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देर से आए, जल्दी जाएंगे PDF Print E-mail
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Wednesday, 18 June 2014 09:15

राजकिशोर

 जनसत्ता 18 जून, 2014 : मौसम की पूर्व-घोषणा हो सकती है- जितनी हो सकती है, पर किसी समाज के भविष्य का पूर्व-वर्णन नहीं किया जा सकता।

कारण यह है कि मौसम को प्रभावित करने वाले घटक बहुत ज्यादा नहीं होते, पर समाज को प्रभावित करने वाले घटक अनंत होते हैं। आज से पचास साल पहले कितनी गरमी पड़ी थी और कितनी बारिश हुई थी, इससे अगले हफ्ते के मौसम का मिजाज समझने में कोई खास मदद नहीं मिलती। लेकिन पचास क्या, पांच सौ वर्ष पुरानी कोई घटना भी आज के समाज को समझने की कुंजी हो सकती है। खासकर उन समाजों को समझने की, जो बहुजातीय बहुभाषी बहुसांस्कृतिक हैं और जिनका इतिहास द्वंद्वों से भरा हुआ है। भारत जैसी विविधता किसी और देश में दिखाई नहीं पड़ती, न वैसी उथल-पुथल, जो हमारे पूर्वजों ने देखी और भोगी है। दरअसल, भारत अपने राजनीतिक-सामाजिक अतीत से अभी तक उबर नहीं सका है। इसलिए उसे भविष्य-मुखी बनने में समय मिलेगा। 

भारत में मुसलिम शासन का दौर अभी तक एक गांठ बना हुआ है, जिसे न हिंदू खोलना चाहते हैं, न मुसलमान। भारत विभाजन भी एक गांठ है, पर उसके लिए कौन जिम्मेदार है, यह स्पष्ट न होने से हिंदू मन में उसे लेकर उतना गुस्सा नहीं है। फिर भी मुहम्मद अली जिन्ना को भारत में खलनायक की तरह ही देखा जाएगा- हमारे सेक्युलर इतिहासकार चाहे जितनी कोशिश कर लें। भीमराव आंबेडकर को हिंदू समाज ने पचा लिया है- हालांकि उनके निष्कर्षों और शिक्षाओं को नहीं। लेकिन हिंदू समाज जिन्ना को शायद ही कभी अपना सकेगा। जब पूर्व भारत के तीनों खंड एक हो जाएंगे, तब भी गफ्फार खां और शेख मजीबुर्रहमान की ही इज्जत ज्यादा होगी। तब शायद कोई मुसलमान भारत का प्रधानमंत्री हो तो हो, अभी तो यह स्वप्न भी नहीं देखा जा सकता। मुसलमानों को राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति बना देना रणनीति है- क्षतिपूर्ति नहीं। 

भारत के मुसलिम समाज ने भी अपनी ओर से हिंदू समाज की ओर दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाया है। कई बार मेरे मन में आता है कि मुसलमानों के शीर्ष प्रवक्ताओं ने अगर भारत में मुसलिम राज और भारत विभाजन के लिए माफी मांग ली होती, तो वातावरण बहुत हद तक तनावहीन हो सकता था। यह अब भी हो सकता है। मुसलिम राज की हम जैसी भी व्याख्या करें, भारत के लिए वह पराया और अल्पसंख्यक राज था। हिंदू बहुमत ने उसे अपने शासन के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया। इतिहासकार चाहे जितना शीर्षासन करते रहें, घटनाएं उसी से प्रभावित होती हैं जो जनसाधारण के मन में चलता रहता है। 

अंगरेजी राज के आने पर मुसलिम सत्ता का क्षय हुआ। राजकाज में हिंदुओं की हिस्सेदारी बढ़ी और मुसलमानों की कम हुई। कई हिंदू लेखकों ने अंगरेजी राज को भारत का मुक्तिदाता माना है। वंदे मातरम इसका एक प्रबल साक्ष्य है। इसीलिए मुसलिम-विरोधी सांप्रदायिक दिमाग के लिए उसका महत्त्व जन गण मन अधिनायक से ज्यादा है। सेक्युलर भारत, जो है जितना है, हिंदुओं का है, मुसलमानों का नहीं। पीड़ित अल्पसंख्यक के लिए सेक्युलर होना कठिन है। 

