इस तरह कि पहले से भी ज्यादा दमघोंटू सन्नाटा घिर आया! तब कायर चुप्पी थी, अब भयग्रस्त घिघियाहट भर थी। और ऐसे में उस बीमार, बूढ़े आदमी ने कमान संभाली थी। वर्तमान उसे कम जानता था, इतिहास उसे जयप्रकाश के नाम से पहचानता था और राष्ट्रकवि दिनकर उसके लिए यही गाते हुए इस दुनिया से विदा हुए थे: कहते हैं उसको जयप्रकाश जो नहीं मरण से डरता है/ ज्वाला को बुझते देख कुंड में स्वयं कूद जो पड़ता है! 

वैसा ही हुआ! वह मौत के बिस्तर से उठ कर, हम समझ पाए कि न समझ पाए, हमें साथ लेकर क्रांति-कुंड में कूद पड़ा! अठारह मार्च को पटना की सड़कों पर बमुश्किल हजार लोग ही तो उतरे थे- हाथ पीछे बंधे थे और मुंह पर पट््टी बंधी थी। उन हजार लोगों ने भी अपना-अपना शपथपत्र भरा था जिसकी पूरी जांच जयप्रकाश ने की थी। पहली लक्ष्मण-रेखा तो यही खींची थी कि उन्होंने कि आपका संबंध किसी राजनीतिक दल से नहीं होना चाहिए। तो कांग्रेसी सत्ता की अपनी कुर्सी से और विपक्षी विपक्ष की अपनी कुर्सी से बंध कर रह गए थे। पटना शहर की मुख्य सड़कों से गुजर कर, सत्ता की हेकड़ी और प्रशासन की अकड़ को जमींदोज कर, कोई तीन घंटे बाद जब क्षुब्ध ह्रदय है/ बंद जबान की तख्ती घुमा कर हम सभी जमा हुए तो मुंह पर बांधी अपनी पट््टी खोल कर साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु लंबे समय तक खामोश ही रह गए! मैंने पानी का गिलास लेकर कंधा छुआ तो कुछ देर मुझे देखते ही रहे, फिर बोले: प्रशांतजी, ऐसा निनाद करता सन्नाटा तो मैंने पहली बार ही देखा और सुना! 

और खामोशी में लिपटा वह निनाद अगले ही दिन जिस गड़गड़ाहट के साथ फटा, क्या उसकी कल्पना थी किसी को! मतलब तो क्या पता होता, जिस शब्द से भी किसी का परिचय नहीं था वह क्रांति शब्द- संपूर्ण क्रांति- सारे माहौल में गूंज उठा। उस वृद्ध जयप्रकाश नारायण ने न जाने कौन-सी बिजली दौड़ा दी थी कि सब ओर रोशनी छिटकने लगी थी। कहा था अकबर इलाहाबादी ने गांधी के लिए लेकिन वह चस्पां हो रहा था इस दौर पर कि मुश्ते-खाक हैं मगर आंधी के साथ हैं/ बुद्धू मियां भी हजरते गांधी के साथ हैं! इंदिरा गांधी ने जितनी कोशिश की कि इस आंधी को खरीद लें, डरा लें, कुचल दें, उतनी ही यह भयावह होती जा रही थी। 

इसी वक्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वह कानूनी नुक्ता नुमायां किया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव कानून का उल्लंघन करके चुनाव जीता है और इसलिए उनका चुनाव रद््द किया जाता है। उस आंधी में यह एक नया ही गुबार आ मिला। हमारा लोकतंत्र एक अजीब मुहाने पर आ खड़ा हुआ कि एक ऐसा शख्स देश का प्रधानमंत्री था जो सांसद नहीं था लेकिन संसद में था, कानून के उल्लंघन का दोषी था लेकिन कानून बनाने का अधिकारी था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय से मिली छूट का सहारा लेकर इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की और संवैधानिक बारीकियों के प्रख्यात ज्ञाता नानी पालखीवाला को सामने ला खड़ा किया। पालखीवाला ने गलत केस लेने की गलती की, हालांकि उनकी खुली सहानुभूति जयप्रकाश के साथ थी।  

