मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
कमजोर दुनिया की आवाज PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Monday, 23 June 2014 09:05

उवेस सुल्तान खान

 जनसत्ता 23 जून, 2014 : बाडुंग सम्मेलन में औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुए एशिया और अफ्रीका के राष्ट्र-राज्यों ने पिछली सदी में एक बेहतर दुनिया का जो सपना देखा था, उसके लिए कुछ कदम तो जरूर सोचे गए, पर आज भी उस सपने को हकीकत में बदलने के लिए बहुत-से फासले तय करने हैं। इस ऐतिहासिक सम्मेलन ने दुनिया के दासता से मुक्त हुए राष्ट्र-राज्यों को राजनीति और कूटनीति का एक नया नजरिया दिया। गुट-निरपेक्ष आंदोलन और एक सौ तैंतीस विकासशील देशों के प्रभावशाली समूह-77, जिसे जी-77 के नाम से भी जाना जाता है, उसी महत्त्वपूर्ण नजरिए को अमल में लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में विकसित हुए।

आज 2014 में, दुनिया प्रथम विश्वयुद्ध का शताब्दी वर्ष इस विश्वास और इरादे के साथ मना रही है कि लगभग सौ साल पहले शुरू हुए उस भयावह इतिहास को कभी न दोहराया जाए। इसी के साथ असमानता-मुक्त, हिंसा-मुक्त, निर्धनता-मुक्त दुनिया बनाने की साझा कोशिश करने वाले विकासशील देशों के सबसे बड़े समूह जी-77 की पचासवीं वर्षगांठ बोलीविया के शहर सांताकू्रज में मनाई गई। 

समूह-77 की स्थापना पंद्रह जून, 1964 को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में हुई थी। प्रारंभ में सतहत्तर विकासशील देश इसके संस्थापक थे, जिसके कारण इस समूह को ‘समूह-77’ का नाम दिया गया। आज इसके सदस्यों की संख्या बढ़ कर एक सौ तैंतीस हो गई है, पर ऐतिहासिक महत्त्व के कारण इसका नाम समूह-77 ही रहने दिया गया। 

समूह-77 विकासशील देशों की मुखर सामूहिक आवाज के तौर पर पिछली सदी में ही अपनी पहचान स्थापित कर चुका था। विकासशील देशों के हितों के लिए यह सजग रूप से प्रयत्नशील रहता है। आज संयुक्त राष्ट्र की प्रणाली में समूह-77 सबसे बड़ा अंतर-सरकारी संगठन है। विकासशील देशों के सामूहिक आर्थिक हितों को मुखरता से बढ़ावा देना और उनके आपस के संबंधों को और प्रगाढ़ करना जी-77 का उद््देश्य रहा है। 

बोलीविया में आयोजित राष्ट्र-प्रमुखों के इस ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन का विषय था ‘एक नई विश्व व्यवस्था- बेहतर जिंदगी के लिए’। जी-77 की पचासवीं वर्षगांठ ऐसे अवसर पर मनाई गई, जब कुछ महीने बाद संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘जलवायु परिवर्तन’ के मुद्दे पर एक अंतरराष्ट्रीय बाध्यकारी संधि के लिए और ‘सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों’ (2000-2015) के बाद ‘सतत और टिकाऊ विकास के लक्ष्यों’ को तय करने के लिए अंतिम दौर से बिल्कुल पहले की सहमति बनाने की कोशिश होनी है। 

समूह-77 और चीन को वैश्विक स्तर पर एक साझा समझ के साथ 2015 के बाद की एक बेहतर दुनिया को साकार करने की कोशिशों, तीसरी दुनिया के गरिमामय प्रतिनिधित्व, ‘विकास’ संबंधी उनकी विविधता से भरी समावेशी समझ और साथ ही उनकी वर्तमान स्थानीय चुनौतियों को अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक स्वर में रखना ही होगा। समूह-77 और चीन के दीर्घकालिक और साझा हित इसी में निहित हैं कि वे सभी एक स्वर में अपनी बात रखें, अन्यथा अंतरराष्ट्रीयता और क्षेत्रीय हितों की जो जुगलबंदी तीसरी दुनिया की वर्तमान आवश्यकता है, उसे वे वास्तविकता में ढाल नहीं पाएंगे। आज दुनिया के बहुसंख्यक शोषित, गरीब और हाशिये पर जी रहे लोगोंके हितों का संघर्ष ही दुनिया को बचा सकता है। 

