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प्रसंग: उम्मीद के खिलाफ ईमानदार संदेह PDF Print E-mail
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Sunday, 22 June 2014 09:22

प्रभु जोशी

जनसत्ता 22 जून, 2014 : इस समय देश के समाचार-पत्रों और तमाम टेलीविजन चैनलों पर नरेंद्र मोदी के सिंहासनारूढ़ होने को लेकर विश्लेषणों की लगभग एक असमाप्त-सी जान पड़ती शृंखला चल रही है। प्रतिभाशाली विश्लेषकों और विमर्शकारों के जत्थे अपने-अपने उपकरणों के जरिए, आंकड़ों और उपलब्ध जानकारियों की परत-दर-परत पड़ताल करते हुए, देश को यह बताने में अपना अमूल्य ज्ञान-निवेश कर रहे हैं, कि ‘नमो’ ने भारतीय मतदाता के सात्विक क्रोध का, अपने राजनीतिक विवेक से कितना और कैसा सफल दोहन किया है कि वे दशकों बाद एक ढीली-ढाली जनतांत्रिक प्रणाली को, पूरी तरह ‘एक दलीय वर्चस्व’ के नीचे ले आए हैं। वे निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि अब भारत एक दृढ़ ‘राष्ट्र-राज्य’ की हैसियत से शेष विश्व से रूबरू होगा। 

क्या यह विराट मोदी-विजय, इस जर्जर हो चुके ‘राष्ट्र-राज्य’ के पुनर्निर्माण में इस सीमा तक कामयाब हो सकेगी कि भारत एक ऐसे सशक्त राष्ट्र-राज्य के रूप में दिखाई दे, जिसका स्वप्न नेहरू देखा करते थे? उसे यथार्थ की आंशिक परिणति तक पहुंचाने वाले दृढ़-प्रतिज्ञ पुरुष थे वल्लभ भाई पटेल, क्योंकि भारत के एकीकरण का दुस्साध्य काम उन्होंने ही पूरा किया था। इसीलिए वे कद्दावर हैं। लोग नरेंद्र मोदी को पटेल का अवतार सिद्ध करने पर तुले हुए थे। 

दरअसल, नेहरू के पास ‘राष्ट्र-राज्य’ की अवधारणा, मूलत: यूरोपीय अनुभव से निथर कर आई थी, जिसके चलते वे नव-स्वतंत्र भारत में एक ऐसी ‘भारतीय जातीयता’, जिसे वे ‘हिंदुस्तानी-कौम’ कहा करते थे, का निर्माण करना चाहते थे, जो ‘राष्ट्र-राज्य’ के समतुल्य तो हो, लेकिन उसमें ‘जातीय-बहुलता’ और ‘धर्मों की भिन्नता’ कतई विनष्ट न हो। इसके राजनीतिक प्राधिकार के लिए, उन्होंने कानून-व्यवस्था की ऐसी संवैधानिक सुसंगति भी निर्मित की, जिसने वंचित जातियों को आमतौर पर और ‘पृथक धार्मिक पहचान’ को खासतौर पर सुरक्षा कवच प्रदान किया। उन्हें यकीन था कि उक्त यूरोपीय अवधारणा पर खड़े किए गए ‘राष्ट्र-राज्य’ को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता अविलंब मिल जाएगी। लेकिन इस तरह के आग्रहों के चलते वे भारत को एक मनोवांछित ढंग से ‘सॉफ्ट-स्टेट’ बनाए रखने में लगे रहे। 

पर भारत को उन्होंने एक ‘सेक्युलर’ राष्ट्र बनाने का जो संकल्प लिया था, वही आग्रह राष्ट्रवादियों द्वारा अब भी अभिशाप की तरह व्याख्यायित होता रहा आया है। सांप्रदायिकता’ के अनियंत्रित उभार की जड़ में, वे इसी को मानते हैं। कश्मीर समस्या के विकराल होने के लिए भी लगातार इसी को मुख्य दोषी बताया जाता रहा है। सारे ‘राष्ट्रवादी’, अल्पसंख्यक के प्रति बरती गई नरमी को कांग्रेस के खून में शामिल असाध्य रुग्णता की तरह चिह्नित करते हुए बताते रहे हैं कि देश ने एक बड़े ‘जातीय-धार्मिक विभाजन’ की विभीषिका को इन्हीं की वजह से झेला, जिसके खून के छींटे किसी महायुद्ध के जनसंहार से कमतर नहीं थे। निश्चय ही यह अखंड भारत के स्वप्नभंग की त्रासदी की तरह ली गई और अंतत: अंध-राष्ट्रवाद ने ‘अल्लाह तेरो नाम’ गाने वाले गांधी के सीने को गोलियों से छलनी कर दिया। 