इंदिरा गांधी, पालखीवाला और अदालत तीनों का संकट जयप्रकाश समझ रहे थे और इसलिए तीनों की शान रह जाए ऐसा रास्ता सुझाया- मामला सर्वोच्च न्यायालय में चले और फैसला आने तक इंदिराजी प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दें; कांग्रेस कार्यसमिति अदालत का फैसला आने तक नया प्रधानमंत्री नियुक्त करे, पालखीवाला अदालत के सामने जैसा भी संवैधानिक प्रावधान रखना चाहें रखें लेकिन यह देखें कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश का पालन हो रहा है या नहीं। ऐसी तजवीज कर जयप्रकाश ने पूरी पहल इंदिरा के हाथ में कर दी। अब वे अदालत के फैसले से बंधा अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुनें और कानून को अपना काम करने दें। ऐसी सुविधा बन गई। अब इंदिरा गांधी के पास न तो वैसी नैतिकता थी, न उन्हें कांग्रेस पर अपने प्रभाव का भरोसा था, न वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आस्था रखती थीं। 

जयप्रकाश ने पालखीवाला के लिए भी रास्ता निकाल दिया कि वे अदालत में इंदिरा गांधी की तरफ से ही जाएं लेकिन तभी जब वे प्रधानमंत्री का पद छोड़ कर संविधान का सम्मान करें और अदालत को भी संकेत दिया कि उसे इलाहावाद के निर्णय की आत्मा के अनुकूल, संविधान का पालन करने वाले व्यक्ति का ही मामला प्राथमिकता से सुनना चाहिए। 

यह अहिंसा का एक नया ही पाठ था जिसे जयप्रकाश लड़ाई के मैदान में उतर कर समझा रहे थे। लेकिन पालखीवाला, इंदिरा गांधी और अदालत, तीनों में से कोई भी संविधान और राजनीति का यह नैतिक पहलू देखने-समझने को तैयार नहीं हुआ या कि यह उनकी पहुंच से बाहर की बात थी। जयप्रकाश 25 जून 1975 को दिल्ली पहुंचे और बोटक्लब पर वह ऐतिहासिक सभा हुई जिसमें उन्होंने अपनी इसी बात को आगे बढ़ाया। हां, विपक्ष को इस अनुशासन से बांधा कि वे इंदिरा गांधी का इस्तीफा मांगने के लिए सत्याग्रह करें लेकिन उसमें हिंसा और निजी हमले नहीं होने चाहिए।

इसी सभा में उन्होंने फौज-पुलिस को भी लोकतांत्रिक अनुशासन की याद दिलाई कि राजतंत्र और तानाशाही में राज्य की सशस्त्र


शक्ति राजा या तानाशाह के प्रति वफादार होती है, लोकतंत्र में उसकी वफादारी केवल संविधान के प्रति होती है। इसलिए उसे हर संवैधानिक आदेश का पालन करना चाहिए, लेकिन कोई सरकार या सरकार का सर्वेसर्वा अगर उनकी ताकत का सहारा लेकर संविधान की और लोकतंत्र की ही धज्जियां उड़ाने में लग जाए तो उसे वैसे आदेश को मानने से इनकार कर देना चाहिए। आखिर ब्रिटिश राज में निहत्थे खुदाई खिदमतगारों पर गोरखा रेजीमेंट ने गोली चलाने से मना ही कर दिया था न! गुलाम भारत में वह अगर सेना के इतिहास के सबसे गौरवशाली पन्नों में एक है तब लोकतांत्रिक भारत में ऐसे विवेक की बात क्यों नहीं करनी चाहिए? 

लेकिन जयप्रकाश की न किसी ने सुनी न समझी। जो चुनाव कानून के उल्लंघन का सीधा, सामान्य-सा मामला था, वह देश को तानाशाही की दिशा में ले जाने वाला मुकदमा बन गया। यह तानाशाही संविधान के रास्ते आई। राष्ट्रपति के दस्तखत से आई। संसद की सहमति से आई। इस तानाशाही के समर्थन में न्यायपालिका ने भी वोट दिया। अखबारों ने भी थोड़ा कुनमुना कर इस तानाशाही को कबूल ही नहीं कर लिया, जल्दी ही उसकी विरुदावली गाने लगे! सभी रंग-ढंग के कवि-कलाकार जुलूस बना कर निकल पड़े कि तानाशाही का जश्न है, जरा झूम कर निकलें! 