सहस्राब्दी विकास कार्यक्रम (2000-2015) के आठ लक्ष्य तय किए गए थे। एक, भूख और गरीबी का खात्मा। दो,  सार्वभौम प्राथमिक शिक्षा। तीन, स्त्री-पुरुष समानता के प्रयासों को बढ़ावा देना और महिलाओं को सशक्त बनाना। चार, बाल मृत्यु दर में कमी। पांच, मातृ-स्वास्थ्य में सुधार। छह, एचआइवी/ एड्स, मलेरिया और अन्य रोगों का उन्मूलन। सात, पर्यावरणीय संरक्षण और उसकी निरंतरता को सुनिश्चित करना। आठ, विकास के लिए एक वैश्विक साझेदारी विकसित करना। इन लक्ष्यों की समय-सीमा समाप्त होने में लगभग चार सौ दिन बचे हैं और अभी तक तयशुदा मायनों में इन लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सका है। इसकी बहुत-सी वजहें हैं। 

बहुत-सी चुनौतियों के साथ-साथ अकर्मण्यतावादी भाव इसकी विफलता के लिए जल्द ही गिनाए जाएंगे, जो कुछ हद तक सही भी हैं। लेकिन साथ ही इस बात पर भी सरसरी और हल्के तौर पर विफलता का दोष दिया जाएगा कि ‘सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों’ का मूल ढांचा ही गरीबी के खात्मे और ‘सतत-टिकाऊ विकास’ के लिए विविधता, स्थानीयता और देसी ज्ञान-परंपराओं के नजरिए के अनुरूप न होकर,एकरूपी होना था। 

सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के बाद के ‘सतत और टिकाऊ विकास लक्ष्यों’ को तय करने में भी वही गलतियां नए सिरे से दोहराई जा रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की-मून ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति, लाइबेरिया की राष्ट्रपति और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की सह-अध्यक्षता में सत्ताईस सदस्यों का एक उच्चस्तरीय समिति नियुक्त की है।

इस उच्चस्तरीय समिति को सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के बाद की यानी 2015 के बाद के विकास के एजेंडे की रूपरेखा तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है। आज दुबारा कुछ कमी-बेशी के साथ उसी तरह की इबारत लिखने से बेहतर है कि सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों का ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाए। इस पर विचार हो कि क्या इससे वाकई कोई बड़ा फर्क आया, गरीबी-भुखमरी कम हुई, या इसके कोई उलटे परिणाम भी सामने आए?

आज वैश्विक स्तर पर इसे सही दिशा देने की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी समूह-77 और चीन पर है, ताकि वास्तव में गरीबी और बेकसी का मुकाबला करते हुए, ‘सतत और टिकाऊ विकास’ की ऐसी इबारत लिखी जाए, दुनिया का बहुसंख्यक यानी हाशिये पर जीने वाला तबका जिसकी उम्मीद लगाए बैठा है। उसके लिए असल मायने में विविधता, सार्थकता और गरिमा से परिपूर्ण सशक्तीकरण हासिल करने के रास्ते खुलें। ये रास्ते


आज तक बनाए नहीं जा सके हैं, और जो बनाए भी गए उन रास्तों को कुछ लोगों के लिए छोड़ कर, बाकी सभी के लिए तंग कर दिया गया है। 

तीसरी दुनिया को एकरूपतावादी मायनों वाले सत्तातंत्र को वैश्विक रूप से चुनौती देनी ही होगी। आज तीसरी दुनिया के देशों को विकास और विशेष रूप से ऊर्जा हासिल करने के लिए, स्वयं की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, आधुनिक और देसी ज्ञान-परंपराओं को बराबर महत्त्व देते हुए स्थानीय और बेहतर उपाय ढूंढ़ निकालने ही होंगे। कब तक उधार के उपायों को हम अपनी परिस्थितियों में लागू करते रहेंगे, यह जानकर भी कि ये हमारे अनुकूल बिल्कुल नहीं हैं, और इसके उलट उपाय न ढूंढ़ कर, यथार्थ से मुंह छिपा कर, परिस्थिति को दूसरों के अनुरूप बनाने की सघन कोशिश की गई है। और यह सिलसिला लगातार जारी भी है। आज नहीं तो कल सभी को समझ में आएगा कि यह एक बड़ी भूल रही है, जिसे हमारे साथ-साथ आने वाली पीढ़ियां भुगतते हुए कोसेंगी।

