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जन-हित की कसौटी पर PDF Print E-mail
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Thursday, 19 June 2014 09:09

गिरिराज किशोर

 जनसत्ता 19 जून, 2014 : प्रिय अरविंद केजरीवालजी, आज जब राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक जनतंत्र लगभग समाप्त हो गया है तब आप ने बिना किसी पर गाज गिराए बातचीत का रास्ता अपनाया। यह पार्टी के अंदर के मामलों को सुलझाने की परंपरा को पुनर्स्थापित करने का प्रयत्न है। गांधीजी ने ‘हिंद स्वराज’ में ब्रिटिश संसद की आलोचना करते हुए कहा था संसद जनहित की बात नहीं करती, अपनी पार्टी के हित प्रमुख होते हैं। अगर कोई पार्टी का प्रोटोकोल तोड़ कर जनहित की बात करता है तो पार्टी उसका गंभीर नोटिस लेती है। जनहित और पार्टी-हित दोनों अलग हैं। अब तो पार्टियां अपने हित को ही जनहित मानने लगी हैं। इसीलिए पार्टियों में परस्पर मतभेद सुलझाने की बात समाप्तप्राय हो गई है, अंकुश स्वतंत्रता से ऊपर है। 

आपके यहां भी पहले ऐसा हुआ है। शाजिया, कैप्टन साहब आदि ने इसी तरह की बात कह कर ‘आप’ छोड़ी। कानपुर में पार्टी के नगर संयोजक का भी यही आरोप था। मुझे डॉ लोहिया के साथ रहने का मौका मिला है। मैं देखता था कि पार्टी के लोग परस्पर बातचीत में लोहियाजी का विरोध भी करते थे। लोहियाजी उनकी बात सुनते थे, समझाने की कोशिश करते थे। मुझे प्रसन्नता हुई कि आपने परस्पर बात करके समस्याओं को सुलझाने की परंपरा को अपनाया। देर आयद दुरस्त आयद।

विरोधी पार्टियां आरोप लगाती हैं कि आप कोई पार्टी नहीं है, कुछ लोगों ने अपनी राजनीतिक आकांक्षा पूरा करने का रास्ता अपनाया है। यह सबके साथ होता है। समान विचारों के साथी मिलते हैं और सामाजिक समस्याओं के साथ जूझना शुरू करते हैं। भूलें होती हैं, उन्हें सुधारते हैं और ढांचा खड़ा करते हैं। कोई पार्टी या संस्था ऊपर से नहीं उतरती। हेगडेवार हों या कांग्रेस के निर्माता या वामपंथी, सबने मुट्ठी भर लोगों के साथ पार्टी बनाई। कम्युनिस्ट पार्टी की संभवत: 1925 में चंद सदस्यों के साथ खलासी लाइन, कानपुर में स्थापना हुई थी। कांग्रेस शुरू में चंद लोगों की एक बंद संस्था थी। तिलकजी ने उसे खोला और गांधीजी ने उसे जमीन से जोड़ा। डॉ लोहिया को तो कई बार अपने साथियों से टक्कर लेनी पड़ी, समाजवाद और पार्टी के लिए। लेकिन इन आक्षेपों का इतना महत्त्व नहीं, जितना इनसे सीख कर उबरने का है। आपने पार्टी के पुनर्गठन का वादा करके निराश लोगों की आशा को सहारा दिया। 

कुछ बातें मैं आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं। किसी भी राजनीतिक उद््देश्य की पूर्ति जनता के विश्वास से होती है। जन-समस्याओं से जुड़ना पड़ता है। जनता के क्या सपने हैं उन्हें जानना पड़ता है। जनता के सपने टाटा, अंबानी या अडानी बनना नहीं है। इस समय तो बिजली-पानी सबसे बड़ा सपना है। आपने स्वयं देखा है। आपने बिजली-पानी के सवाल को उठाया। सरकार बनने पर राहत भी दी। लेकिन आप-सरकार को बीच में ही जाना पड़ा। सरकार छोड़ना न्यायोचित था। पहले भी केंद्र में चंद्रशेखर, वीपी सिंह, वाजपेयीजी, लगभग इन्हीं परिस्थितियों में त्यागपत्र देकर गए थे। लेकिन आपके साथ स्थिति इसलिए भिन्न हो गई, क्योंकि आपने जनमत लेकर सरकार बनाई थी। पर आप-सरकार ने, चार-छह मित्रों की राय पर, बिना जनमत लिए त्यागपत्र दे दिया। जनता का विश्वास टूट गया। 

