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वक़्त की नब्ज़: चतुर सुजान दरबारी PDF Print E-mail
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Sunday, 22 June 2014 09:35

altतवलीन सिंह

जनसत्ता 22 जून, 2014 : दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों अगर आप धरती से कान लगाकर ध्यान से सुनेंगे तो आपको सुनाई देगी तेज रफ्तार से लोगों के भागने की आवाज। यानी दरबारियों के भागने की आवाज। ऐसा नहीं है कि दिल्ली छोड़ कर जा रहे हैं ये लोग लेकिन ऐसा जरूर है कि एक दरबार को त्याग कर नए दरबार के दरवाजे ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। नए प्रधानमंत्री तक तो पहुंचना कठिन है सो ढंूढ़ते फिर रहे हैं उनके दोस्तों को जिनको मिलने जाते हैं अपनी दरख्वास्तेंं लेकर। 

इस राजधानी में सबसे माहिर, सबसे अनुभवी दरबारी होते हैं पूर्व अधिकारी और पूर्व न्यायाधीश। जब तक कांग्रेस का राज था इनको आसानी से मिल जाते थे रिटायर होने के बाद भी अपने आलीशान सरकारी बंगलों में टिके रहने के बहाने। इसलिए दिल्ली शहर में ऐसी कई सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थाएं हैं जिनके अध्यक्ष या उपाध्यक्ष ये लोग बन जाया करते थे। ऐसे होने से सरकारी मकान भी सलामत रहता था और वह तमाम सरकारी सुविधाएं भी जिनके ये लोग आदी हैं। नए प्रधानमंत्री इस पुरानी परंपरा को जिंदा रखेंगे या नहीं, कोई नहीं जानता इसलिए उनके दोस्तों, अजीजों के दरवाजे खटखटा रहे हैं ये बुजुर्ग खिलाड़ी।

दरबारियों की दूसरी श्रेणी में आते हैं ऐसे लोग जिन्होंने उम्र गुजारी है भारत सरकार के टुकड़ों पर पलते हुए। इनमें वे लोग हैं जिनके करीबी रिश्तेदार या दोस्त हुआ करते थे पिछली सरकार के मंत्री या अधिकारी। उनकी मेहरबानियों से मिला करती थी इन लोगों को कई किस्म की खैरात। कभी उर्दू या संस्कृत को जिंदा रखने के नाम पर, कभी दूरदर्शन के लिए फिल्में बनाने के नाम पर तो कभी महिलाओं या पर्यावरण को बचाने के नाम पर। कई तो इतने सौभाग्यशाली थे कि उनको तीन-तीन किस्म की खैरात मिल जाया करती थी। मैं खुद ऐसे लोगों को जानती हूं जो उर्दू को जिंदा रखने के नाम पर भी पैसे लिए हैं और साथ-साथ पर्यावरण को बचाने के नाम पर भी। जितनी लंबी पहुंच उतनी लंबी जेबें।

आज ऐसे लोग अपने आपको असुरक्षित महसूस करने लगे हैं सो खूब हल्ला मचा रहे हैं मीडिया में संस्थाओं और परंपराओं को सुरक्षित रखने के हवाले से। लंबे लंबे लेख छपे हैं अंग्रेजी के अखबारों में पिछले दिनों, जो साबित करने की कोशिश करते हैं कि इन संस्थाओं और परंपराओं को नुकसान पहुंचता है भविष्य में तो नुकसान लोकतंत्र का होगा।

