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परिवर्तन का शुरुआती दौर PDF Print E-mail
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Friday, 20 June 2014 09:19

योगेश अटल

 जनसत्ता 20 जून, 2014 : आज की राजनीति का बदलता स्वरूप अतीत की आंख से नहीं देखा जा सकता। जब भी हम पीछे देखते हैं तो बहुत से लोगों को एक स्वर्णिम युग दीख पड़ता है। उसके आलोक में जब हम वर्तमान में होने वाले परिवर्तनों को देखते हैं तो सब कुछ बुरा दीख पड़ता है। प्रश्न यह है कि क्या हम फिर से इतिहास के अंधेरे गलियारे में लौटना चाहते हैं? या फिर हम वर्तमान के उन काले धब्बों की ओर अंगुली उठा रहे हैं, जो हमें पिछड़ा बनाए हुए हैं? जिस प्रकार मोदी आगे बढ़ रहे हैं उससे लगता है कि वे वर्तमान के आधार पर देश का भविष्य गढ़ना चाहते हैं, जो है उसमें से शुभ को स्वीकार करना चाहते हैं और जो विकार है उसका परिहार या परिष्कार करना चाहते हैं। वे पिछला सब कुछ नेस्तनाबूत करने के पक्ष में नहीं हैं। वे आगे के रास्ते की खोज में हैं। 

यही सही मार्ग है। वर्तमान को धरा-ध्वस्त कर उसके मलबे पर नए भवन का निर्माण करने की आवश्यकता नहीं है। जब भी ऐसे प्रयास हुए हैं वे सभी सफल नहीं हुए। साम्यवाद की हथौड़ी से टूटे हुए और अपनी संस्कृति से भटके हुए समाज आज फिर संक्रमण की स्थिति में आ गए हैं। चुनावी चर्चा और भाषणों में अतिशयोक्ति का होना और जनादेश मिलने पर राजकाज संभालना दो अलग-अलग बातें हैं। शासन में फेर-बदल तो होंगे ही, पर साथ में नैरंतर्य का बना रहना भी जरूरी है। आखिर आज का भारत 1947 के भारत से बहुत भिन्न है और कई मायनों में श्रेष्ठ भी है। नए शासन का ध्येय यह होना चाहिए कि समाज के विकारों को दूर करे और विकास के मार्ग की नई दिशा की खोज करे और उस पर अग्रसर हो। मोदी सरकार के प्रारंभ के ये दिन यही आशा जगाते हैं। देखना होगा कि कितना हो पाता है।    

स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद जो आशा की लहर चली थी वह कालांतर में निराशा के सिलसिले में परिणत हो गई। एक ओर तो लोगों की आशाएं और अपेक्षाएं बढ़ती गर्इं तो दूसरी ओर सत्तासीन लोगों में स्वार्थ का फेविकोल लगता रहा। केंद्र में कुछ अपवादों को छोड़ कर कांग्रेस का वर्चस्व दशकों तक बना रहा। राज्यों में परिवर्तन तो हुआ, पर उन्हें भी केंद्र की चाबी ही चलाती रही। यह सचमुच पहली बार हुआ है कि अन्य यानी कोई गैर-कांग्रेसी पार्टी पूरे बहुमत के साथ केंद्र में सत्तासीन हुई है। यों केंद्र में यह भाजपा का दूसरा दौर है। पहली दफा जब केंद्र में सत्तारूढ़ हुई थी, तो करीब दो दर्जन दलों का गठबंधन बनाना पड़ा था। फिर, उसके बाद जो दूसरी सरकारें बनीं, चाहे वे संयुक्त मोर्चे ा तीसरे मोर्चे की थीं या कांग्रेस की, गठबंधन के सहारे ही बनीं। पिछले तीन दशक में यह पहली बार हुआ कि किसी दल को अपने बूते बहुमत हासिल हुआ है। यह भाजपा की अपूर्व सफलता है। 

आज कांग्रेस में मौन छाया हुआ है और भाजपा नई ऊर्जा के साथ केंद्र की बागडोर संभाले हुए है। निश्चित ही नई अपेक्षाएं जागी हैं। 