अगर वह आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ हो और बहुसंख्यक समाज के लिए बेगाना हो, तब तो और भी ज्यादा।  इसीलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी संस्थाओं के लिए मुसलमान इस देश का नागरिक नहीं, एक राष्ट्रीय समस्या है। वे इस समस्या का समाधान अपने ढंग से इसलिए नहीं कर पा रहे हैं कि भारत का विशाल गैर-मुसलिम जनमत उनका साथ नहीं देगा। फिर पूर्व और दक्षिण भारत में हिंदू और मुसलमान ज्यादा नजदीकी से रहते हैं- उनके पास तो ऐसे मुसलमान राजाओं की स्मृति भी है जो भारतीय समाज के हीरो माने जाते हैं। 

अब तक के पूरे घटनाचक्र को देखा जाए तो ऐसा लगेगा कि भारत की सत्ता किसी हिंदू-हृदय-सम्राट को देने की तैयारी 1947 से ही चल रही है। विभाजन के दिनों में ही हिंदू भारत की धारणा उभरने लगी थी- पाकिस्तान अगर मुसलमानों के लिए था जहां से हिंदुओं को मार-मार कर भगा दिया गया था, तो बचा हुआ भारत हिंदुओं के लिए नहीं तो और किसके लिए था? बहुतों की राय में उन्हीं दिनों अगर जनसंख्या विनिमय हो जाता तो अच्छा था- बला टल जाती। लेकिन यह सरलीकरण है, जिसका अपने ढंग से उपयोग है, पर इस प्रसंग में यह एक जहरीली इच्छा है। भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने सोचा कि जिन्हें पाकिस्तान चाहिए वे पाकिस्तान चले जाएं, पर हमें हिंदू भारत नहीं चाहिए। हम एक ऐसा लोकतांत्रिक देश बन कर रहेंगे जहां सभी समुदाय प्रेम और सद््भाव के साथ रह सकें। इस भावना के पीछे उदार राष्ट्रीयता थी, जबकि पाकिस्तान की मांग के पीछे एक छोटी-सी गोष्ठी का स्वार्थ। 

इसीलिए मेरी तुच्छ समझ में यह आता है कि सेक्युलर भारत का स्थायित्व सेक्युलर राजनीति की सफलता पर निर्भर था। मध्य मार्ग की तारीफ तभी होती है जब वह कारगर होकर दिखाए, नहीं तो वह दलाली है। नेहरू के समय से भारत मध्य मार्ग पर चलता रहा है- तू भी अच्छा तू भी अच्छा। किसका कौन बनेगा चच्चा।  

मध्य मार्ग में अपने आप में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते वह सचमुच मध्य ही नहीं, मार्ग भी हो। भारत के मध्य मार्ग ने कुछ सफलताएं भी दिखाई हैं, पर वे गहरी घाटियों से बने


हुए उच्च शिखरों की तरह हैं। सोनिया-मनमोहन राज के लगातार दस वर्षों में जब यह साफ हो गया कि मध्य मार्ग के यशस्वी नेता भारत का नेतृत्व तक करने के लिए तैयार नहीं हैं- वे अपने को सिर्फ फाइलें निपटाने के लिए जिम्मेदार मानते हैं, तब जनता की आखिरी आस भी टूट गई। वह कम-से-कम प्याज-रोटी की हकदार तो है ही। 

कायदे से भारत में कम्युनिस्ट शासन होना चाहिए था। अमेरिका भी यह समझता था, तभी उसने भारत में साम्यवाद-विरोधी प्रचार के लिए अपनी थैली हमेशा खुली रखी। समाजवादियों की अपनी एक क्यारी भी थी, लेकिन स्वयं राममनोहर लोहिया ने स्वीकार किया है कि उनमें सत्ता की अभिलाषा (विल टु पॉवर) पर्याप्त मात्रा में नहीं है। लेखक होने के बजाय, आलोचक बने रहना उन्हें ज्यादा पसंद है। इसीलिए कृष्णोत्तर यादवों की तरह एक-दूसरे से युद्ध करते हुए वे निश्चिह्न हो गए। अब जो बचा है, उसे ट्रेजेडी कहिए या कॉमेडी- अर्थ एक ही निकलता है। 