मेरी अपनी राय है कि ऐसी कई संस्थाएं हैं जिनके जाने से लोकतंत्र का भला होगा। इनमें से सबसे गैरजरूरी संस्था मेरी नजरों में है गवर्नर साहिब की संस्था। क्या वास्तव में आज भी राज्यपालों की जरूरत है? क्या वास्तव में जरूरी है कि जनता के पैसों से ये राज्यपाल ऐसी शान में रहें राज्यों की राजधानी में जैसे कभी अंग्रेजी लाट साहब रहा करते थे? जहां तक मेरा वास्ता रहा है इन राज्यपालों से, तो देखने को मिला यह है कि जब भी राजनीति में इनका दखल रहा है तो लोकतंत्र को नुकसान ही पहुंचा है। याद आती है मुझे आज भी कश्मीर के उन राज्यपाल की हरकतें जिन्होंने श्रीनगर में ऐसे खेल खेले जिनके कारण आम कश्मीरी का लोकतंत्र में विश्वास टूट गया


था। आज जो लोग आसीन हैं राजभवनों में, वे सब सोनियाजी के खास वफादार हैं तो क्या उनको हटाया नहीं जाना चाहिए?

प्रधानमंत्री अगर अपने उस सुशासन वाले वादे को पूरा करना चाहते हैं तो कई संस्थाओं का नामो-निशान तक मिटाना होगा। योजना आयोग और सूचना मंत्रालय इन संस्थाओं में से हैं। इन संस्थाओं को कायम किया गया था पंडित नेहरू के जमाने में क्योंकि उस समय भारत चलने की कोशिश कर रहा था उस रास्ते पर जो सोवियत यूनियन ने दुनिया को दिखाया था। देश की तमाम अर्थव्यवस्था भारत सरकार चलाती थी सो योजना आयोग को इतना ताकतवर बना दिया गया कि राज्यों में भी विकास के फैसले लिए जाते दिल्ली में। आज भी लाइन लगी रहती है मुख्यमंत्रियों की योजना आयोग के दरवाजे पर। ऐसा क्यों?

रही सूचना-प्रसारण मंत्रालय की बात तो पूर्व मंत्री, मनीष तिवारी, खुद कह गए थे जाते-जाते कि इस मंत्रालय को खत्म कर देना चाहिए। इसके खत्म होने की बातें बल्कि चल रही हैं उस समय से जब लालकृष्ण आडवाणी यहां मंत्री बने थे 1977 वाली जनता पार्टी सरकार में। इंदिरा गांधी के इमरजंसी में इस मंत्रालय की भूमिका बड़ी गलत रही थी तो कई सुझाव आए इसको बंद करने के लेकिन अमल होने तक जनता सरकार ही खत्म हो गई थी। आज जब इंटरनेट ने सूचना के इतने अवसर खोल दिए हैं कि सरकारें झूठा प्रचार कर ही नहीं सकती है तो क्या काम है इस मंत्रालय का?

प्रधानमंत्री अगर परिवर्तन लाना चाहते हैं प्रशासनिक तरीकों में जरूरी है ऐसी कई पुरानी संस्थाओं को समाप्त करना लेकिन ऐसा करना आसान न होगा। दबाव आएगा हर किस्म के दरबारियों से जिनकी रोजी-रोटी निर्भर है दूरदर्शन पर क्योंकि कोई भी निजी चैनल इनको वह मौके नहीं देगा उन रद्दी, उबाऊ किस्म की फिल्में बनाने का जो दूरदर्शन का तकिया कलाम बन चुकी हैं। दिल्ली के दरबारी इतनी आसानी से नहीं आने देंगे परिवर्तन को क्योंकि जानते हैं कि इस परिवर्तन से उनको निजी तौर पर खतरा है।

यह दरबारी चतुर भी हैं और इस खेल में अनुभवी भी सो परिवर्तन को रोकने की इनकी पूरी कोशिश रहेगी। अभी से नए मंत्रियों को ऐसे लोगों की दावतों में देखा जा रहा है जहां कल तक नरेंद्र मोदी का नाम सुनते ही लोग हाय-तौबा मचाया करते थे। इन ही दावतों में आज उनके गुण गाए जा रहे हैं क्योंकि दिल्ली के दरबारी अच्छी तरह जानते हैं कैसे खेला जाता है झूठी वफादारी जताने का खेल।


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