एक जीवंत समाज के लिए यह आवश्यक है कि वह परिवर्तन को प्रश्रय दे। अवश्य ही संस्कृति के कपाट आवागमन पर रोक लगाते हैं। उत्साह में हमने विगत में बाहर से कई मूल्यों, संस्थाओं, और व्यवहारों का आयात किया और हमारी समृद्ध संस्कृति ने उन्हें अपने ढंग से ही अंगीकार या फिर अस्वीकार किया। यह हमारी संस्कृति का लचीलापन है कि हम परिवर्तन के थपेड़ों के बीच भी अपना अस्तित्व बनाए रख सके।

आज की बदली हुई परिस्थिति में स्वतंत्रता संग्राम की पीढ़ी के नेताओं का लोप होता जा रहा है। उनके नाती-पोतियों के जरिए कुछ परिवार फिर से राजवंश का-सा व्यवहार करने लगे हैं। इस बीच कांग्रेस के बिखरने से राजनीतिक दलों की संख्या बढ़ी है, साथ ही साथ उभय भाविता भी- कभी कांग्रेस के साथ-साथ कभी अलग-अलग। प्रांतीय राजनीति का आविर्भाव भी हुआ है। जो गैर-कांग्रेसी नेता प्रधानमंत्री बने उनमें से वाजपेयीजी और मोदीजी को छोड़ कर सभी कांग्रेस से टूटे हुए लोग थे। इसी काल में जब गैर-राजवंशी कांग्रेसी नेताओं ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली तभी देश उदारीकरण की ओर बढ़ा और आज वैश्वीकरण के अगुआओं में गिना जाता है। 

जब दुनिया बीसवीं सदी की समाप्ति के समीप थी तब विकास प्रक्रिया के अवदानों का लेखा-जोखा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिया गया। कोपेनहेगेन में 1995 में सामाजिक विकास का विश्व शिखर सम्मेलन हुआ। उस सम्मेलन में यूनेस्को की ओर से मुझे संयोजन का अवसर मिला।

इस सम्मेलन में पहली बार यह माना गया कि आर्थिक विकास अपने आप में महत्त्वपूर्ण नहीं है; उसे सामाजिक विकास के हित में कार्य करना चाहिए। यह कहा गया कि पिछले वर्षों में आर्थिक विकास तो हुआ, पर सभी देश सामाजिक विकास की दृष्टि से पिछड़े ही रहे। खासतौर से तीन बिंदुओं पर चिंता व्यक्त की गई: बढ़ती बेरोजगारी, भीषण गरीबी, और सामाजिक विघटन। यह स्वीकार किया गया कि सामाजिक विकास की समस्या सार्वभौमिक है। वह सर्वत्र है, लेकिन इस घोर समस्या का समाधान प्रत्येक संस्कृति के संदर्भ में खोजना चाहिए। एक तरह से तथाकथित गुजरात मॉडल का भी यही अभिप्रेत है। हमें प्रादेशिक संस्कृति और भूगोल के संदर्भ में समाधानों की खोज करनी होगी। मनरेगा जैसी अखिल


भारतीय योजनाओं की विफलता का भी यही कारण है। 

इसी सम्मेलन में भारत ने यह घोषणा की थी कि वह अपने सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत शिक्षा पर व्यय करेगा। लेकिन 1995 में दिया गया यह वचन अब भी अधूरा है। इतना होते हुए भी हमारी साक्षरता का प्रतिशत निरंतर बढ़ रहा है, पर उच्च शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। इस ओर हमें तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। 

नई सरकार ने शासन सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाना प्रारंभ कर दिया है। खुद प्रधानमंत्री सरकार के विभिन्न महकमों की कार्य-प्रणाली समझ रहे हैं। रणनीतिक कक्ष (वार रूम) में बैठकें होने लगी हैं। भाई-भतीजावाद को रोकने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। एक ओर नया शक्तिशाली युद्धपोत राष्ट्र को समर्पित किया जा रहा है, तो दूसरी ओर कश्मीर के सुरक्षा संबंधी पहलुओं का मुआयना किया जा रहा है। प्रधानमंत्री पड़ोसी देशों से संबंध बेहतर बनाने की यात्रा पर चल पड़े हैं, और शुरुआत हुई है पड़ोसी देश से। भूटान से भारत और भारत से भूटान का अनुप्रास मैत्री का नया अलंकरण बना है। 

ऐसे अवसरों पर मीडिया की भी बड़ी जिम्मेदारी है। जो कुछ दर्शनीय है उसे बाहरी दुनिया के लिए वर्णित करने की होड़ मेरी राय में गलत है। प्रधानमंत्री की गुप्त बैठकों का जिक्र करना क्यों आवश्यक है? फिर जब प्रकट ही हो गया तो गुप्त क्या रहा? ाीडिया की आपसी होड़ में देश-हित की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। 

