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दक्षिणावर्त: वे चालीस भारतीय PDF Print E-mail
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Sunday, 22 June 2014 09:27

altतरुण विजय

जनसत्ता 22 जून, 2014 : शायद एक मौका मिला था कि वे चालीस भारतीय, जो इराक में इस्लामी जिहादियों की गिरफ्त में फंस गए, बच सकते थे। और वह मौका था अपनी कंपनी के मालिक से बिना वेतन वगैरह भुगतान पाए चले आते।

वक्त मिल जाता और वे शायद, और यह ‘शायद’ बहुत बड़ा शायद है, क्योंकि पक्का अभी कुछ पता नहीं है, सुरक्षित आ जाते। लेकिन मेहनत मजदूरी की थी, घर में परिवार संभालना था, उनके लिए ही तो इतनी दूर विदेश में दर-दर भटकना मंजूर किया था। तो कह दिया- जाएंगे तो पूरी पगार, बकाया पैसा लेकर जाएंगे। इसी में वह देरी हुई, वे विद्रोहियों की पकड़ में आ गए।

यहां जिहाद पर चर्चा भी की जा सकती है। ये बड़े बहादुर, गोला-बारूद से दुनिया दहलाने वाले लोग हैं, जो किसी मजहब के नाम पर इतनी तबाही मचाते हैं। कभी छोटी-छोटी स्कूल जाने वाली तीन सौ बच्चियों को अफ्रीका में बुका हरम के लोग अगवा कर लेते हैं। वे कभी निर्दोष, मजदूर-कामगारों को, जो विदेश में- इराक में आजीविका कमाने आए, उनका इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक ऐंड सीरिया के लोग अपहरण कर लेते हैं। बड़े बहादुर और आध्यात्मिक बंदूक वाले हैं ये! 

पर ये भारतीय कौन थे, जो इराक गए? एजेंटों को भारी पैसा दिया। वहां जाकर नौकरी करेंगे, एक-एक कमरे में आठ-दस रह लेंगे, साफ-सफाई का खयाल न होने दो, इज्जत-बेइज्जती की संवेदना हो या नहीं, बस काम मिल जाए, पगार ठीक रहे, घर कुछ भेजा जा सके, साल-दो साल कट जाएं, बच्चों, पत्नी या माता-पिता के लिए कुछ खुशी का सबब बन सके, इतने भर के लिए जिंदगी कोल्हू के बैल की तरह जुत जाए। 

गरीब होना गुनाह है और भारत जैसे देश में गरीब होना तो और भी गुनाह है, जहां धन की निर्लज्ज अतिशयता में डूबे लोग गरीबी हटाने की योजनाएं बनाते हैं। और यही गरीब लोग बस्तर, दंतेवाड़ा में अगर माओवादियों की बर्बरता का शिकार बनते हैं तो वही इराक में विद्रोहियों का चारा हो जाते हैं। कभी करोड़पतियों पर इन दोनों किस्मों के बहादुरों का खौफ टूटते देखा है आपने? 

देश में नर्सों की संख्या दुनिया में सबसे कम क्यों है? सवा अरब के भारत में प्रति दस हजार जनसंख्या पर मात्र आठ चिकित्सा सहायक या नर्सों की संख्या बताई जाती है, जो शेष दुनिया के स्तर से काफी कम है। नर्सों के संगठन बताते हैं कि गरीबी इतनी ज्यादा है, जिसकी वजह से पढ़ाई और दहेज का खर्च निकालने के लिए नर्सों को विदेश में मजदूरी ढूंढ़ने पर मजबूर होना पड़ता है। 

यह है भारत के प्रतिभाशाली हिम्मती, कुशल पर गरीब युवाओं की दास्तान। अगर नर्सों को भारत में ही अच्छी नौकरी मिले, तो वे क्यों सउदी अरब, इराक, ईरान जैसे देशों में जाने को मजबूर हों? इराक के मोसुल और तिकरित से खबरें आर्इं तो नर्सों ने भी कह दिया था कि पगार या भुगतान लिए बिना हम स्वदेश नहीं जाएंगी। क्यों कहा होगा? जान जोखिम में डाल कर भी पगार लेने की जिद क्यों ठानी होगी? जो मुफ्त की खाते हैं और दूसरों के पैसों पर लीडरी करते हैं, वे न तो गरीब होने का मतलब समझ सकते हैं और न ही घर-परिवार, देश मजबूरी में छोड़ कर पैसा कमाने के लिए बाहर जाने की जद्दोजहद का मतलब। 

इन गरीबों की सुनता भी कौन है? तमिलनाडु की सुमति अभी तक अपने पति के शव की प्रतीक्षा कर रही है। उसका पति पलानी सामी जून, 2012 में सउदी अरब के जुबैर नगर में एक निर्माण कंपनी में मजदूर के नाते काम करने गया था। पंद्रह महीने बाद 16 सितंबर, 2013 को उसके पति के साथ कमरे में रहने वाले मित्र ने रात में फोन पर बताया कि पलानी सामी ने पंखे पर लट कर आत्महत्या कर ली। सुमति खुद करायकल के घरों में साफ-सफाई का काम करती है, उसके दो बच्चे हैं। वह दर-दर भटकी, कलेक्टर के पास गई। पर उसके पति का शव तक नहीं मिला। 