उनका कहना तो यहां तक रहा है कि नेहरू की इस अवधारणा में ही मूल-संरचनागत त्रुटि अंतर्निहित थी कि स्वतंत्रता के पांच वर्षों के भीतर ही भाषाई आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन करने की विवशता पैदा हो गई। उसको भी वल्लभ भाई पटेल ने संभव किया। 

कुल मिला कर, लगभग साठ वर्षों से देश और उसकी जनता को तरह-तरह के प्रयोगों से गुजरने को बाध्य होना पड़ा, जिसमें पड़ोसी राष्ट्रों से तीन-तीन युद्ध, अभिव्यक्ति के अपहरण वाला आपातकाल, खालिस्तान निर्माण का शंखनाद, बाबरी मस्जिद ध्वंस, मंडल आयोग और कट््टर जातिवादी राजनीति के प्राकट्य के साथ ही कई अन्य अध्याय खुले, जिन्होंने ‘राष्ट्र-राज्य’ के नरम नहीं, बल्कि देशवासियों के भी निहायत दुर्बल होने के प्रमाण दिए। कांग्रेस ने ‘बेल-आउट डील’ पर हस्ताक्षर करके भारत को विश्व-अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने का बहुप्रचारित श्रीगणेश किया, तो लगा कि अर्थव्यवस्था के स्तर पर हम जितने वैश्विक हो रहे हैं, सांस्कृतिक चेतना के स्तर पर उतने ही अधिक स्थानीय और क्षेत्रीय। नतीजतन, संघीय एकीकृत राष्ट्र-राज्य खंड-खंड होने लगा और धड़ाधड़ छोटे-छोटे नए राज्यों के लिए आंदोलन तेज हुए। 

इस तरह सारे प्रदेशों के भीतर, बांटने वाली एक खतरनाक राजनीति आई, जिससे नवसामंतों का आधिपत्य बढ़ा। ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रवाद’ दोनों ही शब्द खोखले होकर खुली लूट का पर्याय बन गए। राजनीति में तुष्टीकरण, जाति और धर्म के आधार पर इतना बढ़ा कि बहुसंख्यक नागरिक समाज को लगा कि उसका सांस्कृतिक प्रभुत्व क्षीणतर होता जा रहा है। वे अपनी अस्मिता की सनातन पहचान ही खोते जा रहे हैं। 

इसी बहुसंख्यक नागरिक समाज को इस कुहासे के बीच लगा कि उनके हितों को निर्भीक संरक्षण देने वाला कोई ‘महानायक’ होना जरूरी है। मीडिया साम्राज्यवाद और राष्ट्रीय पंूजीवाद ने नरेंद्र मोदी को उस मुक्तिदाता के फे्रम में इस तरह फिट कर दिया कि


उन्हें लगा कि बस यही इतिहास के लौहपुरुष की तरह का वह बहुप्रतीक्षित सत्ता-पुरुष है, जो इस महादेश को महान राष्ट्र के मार्ग पर ले जा सकता है। 

