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प्रतिक्रिया: उम्मीद रखना अपराध नहीं PDF Print E-mail
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Sunday, 22 June 2014 09:33

अवनिजेश अवस्थी

जनसत्ता 22 जून, 2014 : आखिरकार वही हुआ जो अब तक होता आया है- अपने लेख की प्रतिक्रिया में आई टिप्पणियों के जवाब में उदयन वाजपेयी (‘यह खेल नियमों के खिलाफ है’, 15 जून) सफाई देने लगे कि ‘मैंने अपने लेख में यह कहीं नहीं लिखा कि मैं मौजूदा शासन का समर्थक हूं। एक लेखक के नाते मैं चाहूं भी तो ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि तब मैं अपने लेखक धर्म का त्याग कर रहा होऊंगा।’ जिन वामपंथियों के समक्ष वे यह सफाई पेश कर रहे हैं, वे हमेशा राजनीतिक दल की शाखा के रूप में ‘लेखक संघ’ बना कर संबंधित दल के राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति में जी-जान से लगे रहे हैं। इसलिए उनके समक्ष यह सफाई बिल्कुल बेमानी है, लेकिन क्षोभ इस बात का है कि जिस मुद्दे से उदयनजी ने बात शुरू की थी वह न जाने कहां और क्यों बिला गया। 

वास्तविक मुद्दा तो दरअसल था- ‘पिछले छह दशकों से वंशवाद का वहन कर रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस बार बुरी तरह हार गई और शायद एक ऐसी स्थिति को प्राप्त हो गई है, जहां से उसका शक्ति-संपन्न होकर वापस लौटना कठिन होगा। अगर यह हो सका तो केवल इस सूरत में होगा, जब वह अपने ऊपर से गांधी-नेहरू परिवार का बोझ उतार डालेगी। वरना एक ऐसे वंश को, जिसने विगत सात दशकों तक मोटे रूप से भारत को पश्चिमीकृत करने का विराट उपक्रम किया और उसके लिए भारत के अपने पारंपरिक विमर्श को (जो अंगरेजी शासन के कारण हाशिये पर फेंक दिया गया था) दुबारा आयत्त करने का वह प्रयास नहीं किया, जो हमें स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सहज ही करना चाहिए था।’ 

आजादी के बाद नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक जैसे प्रधानमंत्री हमेशा इस हीन भावना से न केवल खुद ग्रस्त रहे, बल्कि एक ऐसा बौद्धिक वातावरण भी तैयार करते रहे कि आज हम (भारतवर्ष) जो भी हैं- प्रशासनिक और शैक्षणिक दृष्टि से- केवल अंगरेजों के कारण हैं। स्वतंत्रता के तत्काल बाद तो यह एकदम से संभव नहीं था। स्वाधीनता आंदोलन को अपनी आंखों से देखने और उसमें हिस्सा लेने वाली पीढ़ी उस समय तक विद्यमान थी। दूसरे, राजेंद्र प्रसाद और लालबहादुर शास्त्री सरीखे नेताओं वाली कांग्रेस तब तक जिंदा थी, लेकिन इंदिरा गांधी ने अपना राजनीतिक वर्चस्व प्राप्त करने के लिए जो मार्ग अपनाया, उसमें नूरूल हसन जैसों को आगे बढ़ना उन्हें सहज दिखा। 

नूरूल हसन ने शिक्षामंत्री रहते भारत के समूचे बौद्धिक विमर्श को उन वामपंथियों की जागीर बना दिया, जो पढ़े तो अमेरिका-इंग्लैंड में थे और बात सोवियत रूस की करते थे। धीरे-धीरे समूचा विमर्श ऐसे व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सिमट गया, जिनके बारे में यह प्रसिद्ध था कि रूस-चीन में बारिश होने पर वे नई दिल्ली में छाता खोल लेते हैं- ये तमाम लोग समवेत स्वर में एक ही बात को इतनी बार और इतने तरीके से बोलते-लिखते थे कि झूठ ही सच लगने लगता था। ये तमाम भारत-विमुख लोग भारत को पिछड़ा, परंपरा-विपन्न, अंधविश्वासी और सपेरों का देश साबित करने की अपनी कोशिशों में लगातार लगे रहे। 