सुमति का दुख कौन बांट सकता है? गरीब है, भारतीय है, तो अपने पति की अचानक मृत्यु के रहस्य से परदा उठाने की तो बात ही दूर, उसके पार्थिव शरीर तक का दर्शन उसके नसीब में नहीं। 

भारत


का नागरिक होने का अर्थ कुछ और गौरवशाली, कुछ और अभिमानी, कुछ और शक्तिशाली होना चाहिए था। पर भारतीय नागरिक सउदी अरब में मृत पाया जाता है, तो उसकी जांच की संभावना नहीं होती। यह है आज भारतीय होने का अर्थ! गरीब, बदहाल, बेचारा, दब्बू, आजीविका के लिए देश छोड़ने पर मजबूर भारतीय। 

और उस पर धार्मिक भेदभाव भी सहना पड़ता है। इस्लामी देशों में काम करने वाले भारतीय हिंदू के अंतिम संस्कार की इजाजत नहीं है। केवल भारतीय मुसलिमों को वहां दफनाया जा सकता है। 

ऐसी खबरों पर गुस्सा भी नहीं किया जाता। मामला सेक्युलर मुद्दा बना दिया जाता है। 28 फरवरी, 2014 को आइएएनएस ने छापा कि रियाद के पास पांच भारतीयों को तीन सउदी लोगों ने जिंदा जमीन में दफ्न कर दिया और इस अपराध को बाद में कबूल भी किया। वे पांच भारतीय कौन थे? क्यों उनके हाथ-पांव बांध कर, मुंह में रूई ढूंस कर जमीन में गड्ढा खोद कर उसमें उनको गाड़ दिया गया? क्या किसी उस अखबार ने, जो पहले पन्ने पर प्रीति जिंटा और नेस वाडिया को छाप रहा है, इन पांच भारतीयों के जिंदा दफ्न किए जाने की जांच की या महत्त्व के साथ इसे छापा? 

भारतीय सिर्फ अंबानी, लक्ष्मी मित्तल या टाटा नहीं हैं। सवा अरब भारतीयों की जब बात होती है, तो उनमें उनकी संख्या ज्यादा होती है जो खेतों में काम करते-करते उम्र से पहले बूढ़े हो जाते हैं, जिनके बच्चे अविकसित, पिछड़े, सड़क, बिजली और अच्छे स्कूल के लिए तरसते गांव छोड़ कर इराक जाना जिंदगी को कुछ जीने लायक बनाने के लिए जरूरी समझते हैं। 

यह देश दिखावटी नेताओं और अफसरों का देश है। नेताओं के काफिले देखिए, उनके सिपहसालारों के बंगले देखिए, दिल्ली की फुटपाथों से लेकर लखनऊ के हजरतगंज की सड़कों के बीच बने विभाजन पर सोते लोग, मुंबई में धारावी और सड़कों पर ही जन्मते, जीते और मरते भारतीय। चेन्नई के मरीना सागर तट पर बिखरी गरीबी का रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य, लेह में ऋण दस से ऋण बीस के बीच देमछोक से चांगला दर्रे तक सड़कें बनाते, बर्फ हटाते छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और ओड़िशा के मजदूर। जहां कोई जाने और काम करने को तैयार नहीं होता, वहां ये जाने को सिर्फ इसलिए तैयार होते हैं, क्योंकि इनके अपने गांव और इलाके के आसपास काम नहीं, रोजगार नहीं, पगार नहीं। 

चालीस लाख भारतीय कामगार तो केवल मध्य पूर्व में काम करते हैं। उनके अधिकारों की रक्षा कौन करता है? भारतीय एजेंट उस पर उनको गैर-कानूनी ढंग से ले जाते हैं, विदेश में भाषा और संबंधों से अजनबी भारतीय घुट-घुट कर एक बंधक मजदूर की जिंदगी जीता है। हाल ही में सूडान से लौटे भारतीय मजदूरों की दर्दनाक कहानियां रोंगटें खड़े करती हैं। जब शोषण और अत्याचार का मामला होता है तो मध्य पूर्व के इस्लामी देश हिंदू-मुसलिम-ईसाई नहीं देखते, वे सिर्फ पैसा देखते हैं।

भारत में 94 प्रतिशत कामगार असंगठित क्षेत्र के हैं, जिनमें सर्वाधिक संख्या कृषि, बागबानी, पशुपालन में हैं। बड़ी कंपनियों और सरकारी क्षेत्र में सिर्फ सात प्रतिशत मजदूर हैं। जहां तक मजदूर यूनियनों का प्रश्न है, भारत में उनसठ हजार मजदूर संगठन पंजीकृत हैं, इनमें सबसे बड़ा भारतीय मजदूर संघ, फिर इंटक, सीटू आदि आते हैं। अकेले केरल प्रांत में 9800 मजदूर संगठन पंजीकृत हैं। लेकिन नतीजा क्या निकला? 


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