यह सही है कि बहुत सारी चीजें हो रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। उन्हें पंद्रह-बीस दिन के कार्यकाल से आंका नहीं जा सकता। जिस प्रकार अरविंद केजरीवाल के उनचास दिनों के कामकाज को पंचवर्षीय दर्पण में देख कर झुठलाना गलत था, वैसे ही पंद्रह-बीस दिनों के मोदी-राज की समीक्षा करना अनुचित होगा। करिश्मे को रूटीन में बदलने दीजिए। 

महत्त्वपूर्ण यह है कि ढीली पड़ी सारी सरकारी मशीन में चुस्ती आई है। कुछ लोग बदले हैं तो कुछ के कार्य-क्षेत्र का विस्तार हुआ है- कम मंत्री ज्यादा महकमे! जाते-जाते पिछली सरकार ने जो निर्णय किए उनका पुनरीक्षण स्वाभाविक भी है और वांछनीय भी। 

जिस प्रकार राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद संभालते ही सबसे पहले शिक्षा के क्षेत्र की समीक्षा करवाई वैसे ही पुनरीक्षण की आज फिर आवश्यकता है। जहां एक ओर भारी-भरकम फीस लेकर निजी संस्थाएं विद्यार्थियों को आकर्षित कर रही हैं वहीं सरकारी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की अनुपस्थिति, घिसे-पिटे पाठ्यक्रम, कर्मचारियों की अकर्मण्यता और भ्रष्ट राजनीति चिंता के विषय हैं। पिछले वर्षों में कई आइआइटी और आइआइएम खुले हैं, पर वे अब भी निष्क्रिय हैं। 

हर राज्य में एम्स खोलने की बात की जाने लगी है, पर दिल्ली के एम्स का हाल यह है कि डॉ मनमोहन सिंह का इलाज करने के लिए मुंबई के निजी अस्पताल से डॉक्टर बुलाना पड़ा। वाजपेयीजी के घुटनों का स्थानापन्न भी मुंबई के निजी अस्पताल में हुआ, और किया भारतीय मूल के अमेरिकी डॉक्टर ने। दिल्ली के नेतागण अपने इलाज के लिए अपोलो या गुड़गांव स्थित मेदांता में जाते हैं, और मरणासन्न निर्भया को सिंगापुर ले जाया जाता है। वयोवृद्ध मंत्री शीशराम ओला की मृत्यु भी मेदांता में हुई। नक्सलियों की गोलियों के शिकार छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल का उपचार भी मेदांता में हुआ, न कि एम्स में। क्या छवि होकर रह गई है एम्स की? जो कभी शहर से दूर गिना जाता था वह एम्स आज शहर की गंदगी से घिरा हुआ है और लोगों की पहली पसंद नहीं रह गया है। 

यही हाल विश्वविद्यालयों का है। कई प्रदेशों में कुलपति की कुर्सी की नीलामी होती है। वह व्यक्ति इस पद को प्राप्त करता है, जो एक करोड़ के आसपास गुप्त धन नियोक्ता को देने की स्थिति में होता है। लेक्चरर तक कुलपति बन जाते हैं। इसी प्रकार अनुदान देने वाली शोध परिषदें खुल कर जातिवाद को प्रश्रय दे रही हैं। करोड़ों रुपया उन लोगों या संस्थाओं पर लुटा रही हैं, जो शोध के नाम पर शून्य हैं। ऐसी संस्थाओं का बहुलीकरण का औचित्य ठीक से आंकने की आवश्यकता है। 

मेरा मानना है कि अच्छे भविष्य के निर्माण के लिए हमें शिक्षा पर बल देना होगा। शोध और उच्च शिक्षा में बौद्धिक योग्यता की आवश्यकता होती है। अब तक हमारा जोर प्राथमिक शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा पर रहा है और उच्च शिक्षा को वरीयता देने से हम मुकरते रहे हैं। सूचना क्रांति के इस युग में उच्च शिक्षा की अवहेलना आत्मघाती सिद्ध होगी। हमारी नई शिक्षामंत्री को इस संकट से उबरने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। हम सबकी नजर अब आगत पर टिकी है। 


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