विश्वास टूटना सपने टूटने की तरह होता है। मैथिलीशरणजी की पंक्ति याद आती है ‘सखी, वे मुझसे कह कर जाते, क्या वे पथ बाधा ही पाते’। आप पार्टी ने सोचा ऐसा करके आप जनता पर अपनी न्यायप्रियता का सिक्का जमा देंगे। जनता यह कहती है कि हमने तो आप को सरकार में आने के लिए कहा था, जाने के लिए नहीं कहा। इसका खमियाजा आपको 2014 के चुनाव में भुगतना पड़ा। उसके बाद जो सदस्यों में तोड़-फोड़ हुई वह सबके सामने है। क्योंकि जनता जैसे मिलने वाली सुविधाओं के आधार पर सरकार की सफलता या विफलता का निर्णय करती है, इसी प्रकार राजनीतिक पार्टी के सदस्यों का मानक होता है सत्ता उनसे कितनी दूर या पास है। पास आकर दूर चली जाए तो फिर डूब की तरह टूट हावी होने लगती है। 

मुझे स्मरण है कि जब अण्णाजी के नेतृत्व में हम सबने भ्रष्टाचार के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन छेड़ा था, सारे देश में एकजुटता आ गई थी। लगने लगा था कि भ्रष्टाचार के दिन पूरे हो गए। हम लोग कानपुर में आंदोलन कर रहे थे। शायद आपको मालूम हो कि कानपुर में कचहरी के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों तक ने रिश्वत से मुंह मोड़ लिया था। दिल्ली तो आंदोलन का केंद्र्र थी। जब अण्णा ने अनशन किया तो लगा देश जहां पहुंच गया वहां से वापस नहीं लौटेगा। गांधी का युग लौट आया है। लेकिन अण्णा ने भूख हड़ताल समाप्त कर दी। सरकार घुटनों पर आ गई। लेकिन धीरे-धीरे जनता को लगने लगा कि पूरा आंदोलन जन लोकपाल पर आकर ठहर गया है। 

जन लोकपाल भ्रष्टाचार को समाप्त करने की कुंजी नहीं था। वह जन-उत्साह था जो भ्रष्टाचार को समाप्त करने को कृतसंकल्प नजर आ रहा था। वही कर भी सकता है। जन लोकपाल विधेयक पास कराने से अधिक जनता के उस मूड को बनाए रखना जरूरी था। वह नहीं हो सका। इसके निम्नलिखित कारण थे: एक, सर्वोच स्तर पर बिखराव। दो, अण्णाजी में गांधीवादी संकल्प की कमी। तीन, सबको जोड़ कर रखने में कोताही। चार, वर्चस्व की लड़ाई। पांच, अण्णा का अपने सहयोगियों के प्रति अविश्वास। 

एक इतनी बड़ी शक्ति जो गांधी के जाने के बाद पहली बार अण्णा के रूप में उभर रही थी, अंदर के अंतर्विरोधों के कारण देखते-देखते बिखर गई। अण्णा को अरविंद साल भर की मेहनत के बाद उत्तर भारत में भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए तैयार कर पाए थे। जो लोग नेतृत्व के शीर्ष पर थे उनके मतभेद धीरे-धीरे सामने आए। अण्णाजी उनके बीच समन्वय स्थापित नहीं कर पाए। उसकी वजह अहंमन्यता थी या कोई और बात थी। बाद में वे अकेले पड़ गए। दिल्ली में जब सुलह-सफाई की बैठक हुई थी उसमें


मैंने अनुभव किया कि अण्णा समझ रहे हैं कि सब कुछ उन पर निर्भर है। चुनाव के मसले पर उनका कहना था कि मेरा नाम पार्टी से न जोड़ा जाए, प्रचार में मेरा नाम न आए। मैंने कहा था कि आपके इस रुख से जो पुल जनता और आपके बीच बना है वह टूट जाएगा। 

आम आदमी पार्टी बनने के बाद दिल्ली की जनता को लगा कि आप जनता के पक्षधर हैं। पूरे देश से आए स्वयंसेवकों ने रात-दिन जुटकर दिल्ली राज्य के चुनाव से पहले ऐसा वातावरण बनाया कि पुरानी पार्टियां तय नहीं कर पार्इं कि जनता का रुख क्या होगा। लोग सोच रहे थे कि आपको अधिक से अधिक पंद्रह सीटें मिलेंगी, अट्ठाईस सीटें मिलीं। विस्मयकारी उपलब्धि। सरकार आप ने बनाई। लेकिन आप तय नहीं कर पाई कि क्या ठीक है क्या गलत। भ्रष्टाचार की समाप्ति या जनलोकपाल विधेयक। जबकि दफ्तरों में वातावरण बदल गया था। लोग पैसा लेते डरने लगे थे। काम होने में गति आ गई। वातावरण बदलना जरूरी था या जन लोकपाल विधेयक प्राथमिकता थी? 