ऐसा क्यों हुआ? चंडीगढ़ के अस्पताल के एक नामालूम-से कोने में नजरबंद वृद्ध-बीमार जयप्रकाश भी इसी सवाल से जूझ रहे थे। अपनी जेल डायरी के पहले पन्ने पर, जो 21 जुलाई 1975 को लिखा गया है, वे लिखते हैं: ‘‘मेरा सारा संसार मेरे चारों तरफ खंड-विखंड बिखरा पड़ा है! लगता नहीं है कि अब मैं अपनी आंखों से कभी इन्हें समेटा हुआ देख पाऊंगा... मैं कोशिश तो कर रहा था कि लोकतंत्र की प्रक्रिया में अधिकाधिक लोगों को जोड़ कर, इसका क्षितिज थोड़ा व्यापक कर सकूं... लेकिन मेरा गणित कहां गलत पड़ा? (मैं ‘हमारा गणित’ नहीं लिख रहा हूं क्योंकि यह जो कुछ भी हुआ है, उसकी पूरी जिम्मेवारी मेरी है और वह मुझे ही लेनी चाहिए!) मैं इस आकलन में चूक गया कि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में, अपने से असहमत लोगों के शांतिमय लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचलने के लिए कोई प्रधानमंत्री किस हद तक जा सकता है!

मैं  इतना तो अनुमान करता था कि इस आंदोलन को रोकने के लिए प्रधानमंत्री सभी किस्म के सामान्य और असामान्य कानूनों की मदद लेंगी लेकिन वे इसके लिए लोकतंत्र का ही गला घोंट देंगी, यह मैंने सोचा नहीं था। मैं इस पर भी भरोसा नहीं कर पा रहा हूं कि अगर प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ सोचा भी तो उनके वरिष्ठ सहयोगियों ने, उनकी पार्टी ने, जिसकी लोकतांत्रिक परंपरा खासी मजबूत रही है, उन्हें ऐसा करने दिया!!’’ 

अब जयप्रकाश का यह सवाल है और उसके सामने हम खड़े हैं। हम यह न भूलें कि जब इंदिरा गांधी ने देश पर इमरजेंसी थोपी तब लोकसभा में उनको भारी बहुमत हासिल था। चुनाव में आपकी जीत और लोकसभा में आपका प्रचंड बहुमत आपको अनिवार्यत: लोकतांत्रिक बनाता है, ऐसा नहीं है। लोकतंत्र को शासन की व्यवस्था भर मानेंगे हम, तो उसे कभी मजबूत नहीं कर पाएंगे। लोकतंत्र एक जीवन शैली है, साथ जीने की सभ्यता है। यह लोकतांत्रिक शील सरकार में हो तो समाज भी और प्रशासन भी लोकतांत्रिक बनता है। 

प्रशासन का ढांचा लोकतांत्रिक हो और सारे अधिकार या फैसले एक व्यक्ति में निहित होते जाएं तो 1974 में से 1975 पैदा होता है। इसलिए 1974 की लड़ाई जब 1975 में कुंठित हो गई, तो जेलों में बंदी लाखों लोगों ने और जेलों से बाहर रहे लाखों-करोड़ों लोगों ने लोकतंत्र को अपनी आस्था का विषय बनाया और उन्नीस माह लंबा इंतजार किया। जयप्रकाश अपनी नाकाम हो चुकी किडनी लेकर कभी अस्पताल तो कभी घर आते-जाते रहे लेकिन वे जिस क्रांतिकारी लोकतंत्र के प्रतीक बन गए थे, उसे उन्होंने कभी कमजोर या धुंधला नहीं पड़ने दिया। और इंदिरा गांधी ने जब गफलत में पड़ कर चुनाव घोषित किया तो जयप्रकाश ने देश के सामने एक ही नारे में सारा प्रतिरोध समेट कर रख दिया: दो में से एक चुनना है- लोकतंत्र या तानाशाही! फैसला तो जैसे हुआ रखा था। 26 जून 1975 के गर्भ से पैदा हुआ 1977! देश यह कर सका क्योंकि हमारी प्रतिबद्धताएं स्पष्ट थीं। 

आज भी हम लोकतंत्र या लोकतांत्रिक समाज रचना के संदर्भ में गहरी आशंकाओं से घिरे हैं। केंद्र में फिर बड़े बहुमत के साथ बनी सरकार है लेकिन उसके प्रति देश का भरोसा बहुत उथला है। राज्यों में भी कई अपशकुन पैदा हो रहे हैं। देश का आर्थिक और राजनीतिक संकट गहरा है लेकिन उससे भी गहरा है देश के नेतृत्व का नैतिक संकट। यह पहली चुनौती है जिसे नई सरकार को स्वीकार भी करना है और जीतना भी है। छब्बीस जून हर साल हम सबको अपनी प्रतिबद्धताओं की याद दिलाने आता है। ईमानदार और सावधान रहे तो हम सब मिल कर 2014 में से फिर 1977 निकाल लाएंगे और नई लोकतांत्रिक प्रतिबद्धताओं के साथ आगे बढ़ेंगे।


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