इसके विपरीत, कम्युनिस्टों में सत्ता की अभिलाषा भरपूर थी। लेकिन तेलंगाना आंदोलन के दमन के बाद उनका ऐसा हृदय परिवर्तन हुआ कि वे अपना कम्युनिस्ट होना तक भूल गए। उसके बाद क्रांतिकारिता सिर्फ वाणी में बची रह गई। साम्यवाद कोई सामाजिक आंदोलन तक नहीं बन पाया। पश्चिम बंगाल में सुदीर्घ वाम शासन के दौरान न ईश्वर का बाल बांका हुआ, न मंदिरों का प्रतिगामी चरित्र उजागर हुआ और न जाति प्रथा को कोई झटका लगा। बड़े-बड़े कम्युनिस्ट नेता कोलकाता की ट्रामों का फर्स्ट क्लास और सेकंड क्लास में विभाजन तक खत्म नहीं कर सके। अपनी कब्र खोदने में कम्युनिस्ट सोशलिस्टों से ज्यादा मेधावी और चुस्त निकले। आज भी वे समझ नहीं पा रहे हैं कि इस समय भारत की रक्षा कोई कर सकता है, तो वह कम्युनिज्म ही है- वह कम्युनिज्म नहीं, जो जंगलों से संचालित होता है, और न वह, जो मुंह से आग उगलता है, पर पीछे सिर्फ धुआं छोड़ जाता है।

तो, मध्य मार्ग विफल, समाजवाद विफल, साम्यवाद विफल, शहरी नेता विफल, किसानों के नेता विफल, पढ़े-लिखे विफल, कम पढ़े-लिखे विफल... ऐसी स्थिति में जो एक बची हुई धारा थी, जिसे पूरी तरह आजमाया नहीं गया था, वह सतरंगी सपने दिखाते हुए आ धमकी, तो उसके लिए लाड़ क्यों न उमड़ पड़ता। लेकिन सावधान, नरेंद्र मोदी की जीत से यह कदापि नहीं समझना चाहिए कि भारत की जनता सांप्रदायिक हो गई है। हिंदू समाज में कट््टरता का बोलबाला कभी नहीं रहा। उसे मुलायम धर्मनिरपेक्षता भी पसंद है और मुलायम सांप्रदायिकता भी। लेकिन मोदी इसलिए नहीं जीते कि वे सांप्रदायिक हैं। बल्कि इसलिए जीते कि उन्होंने अपने हर भाषण में अपने को क्रिसमस के सांता क्लाज की तरह पेश किया जिसकी जेब में हरएक के लिए कुछ न कुछ छिपा हुआ है। भारत में हिंदू राज की तरह की चीज इतनी देर से आई, यही आश्चर्यजनक है।  

इसके पहले वह नहीं आ सकी, इसका कारण यह है कि उसके पास कोई प्रभावशाली नेता नहीं था। अटल बिहारी वाजपेयी बेहद मुलायम नेता रहे हैं। आडवाणी उनसे ज्यादा उग्र हैं, पर शासन करने का मौका मिला तो वे फुस्स निकले। कल्याण सिंह जबरदस्ती भाजपा में थे। दिल्ली के दूसरे नेता गरजते भी कम हैं और बरसते उससे भी कम हैं। ऐसे समय में, जब राजनीति की विभिन्न धाराओं के पंख एक के बाद एक गिर रहे थे, नरेंद्र मोदी जैसे वाग्वीर नेता का आना भाजपा के लिए राजयोग का कारण बन गया। एक बार फिर सावधान, अपनी जीत के लिए नरेंद्र मोदी ने भाजपा को अपना पायदान बनाया है, भाजपा ने तो सिर्फ हनुमान की तरहउनकी मदद की है। अब भी तमाम भाजपा नेता ‘ऐसो को महान जग माहीं’ का कीर्तन करने के लिए विवश हैं। 

मेरी समझ यह है कि भारत में हिंदू राज देर से आया, पर जल्दी जाएगा। हिंदू समाज को अपने देवी-देवता और धार्मिक विश्वास इतने प्यारे नहीं हैं कि उनका स्मरण कर वे भूखे सो जाएं। मोदी ने हिंदू निराशा को नहीं, भारतीय निराशा को वाणी दी है। लेकिन राष्ट्रपति के अभिभाषण में मोदी के भारत की जो तसवीर दिखाई पड़ी है, उसमें कुछ भी नया नहीं है। इस अर्थशास्त्र की बदौलत सभी के लिए पक्के और आधुनिक सुविधाओं वाले मकान बनें या नहीं, झोपड़ियां जरूर तबाह हो जाएंगी और साग-सब्जी वही खा सकेंगे जिनके घर का कोई सदस्य बीपीओ या एमएनसी में काम करता हो। न शिक्षा की समस्या सुधरेगी, न रोजगार की और न कीमतों की। पूत के पांव पालने में ही दिखाई पड़ जाते हैं। मोदी का पालना बड़ा है, पर पांव छोटे हैं। 


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