जनता खुश थी। उस जोश को बनाए रखना जरूरी था या संसद में बैठना। राजनीति में प्राथमिकताएं तय करना मुश्किल होता है। शायद इसी कारण आप सरकार तय नहीं कर पाई कि दिल्ली संभालना प्राथमिकता होनी चाहिए या त्यागपत्र देकर उसकी साख पर संसद का चुनाव लड़ना। न साख रही और न दिल्ली की सत्ता। हालांकि इतनी कम उम्र की पार्टी के लिए संसद में उसके चार सदस्यों का बैठना बहुत बड़ी उपलब्धि है। वहां पहले दिन ही आप के सांसद की आवाज गूंजी। उत्तर प्रदेश से भी दो-चार सीटें संभव थीं। पर टिकट बांटने में धांधली की बात फैल जाने के कारण माहौल बिगड़ गया। उधर टिकट देने में पैसे का प्रवेश भ्रष्टाचार-विरोधी पार्टी के लिए बहुत करारा झटका था। दो लोगों को पार्टी-बदर भी किया गया। पर उससे भी बात नहीं बनी। 

दूसरी बात थी दिल्ली में जनता को लगा कि आप के नेतृत्व के पास आम आदमी पहुंच नहीं पाता। इस बात को गोपाल राय ने भी माना था कि जनता को शिकायत है कि हम लोग फोन नहीं उठाते। दो हजार फोन रोज आते हैं, कहां तक उठाएं। मैं उस बैठक में मौजूद था। यह सुन कर चकित रह गया था। जनता से समर्थन लोगे, जनता की बात नहीं सुनोगे, यह कैसी बात। मैंने देखा है कि (संयुक्त) उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री और मंत्री तैयार होकर सवेरे आठ बजे बरामदे में बैठ जाते थे। हर आदमी जाकर अपनी बात कह सकता था। इंदिरा गांधी रोज दो से तीन हजार लोगों से जनता दर्शन के समय मिलती थीं। मैंने आनंद कुमार जी से अपना विरोध प्रकट किया था। दरअसल, अपनी सुविधा का हवाला देकर जनता की आवाज अनसुनी करना उस जनता के प्रति अन्याय है जिसने आप को कंधों पर बैठाया। इन बातों का, केजरीवालजी, पार्टी के संगठन का पुनर्गठन करते समय अगर ध्यान रखा जाए तो आधार मजबूत होगा। 

पार्टी को अपना कोई न कोई आदर्श या राजनीतिक दर्शन बनाना होगा। तय करना होगा कि किस तरह जनहित में काम करना है। उसके बिना पार्टी में संतुलन नहीं आ सकेगा। डॉ लोहिया ने केरल के छात्रों पर हुए गोलीकांड के बाद थानु पिल्लई की सरकार को हटाया था, हालांकि उसके लिए विरोध सहना पड़ा था। गांधी चौरीचौरा कांड के बाद अकेले पड़ गए थे। जब मैंने फेसबुक पर आॅटो वाले के हमले के बाद आपके राजघाट पर जाकर बैठने और उस व्यक्ति के घर जाने के पीछे गांधीजी का सोच होने की बात कही, तो मुझे बहुत गालियां मिलीं। लेकिन आप पर लगातार हो रहे हमलों में मुझे दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी की सहिष्णुता और क्षमाशीलता नजर आई। 

मोदीजी ने संसद में अपने नारे में तरमीम करके कहा, अच्छे दिन जरूर आएंगे। इंतजार करना होगा। आप को तय करना होगा इंतजार करना है या इस सवाल को आगे तक पहुंचाना है, आखिर कब? अगर दिल्ली में चुनाव हुआ तो जनता आप का किया काम भूलेगी नहीं। मैं जानता हूं कि आपसे यह सब कहने के लिए अधिकारिक व्यक्ति नहीं हूं। मोदीजी की जीत और कांग्रेस की विकट हार के बीच आम आदमी पार्टी खड़ी है। मोदीजी ने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई बहस का उत्तर देते हुए बहुत-सी बातें कहीं, जो उन्हें कहनी थीं। लेकिन क्रियान्वयन के बारे में सवाल बना रहा। देश का उन्नयन कैसे होगा? आप के पक्ष में उनचास दिन की सरकार का जनहित में किया गया काम खड़ा नजर आता है। मैंने पहले भी पत्र लिखा था। लाभ न लेने वाले वरिष्ठ और अनुभवी लोगों की परामर्श समिति बनाई जा सकती है, जो मुद््दों पर आप द्वारा पूछे जाने पर राय दे सके। अनुभव और उत्साह का समावेश मदद करेगा। 

मुझे पूरी आशा है कि सत्ता के द्वंद्व में धैर्य और संजीदगी आप का रास्ता आसान करेगी। राजनीतिज्ञ पत्रों का जवाब तो नहीं देते। सुनना और जवाब देना राजनीति और जन को जोड़ता है। मैंने छठी क्लास में गांधीजी को पत्र भेजा था। उनका एक पंक्ति का पत्र आया था, पढ़ो और सेवा करो।


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