जब बोलीविया में हुए ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन में एक नई विश्व-व्यवस्था के सपने को साकार करने के लिए व्यावहारिक रास्ते निकालने की कोशिशें की जा रहीं थीं, ताकि सभी इंसान अपनी जिंदगी को बेहतर और गरिमा के साथ जीने लायक बना सकें, उसी समय पड़ोसी देश ब्राजील ने फुटबॉल के खेल का महाकुंभ यानी फीफा विश्व कप आयोजित किया। इस आयोजन के लिए ब्राजील की सरकार ने लगभग ढाई लाख गरीब नागरिकों को उनकी जमीन से, उनके घरों से धमका कर जबरन बेदखल किया। साओ पाउलो, रिओ-डी-जिनेरियो और पोर्टो अलेग्रे जैसे मुख्य शहरों में भारी विस्थापन हुआ। ब्राजील सरकार ने विस्थापित होने वाले लोगों से इस संबंध में किसी प्रकार की बातचीत करने की जरूरत नहीं समझी और एकतरफा फैसला लेते हुए, एक हफ्ते से भी कम समय में, उन्हें अपने घर और जमीन छोड़ देने के लिए कहा। विरोध को कुचलने के लिए हर दमनकारी तरीका अख्तियार किया गया। 

ब्राजील सरकार ने अपने ही बनाए हुए कानूनों का उल्लंघन तो किया ही है, साथ ही वैश्विक मानकों और सिद्धांतों की भी अवहेलना की है। ब्राजील के इन नागरिकों को उनके घर और जमीन से बेदखली के बदले जो मुआवजा मिला है, वह बाजार-मूल्य से भी आधा है। साथ ही, उन्हें जहां पुनर्वासित किया गया है, वे ऐसे दूरदराज के इलाके हैं जहां बुनियादी सुविधाओं का नितांत अभाव है। यही हाल कमोबेश तीसरी दुनिया के सभी देशों का है और इसी दिशा में हमारा देश भी प्रथम पंक्ति में अन्य राष्ट्र-राज्यों के साथ खड़ा है।

आज दक्षिणी दुनिया और तीसरी दुनिया के तौर पर जाने जाने वाले इस वैश्विक समुदाय को अपने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तरों पर एक पुनरवलोकन की आवश्यकता है, कि जिस असमानता को वे अंतरराष्ट्रीय पटल पर महसूस करते हैं, और उसे अपने प्रति अन्याय के तौर पर देखते हैं, क्या वैसा ही सलूक विभिन्न देशों के भीतर कमजोर तबकों के लोगों के साथ नहीं हो रहा है?

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विषमता सवाल उठाने वाले देशों का नेतृत्व क्यों इस बात को नजरअंदाज करता रहता है कि गैर-बराबरी की खाई कैसे उनकी अपनी नीतियों की वजह से बढ़ती जा रही है? वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उत्तर बनाम दक्षिण यानी विकसित बनाम विकासशील का मुद््दा उठाते हैं, मगर खुद अपने यहां ऐसी दुनिया बसा रहे हैं, जिसमें काफी शोषण और विषमता है। साथ ही इसके प्रति विरोध का भाव भी बहुत व्यापक है। यही नहीं, विरोध की आवाजों और अहिंसक आंदोलनों को बुरी तरह से कुचला जा रहा है, और इसके फलस्वरूप हिंसा उत्पन्न हो रही है, जो किसी भी समाज के लिए अच्छी बात नहीं है। 

लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की यह खूबी मानी जाती है कि इसमें समस्याओं का समाधान शांतिपूर्ण तरीकों से निकालने की कोशिश होती है, जिससे हिंसक टकराव की गुंजाइश नहीं रह जाती। लेकिन जब राज्य निहित स्वार्थों के दबाव में काम करने लगता है और कमजोर तबकों के हितों की परवाह नहीं करता, तो वह भय का सहारा लेने लग जाता है। यह लोकतंत्र के बुनियादी चरित्र के खिलाफ है। 

जब भय ही साधन बन जाता है साध्य प्राप्त करने का, तो ऐसे समाजों में अन्य जरूरी पहलू छूट जाते हैं, जिससे मानवीय जीवन को व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से अथर्पूर्ण बनाने का महत्त्वपूर्ण कार्य रह जाता है। कभी कोई भय के जोर पर वर्चस्व स्थापित करेगा और कभी कोई और। यह चलता ही रहेगा, जब तक कि भय को साधन के रूप में इस्तेमाल करने का सिलसिला बंद नहीं हो जाता। इसलिए हृदय परिवर्तन के मार्ग को अपनाने और अहिंसक तरीकों को अख्तियार करने का आज कोई विकल्प नहीं हो सकता।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?