हैरत की बात है कि उदयनजी ने धर्मपाल जैसे इतिहासविद् (जिसका लंबा साक्षात्कार उदयन ने खुद लिखा था) की उन धारणाओं का उल्लेख तक नहीं किया, जो उनके इस मुद्दे को कि अब ‘शायद भारत का पारंपरिक विमर्श’ फिर से केंद्र में आए, बहस के केंद्र में ले आता। धर्मपालजी का समूचा चिंतन उस पूरे के पूरे भारत-विमुख विमर्श का बड़ा सटीक और स-तर्क उत्तर है, जो इस देश में नूरूल हसन के बाद शुरू हुआ है। 

दरअसल, उदयनजी इस खेल को समझ ही नहीं पाए और बात करने लगे खेल के नियमों की। सच्चाई यह है कि बहुत से लोगों को नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री


बनना पसंद नहीं आ रहा- इसमें कोई हर्ज भी नहीं है, यह उनकी व्यक्तिगत पसंद हो सकती है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में ऐसी नापसंदगियों का पूरा सम्मान होना चाहिए, लेकिन उसके साथ यह भी सच है कि लोकतंत्र में आस्था रखने वाले व्यक्ति को लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर आए व्यक्ति के प्रति उम्मीदों से भरा होना चाहिए, शंकाओं-संदेहों से नहीं। यह उम्मीद वास्तव में किसी व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि उन करोड़ों मतदाताओं-नागरिकों के प्रति है, जिन्होंने उस व्यक्ति में अपना भरोसा जताया है। 

अजीब बात है कि आज इस भाजपा और मोदी के सत्ता तक पहुंचने का विश्लेषण मौजूदा संसदीय व्यवस्था में लोकसभा में जीती गई सीट के आधार पर न होकर प्राप्त मत प्रतिशत के आधार पर करने का प्रयास हो रहा है। अब तक के तमाम लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव इस बात के उदाहरण हैं, जिसमें सरकार बनाने वाले दल को चालीस प्रतिशत से भी कम मत प्राप्त हुए। जम्मू-कश्मीर और असम में तो मतदान का प्रतिशत कई बार इतना कम रहा कि उसे चुनाव ही नहीं माना जाना चाहिए था। लेकिन मौजूदा संवैधानिक और संसदीय व्यवस्था मत प्रतिशत की नहीं, चुन कर आए सदस्यों की बात करती है, फिर आजादी के बाद अब तक हुए चुनावों में ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जिनमें जीत का अंतर मात्र सौ या कई बार दस से भी कम रहा है- तो उस जीत का विश्लेषण भी मत प्रतिशत के आधार पर हो सकता है! 

इसलिए मूल मुद्दा वह होना चाहिए था, जिसकी तरफ उदयनजी ने शुरू में ही संकेत किया है कि ‘मेरा पक्का विश्वास है कि आने वाले दिनों में देश में राजनीतिक विमर्श की भाषा बदलेगी और उसमें वे सारे अदृश्य सेंसर, जो हमारे तथाकथित कम्युनिस्ट और अंगरेजीदां बौद्धिकों ने लगा रखे हैं, झर जाएंगे।’ सचमुच अगर बहस करनी है, तो इस पर होनी चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्यों हुआ कि अब तक का समूचा (कथित) बौद्धिक विमर्श भारत को पश्चिमी नजरिए से देखने का इतना अभ्यस्त ही नहीं, आग्रही हो गया कि उसे अपने अतीत में कुछ भी अच्छा देखने को नहीं मिलता। 

वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास की जो मनगढ़ंत व्याख्याएं कीं, उनमें विदेशी आक्रांत तो अत्यधिक न्यायप्रिय सहृदय, प्रजा-पालक, प्रजा-रक्षक और महान हो गए और अपनी स्वतंत्रता के लिए मर-मिटने वाले गुरु तेगबहादुर लूटपाट करने वाले और उनकी शहादत को उनके ही परिवार द्वारा हत्या का षड्यंत्र का परिणाम बताया जाने लगा। उम्मीद, अच्छे दिन आने की आस और शायद कुछ नया होने की संभावना इस बात में देखी जानी चाहिए कि अब विमर्श इस तरीके का हो, जिसमें भारत को देखने के लिए चश्मा भी भारतीय हो। टेक्नोलॉजी बेशक विदेशी हो, पर उसका उपयोग भारतीय मेधा को विकसित करने में हो। औद्योगिक उत्पादन बढ़े, पर पर्यावरण की भेंट चढ़ा कर नहीं। लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार से ऐसी उम्मीद रखना, आस लगाना भी क्या अब अपराध माना जाएगा? 


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