पर क्या नरेंद्र मोदी एक ऐसे सशक्त ‘राष्ट्र-राज्य’ के निर्माण का संकल्प पूरा कर सकेंगे? हालांकि, वे बहुसंख्यक समाज की अस्मिता को पुनर्जीवित करने वाले प्रतीक-पुरुष के रूप में देखे जा रहे हैं और उनसे उम्मीद लगाई जा रही है कि वे ढीले-ढाले ‘राष्ट्र-राज्य’ की लद्धड़ शासन प्रणाली को छोड़ कर ‘एकीकृत नागरिक समाज’ के निर्माण और उसमें विकास के वित्त-पोषित रूप को साकार करने वाले हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय पंूजी के वर्चस्व के नीचे कोई ‘राष्ट्र-राज्य’ अपनी संप्रभुता की रक्षा कर पाया है? 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वदेशी का डंका बजा कर सिंहासनारूढ़ हुई वाजपेयी सरकार ने उसकी मूल परिकल्पना वाले गोविंदाचार्य को बिना किसी संकोच के राजनीतिक वनवास देकर, आखिरकार नरसिंह राव की ही नीतियों को आगे बढ़ाया था। क्या यह संभव है कि नरेंद्र मोदी ‘मनमोहनोमिक्स’ की परंपरा की अगली कड़ी बनने से इनकार कर देंगे? बिल्कुल नहीं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पंूजी इनकी भी पथ-प्रदर्शक है और रहेगी। हां, यह मनमोहन के उलट, अपने निजी ‘मनमानेपन’ को ‘जग-जानापन’ बताते हुए किसी भी असहमति को सिरे से खारिज करके कोई भी बड़ा फैसला कर सकते हैं, चीन के सत्ताधारी की तरह। लेकिन यह भी उदाहरण है कि राष्ट्रवादी सत्ताकांक्षाएं ‘टेक्नोस्केप’ को भी ‘इथनोस्केप’ के भीतर ले जाकर छोड़ देती हैं, जो निश्चय ही एक खतरनाक रास्ता है। कहना न होगा कि वे इसे अपनी देशभक्ति का महान दायित्व मान लें, लेकिन ऐसे में देशभक्ति को राष्ट्रवाद से बचाने की जरूरत होगी। 

यह अप्रत्याशित नहीं कि फैसले की घड़ी में किसी दिन लोकप्रियता के घोड़े से उतर कर वे ऐरावत पर सवार हो जाएं, लेकिन यह पटेल-सा पराक्रमी होना नहीं होगा। क्योंकि वे तो पैदल चलते कद्दावर थे। 

बहरहाल, नरेंद्र मोदी ने विश्व-मंच पर ‘इंडिया’ का मुखौटा लगा कर चहलकदमी करते राष्ट्र को ‘भारत’ का चेहरा देने का संकल्प प्रकट करते हुए, हिंदी की वापसी को सत्ता के किले में संभव बनाने की पहल शुरू कर दी है। यह उनके राष्ट्रवादी कद को बढ़ाने वाला करिश्मा है। लेकिन ‘बहुसंख्यक की अस्मिता का उदयगान’ करती उनकी विजय, क्या भारत को पैंसठ बरस के ‘नरम-राज्य’ के छविगृह से निकालने के लिए कश्मीर के गले में पड़ी धारा-370 की कंठी को उतार फेंकने के लिए उतावला नहीं बनाएगा? क्या वे ‘समान नागरिक संहिता’ के न्यायघर के फैसले को लाल कपड़े की पोटली से बाहर नहीं निकालेंगे? 

यह सब करते हुए उन्हें, यह भली-भांति याद होगा कि उन्हें भारतीय संविधान का कौन-सा पाठ याद रखना है और कौन-सा हमेशा के लिए भुला देना है। पर उन्हें यह तो निश्चय ही याद होना चाहिए कि अतीत को याद रखने से भी सत्ताएं बनती हैं और अतीत को भूलने से सत्ताएं ढहती भी हैं। कहना न होगा कि अभी तक की हकीकत यही बताती रही है कि ‘ढहती सत्ता’ के दृश्य में ‘नायक’, सहसा ‘अधिनायक’ बन जाते हैं। दुनिया भर की राजनीति में इसके डराने वाले उदाहरण भरे पड़े हैं। 

बेशक नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को संसद में विपक्षी बनने की हैसियत से लगभग शून्य कर दिया है, लेकिन भाजपा को संज्ञा-शून्य। अब सोचने का काम भाजपा का नहीं रह गया है। सिंहासन पर मोदी सरकार है और मोदी-नीति ही भाजपा है। और, वे ही शून्य के सामने अकेले खड़े हैं। भविष्य का गणित जानने वाले अच्छी तरह बता सकते हैं कि शून्य के आगे खड़े होने का अर्थ क्या होता है। बहरहाल, बहुल के बीच उम्मीद की मार्केटिंग से सत्ता में आए मोदी के कद्दावर कदम किस ओर बढ़ेंगे, इसके लिए अभी कुछ समय ठिठक कर देश को देखना होगा। तब तक ‘अच्छे दिनों’ की उम्मीद के खिलाफ एक ईमानदार संदेह करना ‘नमो’ और ‘राष्ट्र’ दोनों के लिए शुभ है।


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